विवादित रुचिरा खुल्लर फिर बनीं नेहरू कॉलेज की प्रिंसिपल

विवादित रुचिरा खुल्लर फिर बनीं नेहरू कॉलेज की प्रिंसिपल
May 11 14:46 2025

फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) बतौर नेहरू कॉलेज प्रिंसिपल गबन, प्रशासनिक अनियमितताएं करने की आरोपी प्रो. रुचिरा खुल्लर ने एक बार फिर जुगाड़बाज़ी की बदौलत यह कुर्सी हासिल कर ली है। उनके तिगांव कॉलेज से नेहरू कॉलेज ट्रांसफर का कारण ‘जनहित में’ बताया गया है। जानकार कहते हैं कि जब किसी मंत्री-विधायक की सिफारिश पर मजबूरी में कोई ट्रांसफर किया जाता है तो उसका कारण जनहित बताया जाता है, भले ही उससे जनता यानी कि छात्रों का अहित ही हो। बताया जा रहा है कि रुचिरा खुल्लर ने कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल की खूब चरण वंदना की है और उनको खुश करने के एवज में खुल्लर प्रिंसिपल बना दी गईं जबकि उनके खिलाफ इसी कॉलेज में अनुशासनहीनता, गबन और अन्य मामलों में जांचें अभी भी लंबित हैं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या उन्हें नेहरू कॉलेज की गद्दी इसलिए दी गई है कि वह अपने खिलाफ चल रही जांचों के सुबूत मिटा सकें? या अभी भ्रष्टाचार करने से पेट नही भरा है और भ्रष्टाचार करना चाहती है? सैनी सरकार वैसे तो ईमानदार होने का ढिंढोरा पीटती है उसके बावजूद एक भ्रष्ट प्रिंसिपल को दोबारा से इसी कॉलेज में क्यों भेज दिया? क्या सैनी सरकार रुचिरा खुल्लर को नेहरू कॉलेज में फिर से प्रिंसिपल पर पर भेज भ्रष्टाचारियो के हौसलों को बुलंद करना चाहती है? इन सब सवालों के बीच यह भी माना जा रहा है कि उनका ट्रांसफर हाईकोर्ट के आदेश का भी उल्लंघन है।

सुधी पाठक जानते ही होंगे कि प्रो. रुचिरा खुल्लर नेहरू कॉलेज में प्राध्यापक थीं। हालांकि तब भी उन पर आरोप लगते थे कि वे छात्रों को पढ़ाने कक्षा में नहीं आतीं थी। उनसे तंग आकर प्रेम नाम के एक छात्र ने तो उनकी शिकायत भी कर दी थी कि वे क्लास नहीं पढ़ातीं। बाद रुचिरा खुल्लर ने अपने ही खिलाफ शिकायत पर कार्रवाई करते हुए छात्र प्रेम को बिना किसी अपराध के 15 दिनों के लिए कॉलेज से सस्पेंड कर दिया था। शिक्षण से ज्यादा सेटिंग-गेटिंग में माहिर खुल्लर ने 1 जुलाई 2023 को नेहरू कॉलेज की प्रिंसिपल का पद संभाला था। उन पर आरोप लगे थे कि प्रिंसिपल बनते ही दाखिले के नाम पर छात्रों से पैसे ऐंठे जाते थे, इसमें तो एक छात्र ने पुलिस में दाखिले के नाम पर 7000 रुपये लेने की शिकायत भी की थी जिसे खुद रुचिरा खुल्लर ने छात्र के पैसे वापिस दिलाकर निबटाया था जबकि उसमें कार्रवाई होनी चाहिए थी। साथ कम अंक वाले छात्रों को और सिफारिश पर पढ़ाई में कमजोर छात्रों को भी दाखिला देे कर कॉलेज का शैक्षणिक स्तर गिराए जाने का भी आरोप लगा।

