मंत्री राजेश नागर पेश कर रहे हैं खरीद के झूठे दावे फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) किसानों द्वारा उपजाया गया धान हो या गेहूं, हर साल बड़ी मात्रा में बिकने के लिए मंडियों में आता है। फसल के भाव को गिरने से रोकने के लिए सरकार द्वारा इसे अपनी घोषित दरों पर खरीदना होता है। इसी को एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य कहा जाता है। सदैव एक निश्चित समय पर आने वाली फसल को सरकारी एजेंसियों द्वारा न सम्भाले जाने के कारण हर साल लाखों टन धान व गेहूं बरसात में भीग कर बर्बाद हो जाता है जिसकी बड़ी हानि किसान को झेलनी पड़ती है।
पिछले वर्षों की भांति इस वर्ष भी पलवल, होडल, हथीन, मोहना आदि की मंडियों में आया धान बारिश में भीग कर बर्बाद हो रहा है। केवल यही नहीं पूरे राज्य की तमाम मंडियों में पड़े लाखों टन धान के साथ यही हो रहा है। भीगे धान में नमी बढऩे के चलते भाव में भारी कटौती होने से किसान को काफी आर्थिक नुक्सान होता है। विदित है कि राज्य सरकार द्वारा बाकायदा मंडी बोर्ड बनाया हुआ है। इसका काम मंडियों का प्रबन्धन करना तथा किसानों के लिए तमाम तरह की सुविधाएं उपलब्ध कराना होता है। इसके लिए मंडियों में बड़े-बड़े शेड बनाने के साथ-साथ ऐसी व्यवस्था करना होता है कि जिससे फसल भीगने न पाए। तमाम तरह के निर्माण कार्यों के लिए मंडी बोर्ड ने बाकायादा पीडब्लूडी के तर्ज पर पूरा महकमा खड़ा कर रखा है जिसमें जेई से लेकर एसडीओ एक्सीएन तथा एससी तक बैठा रखे हैं। इसी महकमे द्वारा कुछ महत्वपूर्ण ग्रामीण सड़कों का निर्माण भी कराया गया है ताकि किसानों को गांव से मंडी तक फसल को लाने में दिक्कत न हो।
इसके अलावा मंडी सचिव व तरह-तरह के छोटे-बड़े बाबू भी मंडी बोर्ड ने पाल रखे हैं जो सरकारी टैक्स के अलावा मोटी रिश्वतखोरी का धंधा भी बेखौफ होकर करते हैं। इसके दो मामले जो विजिलेंस द्वारा पकड़े गए थे उनका वर्णन ‘मज़दूर मोर्चा’ 20-26 जुलाई 2025 के अंक में ‘रिश्तखोर को रंगे हाथों पकडऩा अब खेल-तमाशा बन चुका है’ शीर्षक से प्रकाशित किया था।
तमाम सरकारी हरामखोरियों के बावजूद राज्य के खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री राजेश नागर पूरी बेशर्मी के साथ शेखी बघारते हुए झूठे आंकड़े पेश करते हुए कहते हैं कि मंडियों में 13 लाख टन धान आया जिसमें से 10 लाख टन खरीद लिया गया है। इसमें से आधा यानी पांच लाख टन धान का उठान भी हो चुका है। इसके लिए सरकार ने खूब रुपये खर्च कर दिए हैं। झूठ बोलने वाले इस मंत्री की बात को यदि सच मान लिया जाए तो तीन लाख टन की तो खरीद हुई ही नहीं और खरीदे हुए 10 लाख टन में से भी पांच लाख टन का उठान मंडियों से हुआ नहीं, तो इसका जिम्मेवार कौन है यह तो मंत्री जी नहीं बताएंगे। वास्तव में खरीद करने वाली सरकारी एजेंसियों के पास न तो बारदाने का पर्याप्त प्रबन्ध है और न ही भ्रष्ट कर्मचारियों की नीयत सही ढंग से खरीदारी करने की है। जानकारों के मुताबिक जिस खरीदारी का दावा मंत्री जी कर रहे हैं, दरअसल उसका अधिकांश भाग निजी व्यापारियों ने खरीदा है। ये व्यापारी खरीद के तुरन्त बाद माल को उठा कर उपने गोदामों में भेज देते हैं जबकि सरकारी माल वहां पड़ा सड़ता रहता है।