आज से 80 साल पहले 27 फरवरी 1943 को बर्लिन के रोजेन्ट्रैसे (रोज़ स्ट्रीट) में सैकड़ों महिलाओं ने प्रदर्शन कर 2000 यहूदियों की जान बचायी। ये महिलाएं गैर यहूदी थीं और अपने यहूदी पतियों और बच्चों जिन्हें बर्लिन से बाहर भेजने के लिए वहां रखा गया को, बचाने के लिए गेस्टापो के सामने सीना तान कर खड़ी हो गयीं। गेस्टापो ने धमकी दी कि वे गली और सडक़ खाली कर दें लेकिन महिलाएं नहीं मानी। वे 6 मार्च 1943 तक डटी रहीं और अंतत: हिटलर के मंत्री गोएबल्स को उन्हें छोडऩा पड़ा।
हिटलर ने सितम्बर 1935 में न्यूमेरबर्ग कानून बनाया था जिसके अनुसार यहूदी और गैर यहूदी (विशेषकर जर्मन) के बीच सेक्स संबंधों को अपराध घोषित कर दिया गया। जिन जर्मन महिलाओं ने यहूदियों के साथ शादी कर ली थी उन्हें अपने पतियों को छोडऩे का दबाव बनाया जाने लगा।
हिटलर ने यहूदियों के सफाये की योजना तैयार की। उसने यहूदियों को या तो गैस चैम्बर में डालकर मरवा दिया या फिर उन्हें डिटेंशन केंद्रों में रखा। ये केंद्र यहूदियों के लिए बेहद अमानवीय और यातना दायक थे। फऱवरी 1943 में बर्लिन को पूरी तरह से यहूदियों से मुक्त करने का अभियान चलाया गया। इसी अभियान के तहत करीब 2000 यहूदियों को पकडक़र रोसेन्ट्रेस में रखा गया। इनमें अधिकतर ऐसे यहूदी थे जिन्होंने जर्मन लड़कियों से शादी की थी।
जब यह खबर उनके परिवारों तक पहुंची तो उनकी पत्नियां वहां इकट्ठा होने लगीं और धीरे-धीरे संख्या बढऩे लगी। वे अपने बच्चों और पतियों को छोडऩे की मांग करने लगीं। वे 6 मार्च तक वहां डटी रहीं और फिर यह घटना इतिहास में दजऱ् हो गयी। हिटलर के खिलाफ ऐसे पहले प्रदर्शन के रूप में। फासीवादियों के खिलाफ संघर्ष में इस घटना को हमेशा याद रखा जाएगा और भविष्य में ये फासीवादियों के खिलाफ संघर्ष में प्रेरक का काम करती रहेगी।