फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) भ्रष्ट एवं सेवानिवृत्त डिप्टी डीईओ अनिता शर्मा, बर्खास्त डिप्टी सुपरिंटेंडेंट दीपक कपूर तथा महाभ्रष्ट मास्टर यतीन्द्र शास्त्री षडय़ंत्र रच कर सेवानिवृत्त हो चुके शिक्षक ललित भारद्वाज के विरुद्ध आईपीसी की धारा 420 के तहत थाना सराय ख्वाजा में एफआईआर नम्बर 11 दर्ज कराने में सफल हो गए। शिक्षा विभाग के इस स्थानीय गिरोह को संरक्षण एवं हर प्रकार का सहयोग प्रदान करने वाली दो महिला अधिकारी शिक्षा निदेशालय पंचकूला में मौजूद हैं। एक हैं असिस्टेंट डायरेक्टर हरिता मलिक जिनकी खुद की नियुक्ति ही संदिग्ध होने के चलते हाईकोर्ट में विचाराधीन है। दूसरी हैं भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी डिप्टी डायरेक्टर शकुंतला सिंधु।
1988 में धोखाधड़ी के बल पर शिक्षक नियुक्त हुई अनिता शर्मा की हेराफेरी पकड़े जाने पर 1995 में बर्खास्त कर दिया गया था। इसके विरुद्ध वे पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंची और स्थगन आदेश प्राप्त करके नौकरी में बनी रही। स्थगन आदेश पाने में शिक्षा निदेशालय की मिलीभगत इतनी जबरदस्त थी कि वर्ष 2012 तक केस को सुनवाई तक ही नहीं आने दिया। इस बीच वह बराबर पदोन्नतियां पाती चली गई। सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि जब बिना योग्यता के ही इतनी लम्बी नौकरी कर ली तो अब इसे हटाने का क्या मतलब? यानी कि हाईकोर्ट द्वारा समय पर सुनवाई न करने का पूरा-पूरा लाभ अनिता शर्मा को मिला।
दीपक जो फर्जी डिग्रियों के आधार पर अकाउंटेंट की नियुक्ति पाकर भ्रष्टाचार के एक से बढ़ कर एक कीर्तिमान स्थापित करने में जुटा था, पोल खुलने पर न केवल बर्खास्त कर दिया गया बल्कि मुख्यालय के आदेश पर उसके विरुद्ध एफआईआर भी दर्ज कराई गई। जैसे-तैसे एफआईआर दर्ज तो हो गई लेकिन कार्रवाई के नाम पर आज तक निल बटा सन्नाटा छाया है। तीसरे महारथी हैं यतिन्द्र शास्त्री जिन्होंने गांव सेहतपुर में स्कूल भवन का ऐसा घटिया निर्माण कराया था जो इस्तेमाल करने लायक नहीं था और जिसके तोडऩे पर भी लाखों रुपए खर्च हो गए। इसे लेकर इनसे 60 लाख की रिकवरी तथा एफआईआर दर्ज कराने के आदेश शिक्षा निदेशालय द्वारा किए गए थे। इसके अलावा बच्चों की ड्रेस व पुस्तकें आदि खरीद के नाम पर डकारे गए 37 लाख की रिकवरी भी अभी तक ठंडे बस्ते में पड़़ी है। उक्त दोनों महिला अधिकारियों, हरिता मलिक व शकुंतला सिंधु द्वारा बनाई गई जुगाड़बाजी के चलते यतिन्द्र से न तो कोई रिकवरी हुई और न ही एफआईआर हुई, उल्टे उनकी पदोन्नति की तैयारी चल रही है।
षडय़ंत्रकारियों का गिरोह केवल उक्त लोगों तक ही सीमित नहंीं हैं। इसकी जड़ें मुख्यालय से लेकर राज्य भर में फैली हुई है। इनको अत्यधिक मजबूती तब मिलती है जब विभाग के आईएएस अधिकारी तथा मंत्री खुद लूट कमाई में हिस्सा बंटाने लगते हैं। गिरोह के लोग सामूहिक तौर पर उस कर्मचारी अथवा अधिकारी से बदला लेने का भरपूर प्रयास करते हैं, जो इनके विरुद्ध शिकायतें करके इनकी पोल खोलते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत शिक्षक ललित भारद्वाज भी हैं जिनके द्वारा इनकी पोल-पट्टी खोली गई थी। उसका बदला लेने के लिए इन्होंने भारद्वाज के विरुद्ध उक्त एफआईआर दर्ज कराई है।
