सरकारी बीके अस्पताल में इलाज तो दो सरकार, फिर प्राइवेट बेड भी बेच लेना

सरकारी बीके अस्पताल में इलाज तो दो सरकार, फिर प्राइवेट बेड भी बेच लेना
April 30 16:38 2025

फऱीदाबाद (मज़़दूर मोर्चा) बीके अस्पताल भले ही आने वाले गंभीर मरीजों को इलाज न दे पाए लेकिन उसकी जेब पर डाका डालने के लिए निजी अस्पतालों की तर्ज पर प्राइवेट वार्ड बनाएगा। प्राइवेट रूम के लिए मरीज से प्रतिदिन ढाई सौ रुपये वसूले जाएंगे। मुख्यमंत्री नायब सैनी द्वारा प्रदेश के सभी जिला अस्पतालों में निजी अस्पतालों की तर्ज पर भरती होने वाले मरीजों को निजी कमरा उपलब्ध कराने की घोषणा के आधार पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डॉ. जयंत आहूजा ने बीके अस्पताल में कमरे बनवाने की पहल शुरू कर दी है। उन्होंने पीएमओ डॉ. सतिंंद्र वशिष्ठ को कमरों का इंतजाम करने का निर्देश दिया है।

स्वास्थ्य मामलों के जानकार सैनी सरकार के इस कदम को स्वास्थ्य सेवाओं का व्यावसायीकरण करने के रूप में देख रहे हैं। इन लोगों के अनुसार बेहतर होता कि सरकार पहले सभी जिला अस्पतालों में पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करती। हालात ये हैं कि बीके सिविल अस्पताल में मेडिकल-पैरा मेडिकल स्टाफ का एक चौथाई भी नहीं है। यही कारण है कि इमरजेंसी में आने वाले मरीजों में से प्रतिदिन औसतन तीस को दिल्ली सफदरजंग अस्पताल रेफर किया जाता है। ये कोई बहुत गंभीर रोगी नहीं होते बल्कि विशेषज्ञ चिकित्सकों के अभाव में या इलाज के लिए पर्याप्त उपकरण न होने के चलते रेफर किए जाते हैं।

जिले में स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर करने और ट्रामा सेंटर खोलने की मांग के लिए करीब पांच माह से धरने पर बैठे समाजसेवी सतीश चोपड़ा कहते हैं कि मरीजों को ढाई सौ रुपये में फाइव स्टार सुविधाएं उपलब्ध कराने से ज्यादा जरूरी बीके अस्पताल में ढाई साल से बंद पड़े नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) और आईसीयू को चालू करने की है। सरकार इन यूनिट्स को चलाने के लिए जरूरी मानव संसाधन तो उपलब्ध नहीं करा रही है। करीब अठाईस लाख की आबादी वाली औद्योगिक नगरी में ट्रॉमा सेंटर तक नहीं है जो कि अति आवश्यक है।

ऐसा भी नहीं है कि बीके अस्पताल के पास उपकरणों की कमी है, सीएसआर के तहत अस्पताल के पास वेंटिलेटर, हार्ट-लंग मशीन सहित अन्य कीमती और बहु उपयोगी चिकित्सा उपकरण कचरे में पड़े हैं, सरकार इनके सदुपयोग का कोई इंतजाम नहीं कर रही लेकिन ढाई सौ रुपये में बेड बेचने को आतुर है। सतीश चोपड़ा कहते हैं कि जब सुविधाएं ही नहीं होंगी तो मरीज बीके अस्पताल आएंगे ही क्यों, बेड की नहीं इलाज की सुविधा होनी चाहिए।

समाजसेवी अनिल मेहता ने कहा कि सरकार की नजर में सभी नागरिक बराबर होने चाहिए और सबको बराबर सुविधाएं मिलनी चाहिए। बीके में प्राइवेट रूम बनाया जाना समानता के अधिकार का हनन है, गरीब आदमी तो ढाई सौ रुपये नहीं दे पाएगा इसलिए उसे बेड के अभाव में भगा दिया जाएगा जबकि पैसे वाला ढाई सौ रुपये देकर बेड आरक्षित करा लेगा, यह अन्यायपूर्ण व्यवस्था है। समझने वाली बात यह भी है कि प्रदेश की करीब ढाई करोड़ आबादी में करीब बावन लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं और सरकार से मिलने वाले पांच किलोग्राम राशन पर निर्भर हैं। इनमें से कोई भी परिवार ढाई सौ रुपये प्रतिदिन देने की हैसियत में नहीं है, बीमार पडऩे पर सबसे ज्यादा यही लोग सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने पहुंचते हैं, पैसे वाले तो वैसे भी निजी अस्पताल का ही रुख करते हैं। जानकारों की मानें तो आयुष्मान-चिरायु योजना में भी ढाई सौ रुपये प्रतिदिन बेड के भुगतान की व्यवस्था नहीं है, यानी ये योजना गरीबों के लिए नहीं है।