उनकी इन्हीं हरकतों और शिकायतों के चलते ही 22 अगस्त 2024 को उनका ट्रांसफर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्राउंड पर तिगांव कॉलेज कर दिया गया। खुल्लर ने ज्वाइन नहीं किया और नेहरू कॉलेज में ही बने रहने के लिए पंचकूला स्थित डीएचई ऑफिस की सहायक पूनम शर्मा से अभद्रता की थी, उनसे कहा था कि मैं खुल्लर हूं, तुम्हारी समझ में आ जाएगा। इसके बाद वह चंडीगढ़ में अपने सजातीय और सेटिंग-गेटिंग वाले राजेश खुल्लर जो उस समय तत्कालीन सीएम खट्टर के प्रिंसिपल सेक्रेटरी थे, से मिलकर अपना ट्रांसफर रुकवाने गई थीं। लेकिन छुट्टी पर होने के कारण राजेश खुल्लर नहीं मिले। तो वह उच्चतर शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव डी. सुरेश से मिली। रुचिरा ने उनसे भी जमकर अभद्रता की थी।

जिसकी बदौलत उन्हेें 27 अगस्त 2024 को निलंबित कर दिया गया। इसके खिलाफ उसी दिन उन्होंने हाईकोर्ट में पिटिशन फाइल कर दी। 28 अगस्त को जस्टिस त्रिभुवन दहिया की कोर्ट ने सुनवाई की। जानकार बताते हैं कि निलंबन और ट्रांसफर कर विरोध कर रहीं रुचिरा खुल्लर के वकील ने दलील दी थी कि नेहरू कॉलेज के तत्कालीन प्रिंसिपल चंद्रशेखर वशिष्ठ अपनी पत्नी के कैंसरग्रस्त होने की झूठी बात फैला कर मेडिकल ग्राउंट पर यहीं जमे रहना चाहते हैं। झूठा आरोप लगाने पर जस्टिस त्रिभुवन दहिया ने सख्त नाराजगी जताते हुए तुरंत केस खारिज कर दिया था तथा इनके वकील को भी कड़े निर्दैेश जारी किए थे।

इसी दौरान एनएसयूआई छात्र नेता कृष्ण अत्री ने 27 नवंबर 2024 को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरटीआई का हवाला देते हुए रुचिरा खुल्लर पर आरोप लगाए कि प्रिंसिपल रहते हुए उन्होंने कॉलेज का पचास साल पुराना कबाड़ और रद्दी बेच दी, डोनेशन के 75 हजार रुपये भी डकार गईं। कॉलेज में 5400 छात्र पंजीकृत हैं, सभी छात्रों से फाइन वसूला गया लेकिन केवल 3200 छात्रों से वसूले गए 3.25 लाख रुपये ही खजाने में जमा कराए, बाकी बच्चों से वसूली गई रकम कहां गई।

इन गंभीर आरोपों का खुल्लर ने कोई जवाब नहीं दिया तो अत्री ने 19 दिसंबर 2024 को यह शिकायत राज्यपाल, मुख्यमंत्री, सचिव उच्च शिक्षा विभाग, एंटी करप्शन ब्यूरो, डीसी, डीएचईओ को ईमेल के जरिए कर दी। 3 जनवरी 2025 को उन्हें एंटी करप्शन ब्यूरो मुख्यालय के डायरेक्टर ने ईमेल के जरिए जवाब दिया कि उनकी शिकायत की जांंच मुख्य सतर्कता अधिकारी से कराने के लिए अतिरिक्त सचिव से सिफारिश की गई है। यह जांच भी चल रही है। कॉलेज में यह चर्चा भी तेज है कि रुचिरा खुल्लर की पीएचडी भी फर्जी है। उनकी डिग्री राजस्थान की जिस यूनिवर्सिटी की बताई जा रही है उसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने ब्लैक लिस्ट कर रखा है। मज़दूर मोर्चा चर्चा में लगाए गए आरोपों की पुष्टि या खंडन नहीं करता, उनकी डिग्री असली है या फर्जी यह जांच का विषय है। संदर्भवश, सुधी पाठकों को बताते चलें कि हाल ही में हरियाणा सरकार ने 292 प्राध्यापकों को फर्जी पीएचडी सर्टिफिकेट लगाने के कारण बर्खास्त किया है। इन कथित प्राध्यापकों ने पीएचडी की यह डिग्रियां, राजस्थान के चुरु की ओपीजेएस, अलवर की सनराइज यूनिवर्सिटी और झुंझनू की सिंघानिया यूनिवर्सिटी से हासिल की थीं ये तीनों यूनिवर्सिटी ब्लैक लिस्टेड हैं। चर्चा है कि इन्हीं में सेे ही किसी एक यूनिवर्सिटी से रुचिरा खुल्लर ने पीएचडी की है।

