ठेका जेई के लिए मंंत्री से बड़ा विधायक धनेश अदलखा

ठेका जेई के लिए मंंत्री से बड़ा विधायक धनेश अदलखा
September 15 19:13 2025

फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) कहने को तो कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल स्थानीय शहरी निकाय विभाग के मंत्री हैं लेकिन नगर निगम में एचकेआरएन के जेई व अन्य कर्मचारियों के लिए बडख़ल विधायक धनेश अदलखा ही उनका माई-बाप है। बीते दिनों नगर निगम, एफएमडीए आदि में तैनात अधिकतर ठेका कनिष्ठ अभियंताओं ने विधायक धनेश अदलखा के कार्यालय जाकर फूल मालाओं से उनका सम्मान किया। अदलखा ने एचकेआरएन के अभियंताओं को पक्का करने और प्रमोशन देने का मुद्दा सदन में उठाया था। रोजाना भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान गढ़ रहे ठेका कर्मचारियों को विधायक का उस समय साथ मिला है जब स्थायी अभियंताओं ने इन बिना उत्तरदायित्व वाले कर्मचारियों के अधिकार सीमित करने का अभियान चला रखा है।

नगर निगम में इन दिनों स्थायी बनाम एचकेआरएन इंजीनियरों के बीच जवाबदेही का मुद्दा तेजी पकड़े है। बताया जा रहा है कि बीते दिनों स्थायी जूनियर इंजीनियरों का प्रतिनिधिमंडल निगमायुक्त धीरेंद्र खडगटा से मिला और ठेका जेई को दिए गए अधिकार वापस लेने की मांग की। प्रतिनिधिमंडल का कहना था कि एचकेआरएन के जेई की कोई जवाबदेही नहीं होती इसलिए उनसे टेंडर न लगवाए जाएं, मीजरमेंट बुक (एमबी) भी न भरवाई जाए। नियमानुसार ठेका जेई से ये काम नहीं कराए जा सकते लेकिन नगर निगम में स्थायी अभियंताओं को दरकिनार कर इन्हें येे सारे अधिकार दे दिए गए हैं।
नतीजा ये है कि टेंडर में जमकर कमीशनबाजी हो रही है, ठेकेदार से मिलीभगत के कारण बिना काम, अधूरे काम की एमबी भरी जा रही है। गुणवत्ता सुनिश्चित होने का तो सवाल ही नहीं क्योंकि सारे बिल घर बैठे ही पास कर दिए जाते हैं। यानी सारे काम ठेका अभियंताओं के हाथ में और जवाबदेही स्थायी इंजीनियरों की। क्योंकि एचकेआरएन अभियंता नियमानुसार टेंडर जारी नहीं कर सकते इसलिए स्थायी इंजीनियर का नाम इस्तेमाल किया जाता है, इस आधार पर उसकी जवाबदेही भी तय कर दी जाती है।

यानी भ्रष्टाचार करें ठेका जेई जिनकी कोई जवाबदेही नहीं और उसकी गाज गिरती है स्थायी अभियंताओं पर। दरअसल, स्थायी इंजीनियर भी दूध के धुले नहीं हैं, अगर उन्हेें गलत लगता है तो टेेंडर, एमबी, बिल आदि पर हस्ताक्षर करने से मना कर दें, जिम्मेदारी लेने से साफ इनकार कर दें कि जिसने काम किया है जवाबदेही उसी की हो। सच्चाई ये है कि ये लोग हिस्सापत्ती मिलने के बाद ही हस्ताक्षर करते हैं, हां, ठेका जेई आने से अब मोटा हिस्सा वो रख लेता है और स्थायी वालों को कम माल मिलता है यही उनके दुख का कारण है। हालांकि, स्थायी अभियंताओं ने निगमायुक्त से लेकर कैबिनेट मंत्री तक को पत्र लिख कर ठेका जेई से नियमाुनसार काम कराने अन्यथा उनकी जवाबदेही तय करने की मांग की है। देखा जाए तो प्रतिनिधिमंडल को कमिश्नर से मांग करने की कोई आवश्यकता नहीं थी, यदि इनमें थोड़ी सी ईमानदारी होती तो ये अपने दस्तखतों को औने पौने दाम में बेचने से इनकार कर देते।

