फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) अक्टूबर का महीना समाप्ति की ओर है, हवा में खुनकी के साथ-साथ गति भी ठीक-ठाक है, इसलिए अभी वायु प्रदूषण ज्यादा महसूस नहीं हो रहा। परन्तु अगले कुछ दिनों में जहां वायु की गति स्थिर होन लगेगी और पटाखों का शोर व बारूदी धुंआ वातावरण में समा जाएगा तो प्रदूषण का स्तर यकायक बढऩे लगेगा। पटाखों एवं आतिशबाजी पर लगने वाली प्रशासनिक रोक पर धार्मिक उन्माद भारी पड़ता है। सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बावजूद धर्मान्ध लोग उसे चिढ़ाने के लिए उसके दरवाजे पर ही जम कर धुआंधार आतिशबाज़ी चलाते हैं, चलाएं ही क्यों न जब सरकार ही उनकी अपनी है। आतिशबाजी के अलावा निर्माण स्थलों व सड़कों से उडऩे वाली धूल, जगह-जगह जलते कूड़े के ढेर को प्रशासन पूरी तरह से नजर-अंदाज करता है। इसके अलावा बिजली ठप्प होने से चलते जनरेटर तथा सड़कों पर लगने वाले जाम से पैदा होने वाले प्रदूृषण को अनदेखा करने वाला शासन व प्रशासन पूरा दोष किसानों द्वारा पराली जलाने पर मढ़ देता है।
किसान ही एक ऐसा निरीह जीव है जिसको न तो न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलता है और पराली जलाने के नाम पर उसके विरुद्ध आपराधिक मुकदमे दर्ज होते हैं। विदित है कि बीते तीन-चार वर्षों से पराली जलाने के मामले नगण्य होते जा रहे हैं क्योंकि अब पराली के अनेकों वैकल्पिक सदुपयोग उपलब्ध होने लगे हैं। सरकार की मजबूरी यह है कि आतिशबाजी, कूड़े के ढेर जलाने, धूल को उडऩे से रोकने, बिजली आपूर्ति को सुचारू करके जनरेटरों के चलन को रोकना तो सरकार के बस में है नहीं। ले-दे कर एक किसान ही ऐसा जीव बचता है जिस पर पराली जलाने का आरोप थोप कर सरकार पतली गली से निकल लेती है। प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर शहर भर में कई स्थानों पर वायु प्रदूषण मापक यंत्र जो सरकार ने लगा रखे हैं, वे आज कल खराब पड़े बताए जा रहे हैं। वे यदि खराब न भी हों तो वे किसी तरह भी प्रदूषण घटाने का काम नहीं कर सकते। इनका काम केवल प्रदूषण की मात्रा बताना होता है। लेकिन इसके बताने के बावजूद भी सुधार का कोई ठोस काम होता नज़र आता नहीं है। ड्रामेबाजी के तौर पर ग्रैप (ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन पा्लान)लागू करके प्रशासन अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है। बलिहारी है शहरवासियों की, प्रदूषण स्तर 500, 600, 700 आदि चाहे जितना मर्जी पहुंच जाए, फेफड़ों आंखों के साथ-साथ ह्दय रोगी भी चाहे कितनी ही बढ़ते जाएं लेकिन बढ़ते वायु प्रदूषण के विरुद्ध कोई आवाज उठाने की जरूरत महसूस नहीं करते।
‘ग्रेप घोषित’ प्रदूषण निरंकुश खबर लिखते-लिखते प्रशासन ने ग्रेप लागू करने की घोषणा कर दी। कमजोर एवं लचर प्रशासनिक व्यवस्था के चलते बेचारा ग्रेप कागज़ों से बाहर नहीं निकल पा रहा। हार्डवेयर चौक बाटा आरओबी सहित तमाम छोटी-बड़ी सड़कों पर धूल के गुबार ज्यों के त्यों उठ रहे हैं। सड़कों पर बने गड्ढों को जिस मलबे से भरा गया था वह उड़ कर वातावरण को धूल-धुसरित कर रहा है। इसके अलावा सड़कों व उनके किनारों पर पड़ी धूल भी प्रदूषण को बढ़ा रही है। पानी के जिस छिड़काव तथा मशिनों द्वारा सड़कों पर झाड़ू लगाने के दावे भी धरती पर कहीं नज़र नहीं आ रहे। लगता है कागजों में ही इनके बिल बनाकर डकारे जा रहे हैं। कूड़े के ढ़ेर व टायर आदि जलाने पर पाबंदी के बावजूद बाटा चौक, हार्डवेयर चौक, प्याली चौक सहित शहर के विभिन्न भागों में सुबह-सवेरे धुएं को देखा जा सकता है। आखिर कहां सो रहे हैं ग्रेप लागू करने वाले?
15 अक्टूबर को प्रात: साढ़े चार बजे से नौ बजे तक तथा 16 अक्टूबर को प्रात: साढ़े पांच से साढ़े छ: बजे तक बिजली गुल होने के चलते शहर के बड़े रिहायशी इलाकों की गलियों में बड़े-बड़े जनरेटर धुआं उगलते रहे, क्या इसके द्वारा प्रशासन प्रदूषण घटाने में जुटा था? शहर की अधिकांश गलियों-मुहल्लों में अभी से पटाखों का धुआं-धार खेल देखा जा सकता है। धमाकों का शोर तथा बारूदी गंध के चलते शाम के समय सांस लेना भी दूभर हो रहा है। अपने आदेशों की दुर्दशा देखने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट इन्हें जारी करने से बाज नहीं आ रहा। झेंप मिटाने के लिए उसने ग्रीन पटाखों को एक निश्चित अवधि में चलाने का आदेश दिया है। आदेश तो भले ही दे दिया परन्तु पता सुप्रीम कोर्ट को भी है कि इसकी धज्जियां उडऩी निश्चित है। किसको फुर्सत है कि वह जांच करता $िफरे कि फुटने वाले पटाखे हरे थे या लाल? इसके अलावा ग्रीन पटाखे भी ऑक्सीजन छोडऩे वाले तो हैं नहीं, छोड़ेंगे तो जहरीला धुआं ही। हर साल होने वाली यही कवायत इस बार भी होनी तय है। इसके कारण दिल्ली एवं पूरा एनसीआर गैस चेंबर में परिवर्तित होना निश्चित है।