फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) स्वास्थ्य जैसी आधारभूत नागरिक सुविधा को व्यापारीकरण के नाम पर मुनाफाखोरों के हाथों सौंपने के मोदी-सैनी डबल इंजन सरकारों के जनविरोधी फैसले के परिणाम सामने हैं। बीके अस्पताल में खट्टर-विज सरकार द्वारा 2017 में पीपीपी मोड पर शुरू किया गया हार्ट सेंटर बीते करीब डेढ़ महीने से बंद है। कारण वही पुराना, ठेकेदार कंपनी यानी मेडिट्रिना हॉस्पिटल ग्रुप हार्ट सेंटर अपनी शर्तों पर यानी मरीजों को लूटने की छूट और घपले-घोटाले करने की छूट चाहता है। इलाज नहीं मिलने के कारण बीते करीब डेढ़ महीने में न जाने कितने हृदयरोगी अकाल ही मौत का शिकार हो गए और सरकार जानबूझ कर अंधी बहरी, लूली लंगड़ी बनी बैठी है। यदि पीडि़तों की आवाज उस तक पहुंचती तो वह उन्हें इलाज दिलाने के लिए हाथ पैर हिलाती यानी ठेकेदार कंपनी को सेवा शुरू करने या फिर परिणाम भुगतने की चेतावनी दे चुकी होती। लेकिन जब सरकार ही पूंजीपति ठेकेदार की गोद में बैठी हो तो यही होना है।
बीके अस्पताल की तीसरी मंजिल पर चल रहे हार्ट सेंटर में एंटी करप्शन ब्यूरो ने नवंबर 2024 में छापा मार कर वहां बड़े पैमाने पर चल रही धांधलियों को पकड़ा था। यहां आयुष्मान कार्ड धारक यानी गरीब मरीजों का भुगतान मरीज से भी वसूला जा रहा था और सरकारी योजना से भी। इतना ही नहीं एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्टी और स्टेंट डालने में एक बार इस्तेमाल किए जाने वाले सामान को कई मरीजों में इस्तेमाल किया गया। इस्तेमालशुदा सामान लगाए जाने से कम से कम दो मरीजों की मौत होने की भी पुष्टि विजिलेंस जांच में हुई थी।
इतनी धांधलियां पकड़े जाने के बाद हार्ट सेंटर कुछ दिन बंद रहा। इसके बाद सरकार के हस्तक्षेप से शुरू हुआ। हार्ट सेंटर के नवंबर 2024 के रिकॉर्ड के अनुसार यहां रोजाना 200 मरीज ओपीडी में आते हैं। रोजाना 85 मरीजों की ईको जांच होती है, 15 मरीजों की एंजियोग्राफी होती थी, औसतन इतने ही मरीजों की एंजियोप्लास्टी यानी स्टेंट डाला जाता था। हृदयाघात जैसे गंभीर केस भी चार-पांच आते थे। यदि उसी औसत को लिया जाए तो बीते करीब डेढ़ महीने में लगभग नौ हजार मरीज ओपीडी से वंचित हो चुके हैं, करीब साढ़े बारह सौ मरीजों की ईको जांच नहीं हो सकी है, सवा दो सौ मरीजों की एंजियोग्राफी और इतने की ही एंजियोप्लास्टी नहीं हो सकी। समय पर इलाज न मिलने के कारण न जाने कितने हृदयरोगियों की मौत भी हो गई।
इन मरीजों को इलाज की सुविधा उपलब्ध कराना सीएम सैनी और उनकी स्वास्थ्य मंत्री आरती राव की जिम्मेदारी है लेकिन न तो सैनी ने और न ही राव ने हार्ट सेंटर चलवाने में कोई दिलचस्पी दिखाई। मेडिट्रिन हॉस्पिटल ग्रुप प्रबंधन के डॉ. एन प्रथाप कुमार ने शर्त रखी हैं कि जब तक सरकार हार्ट सेंटर के स्टॉफ पर दर्ज किए गए ‘झूठेÓ मामलों रद्द नहीं करती, आयुष्मान योजना के तहत मरीजों के किए गए इलाज की बकाया राशि का भुगतान नहीं करती तब तक फरीदाबाद हार्ट सेंटर का संचालन नहीं किया जाएगा, क्योंकि हार्ट सेंटर संचालन के लिए कंपनी के पास फंडिंग की कमी हो गई है।
डॉ. प्रथाप ने जिस आत्मविश्वास से मांगें रखीं और सरकार चुप्पी साधे रही उससे तो लगता है कंपनी को संघी-भाजपाई सरकारों का संरक्षण प्राप्त है। होना तो यह चाहिए था कि सैनी और मंत्री आरती राव को कंपनी प्रबंधन पर बिना शर्त तत्काल चिकित्सा सेवाएं शुरू करने का दबाव बनाना चाहिए था। मामले की निष्पक्ष जांच कराने और परिणाम के अनुसार कार्रवाई करने का सीधा जवाब देना चाहिए था। हां, आयुष्मान योजना के तहत बकाया बिल का भुगतान कर दिया जाए ताकि कंपनी के पास फंड की कमी का बहाना न रहे, जांच में गड़बड़ी पाए जाने पर ब्याज सहित वसूली कर ली जाती।
पूंजीपतियों की गोद में बैठी सरकार यह सब नहीं करेगी, करे भी क्यों जब पीडि़त यानी आम जनता ही अपने हक के लिए आवाज उठाने या आंदोलन करने को तैयार नहीं है। सरकार को क्या पड़ी है कि मोटी कमीशनबाजी वाली व्यवस्था को खत्म कर हार्ट सेंटर खुलवाए। समझने वाली बात यह है कि आम नागरिक को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सरकार की है। यदि पीपीपी मोड पर हार्ट सेंटर नहीं चल रहा तो सरकार अपने अस्पताल में बने इस हार्ट सेंटर का प्रबंधन खुद संभाले और कैथलैब को जब्त करके अपनी ओर से कुछ सुपरस्पेशलिस्ट स्टाफ नियुक्त करके इसको चालू कर सकती है। लेकिन यह सब तो सरकार तो तब करेगी न जब उसकी जनहित में कोई रुचि हो, उसे तो ढिंढोरेबाजी, नाटकबाजी व विभिन्न अय्याशियों से फुरसत नहीं।
गब्बर सिंह टैक्स (जीएसटी) की वसूली के रोजाना नए कीर्तिमान बना रही मोदी-सैनी की डबल इंजन सरकारें जनता से वसूले गए इस पैसे का इस्तेमाल स्वास्थ्य-शिक्षा जैसी आधारभूत सुविधाओं पर नहीं लगा रही है। सरकार की प्राथमिकता मेडिकल कॉलेज, अस्पताल नहीं हैं बल्कि हवाई अड्डा बनाना है। सैनी सरकार मेडिकल कॉलेजों के लिए तो दस-दस करोड़ की बात करती है, अकेले हवाई अडड़े के लिए 51 सौ करोड़ खर्च कर दिए। नगर निगम, एफएमडीए आदि लूट खसोट का अड्डा बने हुए हैं।