संदर्भवश, सुधी पाठकों को बताते चलें कि करीब सात दशक पहले बनाई गई बीके अस्पताल की पुरानी इमारत में भी प्राइवेट रूम बनाए गए थे। तब आबादी पच्चीस- तीस हजार हुआ करती थी। आबादी बढ़ी तो जरूरत के हिसाब से वर्तमान नई बिल्डिंग बनाई गई लेकिन स्थानाभाव के चलते इसमें प्राइवेट रूम नहीं बनाए गए थे। अब आबादी पच्चीस लाख से अधिक हो चुकी है और मरीजों की संख्या भी कई गुणा बढ़ गई है, ऐसे में अस्पताल के जनरल वार्ड, सर्जरी वार्ड, बर्न वार्ड, ऑर्थोपीडिक वार्ड आदि में बेडों की संख्या बढ़ाने या नए वार्ड बनाए जाने की जरूरत ज्यादा है।

कल्याणकारी राज्य होने के नाते प्रत्येक नागरिक को मुफ्त में स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सरकार की है। इसके विपरीत मोदी-सैनी की डबल इंजन सरकारें आयुष्मान-चिरायु योजना की आड़ में स्वास्थ्य सेवाओं का ठेका निजी हाथों को सौंप चुकी हैं। स्वास्थ्य मामलों के जानकार सरकारी की मंशा पर सवाल खड़े करते हुए कहते हैं कि निजी क्षेत्र के पास न तो सरकार के बराबर संसाधन है न पूंजी, यदि उन अस्पतालों में सुपरस्पेशलिटी इलाज मिल सकता है तो फिर हर तरह से सुविधा संपन्न सरकारी सिविल अस्पतालों में क्यों नहीं।

दरअसल, पूंजीपतियों-धनकुबेरों की गोद में बैठी डबल इंजन सरकारें जनता से वसूले गए टैक्स की रकम को लोक कल्याण पर नहीं बल्कि इन धनपशुओं के हित में इस्तेमाल कर रही हैं। करीब डेढ़ सौ करोड़ की आबादी वाले देश में स्वास्थ्य सेवाएं, स्वास्थ्य बीमा बहुत बड़ी कमाई वाला क्षेत्र है, इसलिए सरकार अपनी जिम्मेदारियों से य

कैंसर वार्ड का झुनझुना थमा गए स्वास्थ्य निदेशक
प्रदेश स्वास्थ्य विभाग के निदेशक डॉ. ब्रह्मदीप सिंह ने बुधवार को बीके सिविल अस्पताल का दौरा किया। दौरे का उद्देश्य अस्पताल की स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता की समीक्षा करना था। जाहिर है कि सरकार से मोटी तनख्वाह पाने वाले निदेशक जी को अस्पताल में छोटी मोटी कमियों को छोड़ कर सब चकाचक लगा होगा। इस दौरान उन्होंने 2017 में मरीजों के तीमारदारों की सुविधा के लिए घोषणा किए गए विश्राम सदन का जुमला एक बार फिर उछाला लेकिन कोई ठोस बात नहीं की। इसी तरह उन्होंने बीके में कैंसर वार्ड बनाने का हवा-हवाई जुमला भी फेका।

उनकी घोषणा कितनी फर्जी एवं दिखावटी है इसी से समझा जा सकता है कि अभी तो वे सीएमओ से प्रस्ताव बनवाते फिर रहे हैं। कब प्रस्ताव जाएगा, कब स्वीकृत होगा, कब बजट मिलेगा, कब स्टाफ आएगा, उपकरण खरीदे जाएंगे कुछ पता नहीं है। अभी तो वे सिर्फ घोषणाएं करते घूम रहे हैं। जिस अस्पताल में मामूली दवाइयों का अभाव बना रहता है, टीबी जैसी बीमारियों की दवाइयां आए दिन खत्म रहती हैं, उसमें कैंसर की महंगी दवाओं का इंतजाम कैसे होगा, इसके लिए बजट का क्या इंतजाम करेंगे। निरीक्षण के दौरान उन्होंने यह तो पता ही किया होगा कि अस्पताल में कितना स्टाफ स्वीकृत है और कितना कम है, स्टाफ की भर्ती करने पर तो उनके होंठ खुले नहीं लेकिन नेताओं की तरह जुमलेबाजी करते हुए कैंसरवार्ड की घोषणा कर गए। कैंसर वार्ड तो बाद में बनेगा इससे पहले करीब ढाई साल से बने पड़े एनआईसीयू, और आईसीयू को ही चलवा दें यही उनकी उपलब्धि मान ली जाएगी।ा तो धीरे धीरे पल्ला झाड़ रही है या बीते करीब सत्तर वर्षों से मुफ्त दी जा रही सेवाओं पर शुल्क लगाकर कमाई करने में लगी हैं। कमाई तो कर रही हैं लेकिन सुविधाएं नहीं बढ़ा रहीं ताकि बेबस आम आदमी पूंजीपितयों के अस्पतालों में जाकर लुटने को मजबूर हो।

  Article "tagged" as:
  Categories:
view more articles

About Article Author

Mazdoor Morcha
Mazdoor Morcha

View More Articles