विदित है कि ललित भारद्वाज बीए पास करने के बाद भारतीय सेना में क्लर्क के पद पर भर्ती होकर असम में तैनात हो गए थे। उस वक्त उनका नाम लालाराम था जिसे बदल कर इन्होंने ललित भारद्वाज कर लिया। इसके लिए उन्होंने तमाम कानूनी प्रक्रियाएं पूरी की। इनके तमाम दस्तावेजी सबूत स्वयं इस संवाददाता ने भी देख लिए हैं। वहां तैनाती के दौरान भारद्वाज ने नार्थ ईस्ट की सेंट्रल यूनिवर्सिटी से बीएड की नियमित पढ़ाई करके डिग्री प्राप्त की। इसके लिए उन्होंने बाकायदा अपने कमांडिंग ऑफिसर से स्वीकृति प्राप्त की थी। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद स्थित यूनिवर्सिटी से डिस्टेंस द्वारा एमए इंग्लिश की डिग्री प्राप्त की।
करीब 12 साल तक सेना की नौकरी से फारिग होकर वे हरियाणा शिक्षा विभाग में मास्टर के पद पर नियुक्त हो गए। सेवानिवृति से करीब दो साल पूर्व, हाई कोर्ट के आदेश पर पदोन्नत होकर वे लेक्चरर बन गए। जिन उक्त पाखंडी एवं धूर्त लोगों के विरुद्ध भारद्वाज ने शिकायतें की थीं, उन्होंने बदले की भावना से उनके विरुद्ध बाकायदा एक अभियान छेड़ दिया था। उन पर लगे उक्त तमाम आरोपों यानी नाम बदलना, नौकरी में होते हुए रेगुलर बीएड की पढ़ाई करना तथा विभिन्न दस्तावेजों पर नाम बदलने को लेकर, उनके विरुद्ध एक के बाद एक शिकायतों का सिलसिला चला दिया था। उन तमाम शिकायतों की पूरी जांच-पड़ताल एवं दस्तावेजों को जांचने के बाद तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी रितु चौधरी ने उन पर लगे तमाम आरोपों को झूठा पाकर फाइल बंद कर दी थी। लेकिन धूर्त गिरोह के लोग जिनकी शिक्षा निदेशालय में भी पूरी पैठ होने के चलते, शिकायतों का सिलसिला चलाते रहे। उन फर्जी शिकायतों के आधार पर शकुंतला सिंधु व हरिता मलिक ने जुगाड़बाजी करके कोई जांच कार्रवाई चला दी। किसी को नहीं पता कि जांच अधिकारी कौन था, उसके सामने क्या दस्तावेज पेश किए गए और तो और पीडि़त भारद्वाज को भी इसकी कोई सूचना नहीं दी गई। इस मामले में तो आरटी आई एक्ट भी पूरी तरह फेल हो गया क्योंकि भारद्वाज द्वारा आरटीआई लगाने पर भी उन्हें इस बाबत कोई सूचना नहीं दी गई।
प्रशासनिक अधिकारियों को घुम्मनघेरी में डालने के लिए उक्त गिरोह ने कभी सीएम विंडो पर तो कभी लोकायुक्त के यहां एक के बाद एक शिकायतें डालने का सिलसिला तेज कर दिया। लोकायुक्त के यहां डाली शिकायत में तो $फरीदाबाद के पुलिस कमिश्नर को भी पार्टी बना लिया गया था। पूरे मामले की तह में जाने की बजाय मात्र फाइल को धक्का देकर जान छुड़ाने के इरादे से पुलिस ने इस केस में एफआईआर दर्ज करना ही बेहतर समझा। इसके पीछे निदेशालय में बैठी शकुंतला सिंधु की भी विशेष भूमिका रही। उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर जिला शिक्षा अधिकारी तथा सराय ख्वाजा स्कूल के प्रिंसिपल तथा बीईओ को पत्र लिख कर शीघ्रातिशीघ्र एफआईआर दर्ज कराने पर जोर दिया।
यदि प्रशासनिक अधिकारी केवल फाइलों को धक्का देने की बजाय मामले की तह में गए होते तो इन तमाम प्रपंच कार्यों के विरुद्ध ही उचित कार्रवाई करके इस मामले को सदा के लिए निपटा सकते थे। अब मामला क्योंकि पुलिस के पास आ चुका है तो उसे इसकी तह में जाकर तमाम दस्तावेजों को सफामिसल पर लाकर न केवल एफआईआर रद्द करनी चाहिए बल्कि झूठा बवंडर खड़ा करके पुलिस को गुमराह करने वालों को सबक सिखाने के लिए सीआरपीसी की धारा 182 के तहत कार्रवाई करके इस गिरोह को उचित सबक सिखा देना चाहिए। संदर्भवश यह भी जान लेना चाहिए कि इसी अनिता शर्मा ने भारद्वाज के विरुद्ध थाना एनआईटी में एफआईआर नम्बर 183 दिनांक 26 जून 2024 को आईपीसी की धारा 506 व 34 के तहत दर्ज कराई थी। शिकायत झूठी पाए जाने पर एफआईआर तो रद्द कर दी गई लेकिन शिकायतकर्ता के विरुद्ध कोई कार्रवाई न करने के चलते ये लोग बार-बार झूठे मुकदमे दर्ज करा रहे हैं।