इधर, निलंबन समाप्त करवाने को बेचैन खुल्लर ने डी. सुरेश के आगे खूब विलाप किया लेकिन वह खुल्लर की कार्यशैली से भलीभांति परिचित थे और उन्होंने बहाली का आदेश नहीं जारी किया। लगभग 4 महीने बाद डी. सुरेश का ट्रांसफर हुआ इसके बाद रुचिरा खुल्लर ने अनेक विधायक, मंत्रियों के घर जाकर नाक रगड़ी, चंडीगढ़ मुख्यालय के चक्कर लगाए, नजराने दिए और भेंट चढ़ाईं तब कहीं जाकर 24 दिसंबर 2024 को उनकी बहाली हुई लेकिन उनके खिलाफ चल रही जांचे जारी रखी गईं। निलंबन समाप्त होने पर उन्हें तिगांव कॉलेज की प्रिंसिपल बना दिया गया। खुल्लर के करीबी सूत्र बताते हैं कि वह तब से ही नेहरू कॉलेज की प्रिंसिपल बनने को अपने मान सम्मान का मुद्दा बनाए थीं।

यहां सुधी पाठकों को बताना जरूरी है कि प्रो. चंद्रशेखर वशिष्ठ की पत्नी कैंसर पीडि़त हैं और उन्हें पत्नी की सेवा सुश्रूषा के लिए उनके करीब रहने के आधार पर ही नेहरू कॉलेज का प्रिंसिपल बनाया गया था। निलंबन के खिलाफ रुचिरा द्वारा की गई अपील में हाईकोर्ट के जज ने इस मुद्दे पर खुल्लर को जमकर लताड़ा भी था और चंद्रशेखर वशिष्ठ की तैनाती को सही ठहराया था। चंद्रशेखर वशिष्ठ की नौकरी महज पांच महीने ही बची है। बताया जा रहा है कि नेहरू कॉलेज की कुर्सी के लिए छटपटा रहीं रुचिरा खुल्लर ने विपुल गोयल जैसे मंत्रियों की चरणवंदना की अपनी जिद पूरी करने के लिए मोटा नजराना दिया।

सरकारी नियमों को जानने वालों के मुताबिक सेवानिवृत्ति वाले वर्ष में ट्रांसफर नहीं किए जाने की प्रशासनिक परंपरा है। चंद्रशेखर को तो पोस्टिंग ही मेडिकल ग्राउंड पर मिली हुई था, ऐसे में उन्हें तिगांव भेज कर वहां से रुचिरा खुल्लर को नेहरू कॉलेज भेजा जाना, अनैतिक, नियमों का उल्लंघन और सबसे बढ़ कर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने जैसा है। यदि उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारियों और सरकार में बैठे सिफारिश करने वाले मंत्री सरकार की छवि के प्रति जरा भी गंभीर हैं तो कम से कम जांच पूरी होने तक रुचिरा खुल्लर को नेहरू कॉलेज की गद्दी नहीं देनी चाहिए थी क्योंकि अभी भी उन पर भ्रष्टाचार के आरोप बरकरार है और जिनकी जांच चल रही है ऐसे में उन्हें यहां भेज देना सरासर भ्रष्टाचार को समर्थन देना है।

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Mazdoor Morcha
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