फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले में झूला गिरने से इंस्पेक्टर जगदीश की मौत और 12 अन्य लोगों के घायल होने का जिम्मेदार झूूला ठेकेदार शाकिर व सहयोगी नितेश को बता कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। खराब झूलों को रोजाना फिट होने का सर्टिफिकेट देने वाले अधिकारियों को भी हादसे के लिए जिम्मेदार ठहरा कर उनके खिलाफ केस दर्ज किया जाना चाहिए था लेकिन एफआईआर में इन्हें गायब कर दिया गया है।हस्तशिल्प उत्थान के नाम पर लगने वाले अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड मेले में महज 15 दिन के लिए हिमाचल केयर फन केयर नामक कंपनी ने 1 करोड़ 30 लाख रुपये में एम्यूजमेंट पार्क का ठेका लिया था। कंपनी प्रबंधन की नीयत लागत और फटीकों को निपटाने के बाद कम से कम तीस से चालीस लाख रुपये बचाना तो रही ही होगी। यह सब ज्यादा से ज्यादा झूले लगाकर ही हासिल किया जा सकता था, तो कंपनी ने दो झूलों के बीच सुरक्षित दूरी, ठोस आधार, सुरक्षा उपाय, इमरजेंसी निकासी आदि मानकों को दरकिनार कर अधिकतम वसूली मॉडल को अपनाया।
खास बात यह है कि इन झूलों को रोजाना निरीक्षण करने के लिए मेला प्रशासन और जिला प्रशासन की ओर से 9 सदस्यीय तकनीकी टीम बनाई गई थी। इस टीम में प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल, सिविल इंजीनियर के साथ दमकल विभाग के अधिकारी भी शामिल थे जिनका काम रोजाना निरीक्षण के बाद चलाने की अनुमति देना था। जानकार बताते हैं कि प्रत्येक झूले के लिए सुरक्षा के मानक तय हैं, कोई झूला आगे-पीछे या दायें बाएं गिरने पर कितनी जगह लेगा, कम से कम उतनी जगह खाली रखी जाती है ताकि इन हालात में अन्य लोग गिरते झूले की चपेट में न आएं। मेले में तो हैमर स्विंग झूले के करीब ही दो अन्य झूले लगाए गए थे, ये तीनों ही एक दूसरे के सुरक्षा जोन का उल्लंघन कर रहे थे। इतना ही नहीं झूलों के फ्रेम ज़ंग लगने के कारण कमजोर थे, कई झूले बिना सेफ्टी बंध, ढीले नट-बोल्ट के बावजूद चलाए जा रहे थे।
इतने सारे काबिल अधिकारियों ने झूले लगाने के समय ही मानकों के उल्लंघन की अनदेखी क्यों की? यही अधिकारी रोजाना इंस्पेक्शन करने के बाद चलने योग्य होने का सर्टिफिकेट देते थे समझा जा सकता है इसके लिए झूला ठेकेदार साहब लोगों की सेवा करता होगा।डेढ़ करोड़ रुपये खर्च करने वाला ठेकेदार तो मोटा मुनाफा कमाने और खर्च बचाने के लिए सुरक्षा मानकों के साथ खिलवाड़ कर सकता है, हादसे के लिए वो नौ अधिकारी भी उतने ही जिम्मेदार होने चाहिए जिन्होंने इतनी कमियों-खामियों पर आंखें बंद रखीं और झूला चलाने की अनुमति दी।इसके विपरीत प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि हादसे का ठीकरा केवल ठेकेदार पर फोड़ कर जिम्मेदार अधिकारियों को बचाया जाएगा। इसकी भूमिका मैकेनिकल फॉल्ट होने का बहाना बना कर तैयारी की जा रही है। यानी मशीन में मैकेनिकल फॉल्ट था जिसकी जांच नहीं की जा सकती थी। सवाल यह है कि टीम में मैकेनिकल इंजीनियर किसलिए रखा गया था। क्या उसका काम गियर, शाफ़्ट, बियरिंग, चेन, आदि की जांच रोजाना नहीं करना था, कोई झूला अचानक नहीं टूटता, उसमें कई दिन पहले ही फॉल्ट आने लगता है लेकिन समय पर मरम्मत नहीं होने से खामी बढ़ती जाती है और हादसा हो जाता है, हैमर स्विंग में भी जिस तरह शाफ्ट बाहर निकलने से झूला गिरा, उससे लगता है कि शॉफ्ट में समस्या थी जिसे यदि टीम के ‘होनहार सरकारी’ इंजीनियरों ने जांच लिया होता तो यह हादसा न होता।
यदि उक्त तर्क को सही मान लिया जाए तो फिर ठेकेदार शाकिर और नितेश को किस आधार पर गिरफ्तार किया गया यानी जिस फॉल्ट को इंजीनियर नहीं पकड़ सके उसको ठेकेदार कैसे पकड़ सकता था। घटना से मेला प्रबंधन ने बस इतना सबक लिया कि झूले बंद करवा दिए। क्या यह समाधान है, होना तो यह चाहिए था कि सभी झूलों का पूरी तरह इंस्पेक्शन कर दोबारा चलवाया जाता।