पंजाब जीतने को निकले मोदीजी
कुरुक्षेत्र (मज़दूर मोर्चा) लगभग सभी बड़े एवं महत्वपूर्ण राज्यों को जीतने के बाद, अब मोदी का निशाना पंजाब पर है। वहां अकालियों का सफाया तो मोदी जी बहुत पहले ही कर चुके थे, आम आदमी पार्टी अपना जहाज डुबोने में खुद ही कोई कसर नहीं छोड़ रही और कांग्रेस की दाल भी वहां गलती नजर नहीं आ रही। ऐसे में मोदी को पंजाब जीतना शायद काफी सरल दिख रहा है। इसके लिए इन्होंने कैप्टन अमरेन्द्र सिंह को भाजपाई चेहरा बनाने का निश्चय भी कर लिया है। इसी राह पर आगे बढ़ते हुए मोदी सरकार ने गुरु तेग बहादुर के 350 वीं शहीदी दिवस यानी 25 नवम्बर को सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया। इतना ही नहीं इस अवसर पर ज्योतिसर गुरुद्वारे में हुए एक समागम में मत्था टेकने भी जा चहुंचे। दाढ़ी तो मोदी जी के चेहरे पर है ही, सिखों वाली पगड़ी बांध कर, असली न सही नकली सिख तो बन ही गए। किसान आंदोलन के वक्त जिन सिखों को ये आतंकवादी और खालिस्तानी बताते थे, अब उन्ही के गीत गाने लगे। भाजपा द्वारा मोदी की रैली करानी हो अथवा नायब सिंह सैनी की, जनता तो बिल्कुल आती नहंीं। ऐसे में मोदी की रैली में भीड़ जुटाने के लिए तमाम सरकारी संसाधनों का खुल कर पूरी बेशर्र्मी के साथ दुरुपयोग किया गया।
ऐसा करते वक्त शासन-प्रशासन ने यह समझने की जहमत नहीं उठाई कि इससे जनता को क्या-क्या दिक्कतें पेश आएंगी। हरियाणा रोडवेज की बसों को अपनी निजी सम्पत्ति मानते हुए भाजपा सरकार ने सभी जिलों से भीड़ ढ़ोकर लाने के लिए बसों को लगा दिया। फरीदाबाद डिपो से भी इस सरकारी बेगार के लिए 60 बसों को लिया गया था। इन्हें मंगलवार सुबह पांच बजे ही डिपो से निकाल कर सभी मुख्य गांवों चावला कॉलोनी, मोहना, गांव अरुआ, छांयसा, फतहपुर बिल्लौच, सागर पुर, साहपुरा, धौज, बदरपुर बार्डर आदि-आदि में भेजा गया था। जानकारों के मुताबिक संघ व भाजपा के कार्यकर्ता किसी भी बस में 20 से अधिक लोगों को नहीं भर सके। अंतत: 10 बसें तो ऐसी बच गई जिनमें एक भी सवारी ये लोग नहीं बैठा पाए। जाहिर है ये बसें बेगार से मुक्ति पाकर डिपो में वापस लौट आई और अपने निर्धारित रूटों पर चल निकली।
सर्वविदित है कि राज्य भर में सार्वजनिक परिवहन का हाल पूरी तरह से बेहाल है। स्थानीय शहरी स्तर पर चलने वाली बसों की बात तो छोडिय़े लम्बी दूरी की बसों का भी नितांत आभाव रहता है। जिस डिपो से 50-60 बसें यकायक हटा कर मोदी की फटीक में लगा दी जाय तो उन यात्रियों का क्या हाल हुआ होगा जिनका आवागमन इन्हीं बसों पर निर्भर करता है। स्कूलों- कॉलेजों में जाने वाले विद्यार्थी, अस्पतालों में जाने वाले मरीज, दफ्तरों में जाने वाले बाबू तथा फैक्टरियों में जाने वाले मज़दूर, किस कठिनाई से अपना सफर तय कर पाएं होंगे इसकी चिंता भाजपाई सरकार को कतई नहीं है। यह तो रहा जनता की मुसीबतों का हाल बाकी, पहले से ही घाटे में चलने वाली रोडवेज को कितना भारी नुक्सान इस बेगार से हुआ इसकी कोई चिंता सरकार को नहीं है। चिंता की जरूरत भी क्या है, घाटा जनता भुगतेगी सरकार के बाप का क्या जाता है?