इधर, नगर निगम की वित्त कमेटी और उसके बाद हरियाणा फार्मेसी काउंसिल के चेयरमैन रहते हुए करोड़ों रुपयों की लूटमार करने के आरोपी और विजिलेंस की गिरफ्तारी से बचने के लिए महीनों फरारी काटने वाले अदलखा ने विधायक बनने के बाद समझ लिया कि मोटी लूट कमाई तो बिना उत्तरदायित्व वाले ठेका अभियंताओं के जरिए ही हो सकती है। इसका एक उदाहरण एनएच दो पंचकुइयां रोड वाली पुलिया है जिसे अदलखा के इशारे पर महज आठ महीने में कई बार तोडऩे-बनाने में दसियों लाख की बंदरबांट कर डाली गई। सैनिक कॉलोनी, रोज गार्डन, अनेक पार्क, नाले, सीवर लाइन जैसे अनगिनत कामों के नाम पर ठेका जेई विधायक भ्रष्टाचारी अदलखा के आदर्शों पर खरे उतरे।

सुधी पाठकों को बताते चलें कि मोदी-खट्टर की डबल इंजन सरकारों ने खजाना बचाने के लिए सरकारी महकमों में धीरे धीरे स्थायी पद समाप्त कर ठेका नौकरी व्यवस्था की शुरूआत की थी। कुछ जानकार कहते हैं कि आरक्षण विरोधी संघी-भाजपा ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण की बाधा समाप्त करने की साजिश के तहत ठेका व्यवस्था शुरू की थी। इसमें स्थायी पद से आधे या उससे भी कम दाम में ठेका कर्मचारी रखा जाता है। अस्थायी होने के कारण उसे सेवानिवृत्ति के बाद के लाभ, पेंशन आदि भी नहीं देनी पड़ती। जानकार यह भी कहते हैं कि सरकार ने ठेका व्यवस्था के तहत संघ-भाजपा कार्यकर्ताओं की बड़े पैमाने पर भर्ती की, यदि प्रतियोगिता के तहत भरती की जाती तो उनमें से अधिकतर परीक्षा पास नहीं कर सकते थे। यानी ठेका व्यवस्था के तहत अधिकतर अयोग्य कार्यकर्ताओं की भर्ती की गई।

यह बात इससे साबित होती है कि सरकार ने समय समय पर इंजीनियरों के स्थायी पदों की भी वेकेंसी निकाली, अधिकतर ठेका अभियंताओं ने स्थायी होने की गरज से फार्म भरे लेकिन परीक्षा ही पास न कर सके। जानकार बताते हैं कि क्योंकि ठेका नौकरी निश्चित समय के लिए ही दी जाती है, आगे काम करने के लिए काँन्ट्रैक्ट रिन्यू करना पड़ता है इसलिए इन्हें स्थायी नहीं किया जा सकता। क्योंकि ये अस्थायी पद हैं इसलिए इन्हें जिम्मेदारी भी नहीं दी जाती। कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल यह बात अच्छी तरह से जानते हैं इसलिए मोदी-खट्टर-सैनी सरकारों की मंशा के खिलाफ नहीं गए और ठेका अभियंताओं के बारे में कुछ नहीं कहा। यह बात तीस से पैंतीस हजार वेतन पाने वाले लेकिन महंगी कार, एक नहीं दो-दो आईफोन के मालिक प्रतिमाह लाखों रुपये खर्च करने वाले ठेका जेई अच्छी तरह से जानते थे। ऐसे में उन्हें भ्रष्टाचारी अदलखा ही उनका पक्ष रखने वाला नजर आया। अदलखा ने भी विकास के नाम पर करोड़ों रुपये की बंदरबांट करने वाले ठेका अभियंताओं को स्थायी करने और उनका प्रमोशन करने की मांग विधानसभा में रख दी। जानकार बताते हैं कि काँन्ट्रैक्ट कर्मचारी होने के कारण कानून में उनको स्थायी करने का कोई प्रावधान नहीं है, दूसरे अस्थायी होने के कारण उनकी पदोन्नति भी नियमानुसार संभव नहीं है। अदलखा भी अच्छी तरह जानता है कि सरकार इन्हें स्थायी नहीं करने जा रही, यदि स्थायी नियुक्ति ही देनी होती तो ठेका व्यवस्था लाई ही नहीं जाती। अदलखा ने यह खेल सिर्फ ठेका अभियंताओं को अपने मनमाफिक काम कराने के लिए खेला है।

