मज़दूर मोर्चा ब्यूरो वर्ष 2014 से पूर्व के कांग्रेसी शासनकाल में हो रहे व्यापक भ्रष्टाचार, घोटालों, महंगाई व बेरोजगारी से जनता इस कदर त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही थी कि विकल्प के रूप में उसे वह मदारी मन को भा गया जो कहता था कि महंगाई से 100 दिन में राहत दिला देगा और प्रति वर्ष दो करोड़ नौकरियां उपलब्ध कराएगा। शायद, मदारी को यह सब पर्याप्त नहीं लगा तो घोषणा कर डाली कि विदेशों में छिपे काले धन को लाकर प्रत्येक नागरिक के खाते में 15-15 लाख डाल दिये जायेंगे। ‘अच्छे दिन आयेंगे’ का नारा देकर त्रस्त जनता को अपने मोहपाश में बांध कर सत्ता हथिया ली।
सत्तारूढ़ होते ही मदारी ने तुरंत अपना चोगा बदल लिया और असली रूप में आ गया। चुनाव पूर्व किये गये तमाम वायदों को जुमला बताते हुए एक के बाद एक अपने नये-नये एजेंडे रखने शुरू कर दिये। सबसे बड़ा घोटाला नोटबंदी के रूप में किया गया। सारे देश को बैंकों के बाहर कतारों में लगा दिया गया। सैंकड़ों लोग इन कतारों में खड़े-खड़े ही मर गये। लाखों लोग, खासकर दिहाड़ीदार मज़दूर व रेहड़ी-खोमचे वाले पूरी तरह से बेरोजगार हो गए।
मजे की बात तो यह रही कि मदारी ने जनता को इस कदर सम्मोहित कर रखा था कि इसके बावजूद भी वे उससे नाराज होते नजर नहीं आये क्योंकि उन्हें यह कह कर बरगलाया गया था कि इसके द्वारा वह देश का सारा काला धन समाप्त कर देगा। लेकिन हुआ बिल्कुल इसके विपरीत, सारे का सारा काला धन सफेद हो गया, खासकर सत्तारूढ़ दल का जिसने सैंकड़ों करोड़ उन सहकारी बैंकों में जमा करा दिये थे जिनकी इतनी क्षमता ही नहीं थी।
चुनावी वायदों के विपरीत महंगाई को लगातार पूरी रफ्तार के साथ बढ़ाया गया तथा रोजगार बढ़ाने के बजाय तमाम सरकारी विभागों में भर्तियांंं लगभग बंद कर दी गईं। न केवल सारे बैंक बल्कि रिजर्व बैंक तक खाली करके अपने मित्र उद्योगपतियों के घर भर दिये। अपनी तमाम तरह की अय्याशियों के लिये भारी मात्रा में विदेशी कर्ज देश पर लाद दिये। इससे भी पेट नहीं भरा तो एक-एक करके देश की सम्पत्ति कौडिय़ों के भाव अपने मित्रों को बेच डाली। इसके बावजूद बीते साढ़े नौ साल में एक भी कोई ऐसी चीज़ यानी कि कोई एम्स, आईआईटी अथवा कोई बड़ा संस्थान ये लोग नहीं बना पाये। बनाने के नाम पर केवल अपने आलीशान कार्यालय बनाये।
जनता के आक्रोश को दबाने के लिये पूरे मुख्यधारा के मीडिया को खरीद लिया गया। बिकाऊ मीडिया का केवल यही काम रह गया कि मात्र सरकारी विज्ञापनों के माध्यम से मदारी की सुंदर-सुंदर तस्वीरें छापता रहे तथा उनके मतलब की तमाम झूठी खबरें फैलाता रहे। इसके साथ-साथ तमाम संवैधानिक संस्थानों-चुनाव आयोग, कैग, सीबीआई, ईडी आदि के अलावा न्यायपालिका तक को अपने कब्जे में कर लिया ताकि विरोध के उठने वाले प्रत्येक स्वर को कुचल दिया जाए, जो बोले वही जेल के अंदर। जाहिर है कि लोकतांत्रिक कही जा सकने वाली कोई बात छोड़ी नहीं गई।