समझने वाली बात यह है कि विपुल गोयल इस महकमे के मंत्री हैं यानी वह अपने विभाग के लिए निर्णय लेने नए नियम बनाने में सक्षम हैं लेकिन ठेका जेई उनके पास न जाकर अदलखा के पास गए जो विधानसभा में केवल बातें उठा सकते हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ठेका कर्मचारियों का मुद्दा केवल दिखावा है, मूल बात तो विपुल गोयल पर निशाना साधना है। बहुत संभव है कि अदलखा ने केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर के इशारे पर मंत्री विपुल गोयल को असहज स्थिति में लाने के लिए उनके मंत्रालय में दखल करने वाला सवाल उठाया हो। राजनीतिक निशानेबाजी मेंं एचकेआरन जूनियर इंजीनियर खुश हो रहे हैं, आने वाले दिनों में सामने आएगा कि सरकार कुछ नहीं करने जा रही, इसके पीछे नियम और तकनीकी पेंच होने का हवाला देकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। अब देखना है कि कैबिनेट मंत्री का इस मामले में क्या रुख रहता है।

सरकार तबादले तो कर नहीं रही, पदोन्नत क्या खाक करेगी
निगम के जानकारों के अनुसार एचकेआरएन कर्मचारियों की सेवा नियमावली में उनका तबादला किए जाने का प्रावधान है। नगर निगम में 2010 से ठेका जेई तैनात हैं और 2016 के बाद से एचकेआरएन के कर्मचारी। इतने वर्षों से टिके होने के बावजूद आज तक इनमें से एक का भी तबादला नहीं किया गया है। निगम सूत्रों के अनुसार अधिकतर एचकेआरएन के जेई दूसरे जिलों से आते हैं, कोई सोनीपत से तो कोई गुडग़ांव, पलवल से यहां तक कि उत्तर प्रदेश से भी आते हैं। बीस से तीस लाख रुपये वाली कार के मालिक ये जेई शाम होते ही मुख्यालय छोड़ कर अपने घर रवाना हो जाते हैं। इनका वेतन तो पैंतीस हजार है लेकिन केवल डीजल-पैट्रोल और टोल टैक्स में ही ये प्रतिमाह दस से पंद्रह हजार रुपये खर्च कर देते हैं। ब्रांडेड कपड़े, जूते, आईफोन, लेटेस्ट महंगे गैजेट्स इनके वेतन से कहीं अधिक के होते हैं। जानकार कहते हैं कि यदि इन कर्मचारियों का अपने गृह जनपद में तबादला कर दिया जाए तो कम से कम ये लोग रोजाना अपना मुख्यालय तो नहीं छोड़ेंगे और न ही महंगी गाडिय़ो में डीजल पेट्रोल पर इनका बीसियों हजार खर्च होगा। अपने शहर को अच्छी तरह से समझने के कारण शायद ये लोग वहां बेहतर काम करें। कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल के हाथ में यह करना तो है, देखना है कि वह अदलखा के खास चेलों को यहीं रहने देते हैं या फिर उनके गृह जनपद भेजेंगे।

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