जनता का असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिये मदारी गिरोह ने अपना पूरा जोर साम्प्रदायिक जहर बोने में लगा रखा है। तमाम बिकाऊ टीवी चैनलों पर असल मुद्दों के बजाय हिन्दू-मुस्लिम जैसे साम्प्रदायिक मुद्दों पर जहरीली एवं भडक़ाऊ बहसें कराई जाती हैं। त्रस्त जनता को धर्म की अफीम चटा कर यह समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि उनका असल मुद्दा हिन्दू-धर्म की रक्षा करना रह गया है न कि महंगाई व बेरोजगारी से निजात पाना, न कि शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे मुद्दों की बात करना।
इतने लम्बे समय तक मदारी गिरोह का पाखंड एवं $फरेब ढोने के बाद अब जनता की आंख कुछ खुलने लगी है। इस गिरोह के प्रति जो अंधभक्ति सन् 2013-14 में विकसित हो गई थी वह अब ध्वस्त होती नजर आ रही है। दूसरी ओर राजनीतिक स्तर पर इन्हें चुनौती देने के लिये लगभग तमाम विपक्षी दलों ने भी इंडिया नामक गठबंधन खड़ा कर लिया है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2019 के चुनावों में मदारी गिरोह को मात्र 37 प्रतिशत वोट मिले थे। जाहिर है कि शेष 63 प्रतिशत मतदाता मदारी गिरोह के विरुद्ध खड़े थे। लेकिन इन मतों के विभाजन के चलते मदारी गिरोह कामयाब रहा। इस बार यानी 2023-24 चुनावों क ेलिए विपक्षी गठबंधन ने तय किया है कि वे अपने वोट को बंटने से रोकेंगे। इसके लिये मदारी गिरोह के सामने केवल एक संयुक्त प्रत्याशी खड़ा करेंगे। सत्ता की लालसा प्रत्येक दल व उसके नेता को रहती ही है, यह कोई नई बात नहीं है। लेकिन अब उनके सामने मजबूरी यह है कि यदि 2024 में भी मदारी गिरोह फिर से सत्तारूढ़ हो गया तो देश में $िफर कभी चुनाव नहीं होंगे। न कोई न्यायपालिका बचेगी और न कोई संविधान बचेगा। विरोध करने वाला कोई भी नेता जेल से बाहर नज़र नहीं आयेगा। इसी मजबूरी के चलते गठबंधन के घटकों को अपनी महत्वाकांक्षाओं को स्थगित करके चुनाव में उतरना होगा।
इसके बाद बड़ा सवाल ये आता है कि यदि गठबंधन मदारी गिरोह से सत्ता छीन लेने में कामयाब होता है तो वह करेगा क्या? सत्तारूढ़ होने के बाद वह जनता को क्या राहत देगा? क्या वह मदारी गिरोह द्वारा उठाये गये तमाम जनविरोधी कानूनों को रद्द करके 2014 से पहले वाली स्थिति में ला पाएंंगे? पेट्रोलियम पर बार-बार बढ़ाये गये उत्पाद शुल्क को पहले वाली स्थिति में ला पाएंगे? मदारी ने अपने जिन मित्रों पर देश का खजाना लुटाया है तथा देश की सम्पत्ति उनके हवाले की है क्या उसे वापस ला पायेंगे? शिक्षा एवं स्वास्थ्य के बजट में भारी कटौतियां करके, इन्हें जिस कदर जनसाधारण की पहुंच से बाहर कर दिया है, उसे वापस कर पायेंगे? शिक्षण संस्थानों सहित तमाम सरकारी विभागों में जिस कूरता एवं बेशर्मी के साथ नफरती जहर बोया गया है, क्या उसे आने वाली सरकार उसी क्रूरता से कुचल पायेगी?
अब तक के ज्ञात राजनीतिक इतिहास के मुताबिक कोई भी आने वाली सरकार कभी भी पिछली सरकार द्वारा थोपे गये टैक्सों एवं कटौतियों से निजात नहीं दिलाती। हर आने वाली सरकार सदैव उससे आगे की ओर चलती है। सरकारी उपक्रमों को बेचने का काम, शिक्षा एवं स्वास्थ्य की बजट में कटौतियां करने का काम तथा बैंकों का धन उद्योगपतियों पर लुटाने का काम तो पुरानी सभी सरकारें करती रही हैं। संवैधानिक संस्थानों का दुरूपयोग भी पुरानी सरकारें करती रही हैं। अंतर केवल इतना ही है कि मदारी गिरोह ने ये सारे काम छाती ठोंक कर पूरी बेशर्मी के साथ तथा तीव्र गति के साथ कर डाले।