मज़दूर मोर्चा ब्यूरो गऊ माता में 33 करोड़ देवी देवताओं का वास और गोबर कोहेनूर से भी ज्यादा कीमती बताकर भारत को विश्वगुरु की श्रेणी की पहुंचाने का ढिंढोरा पीटने वाली संघी-भाजपाई मानसिकता अब न्याय पालिका में भी जड़ें जमा चुकी है। मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथन ने हाल ही में कहा कि एक अदालती फैसले में उन्हें अहसास हुआ कि जब वेदों की रक्षा की जाएगी तो वेद भी उनका संरक्षण करने वालों की रक्षा करेंगे। हालांकि यह कहते वक्त उन्होंने यह भी बता दिया कि फैसला सुनाने में न्यायाधीश भी तथ्य, नियम-कानून से ज्यादा दोस्ती, धर्म संप्रदायवाद को तरजीह देते हैं। पहले यह जान लेते हैं कि घटना क्या है। न्यायमूर्ति स्वामीनाथन पिछले हफ्ते चेन्नई में एक ट्रस्ट द्वारा आयोजित राष्ट्रीय वैदिक प्रतिभा सम्मेलन के मुख्य अतिथि थे। सभा में उन्होंने बताया कि जब वह वकालत किया करते थे उस समय से वेदों और शास्त्रों के ज्ञाता एक वेद शास्त्री उनके मित्र थे। एक दिन शास्त्री जी अपने एक अन्य मित्र के साथ उनसे मिलने आए और जब उन्हें पता चला कि शास्त्रीजी को दोषी ठहराया गया है और 18 महीने जेल की सजा दी गई है, तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ।
बताया कि दरअसल, वैदिक पंडित की बहन अमेरिका से भारत घूमने आई थीं। अपने बच्चों और भाई के साथ, वह मंदिरों में दर्शन करने गई थीं और कार भी वही चला रही थीं। कार अनियंत्रित हो गई और चाय की दुकान के सामने एक व्यक्ति को टक्कर मार दी और उसकी मौत हो गई। शास्त्री की बहन को अमेरिका जाना था, इसलिए शास्त्री ने लापरवाही से कार चलाने का आरोप अपने ऊपर लेते हुए पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इस मामले में मुकदमा चला और शास्त्री को 18 महीने जेल की सजा सुनाई गई। उनके अनुसार हालांकि, ऐसे मामलों में छह महीने की जेल की सजा आम बात है। शास्त्री ने उन्हें बताया कि क्योंकि वह चोटी रखे हुए थे और पूरी पारंपरिक पोशाक पहनकर अदालत आते थे, तो जज ने उन्हें इसी पोशाक के कारण 18 महीने की जेल की सजा सुनाई थी। स्वामीनाथन तब वकील थे, जब उन्होंने मामले के दस्तावेजों का अवलोकन किया, तो पाया कि एक भी गवाह ने गाड़ी चलाने वाले की पहचान नहीं की थी। इसके अलावा, अदालत में किसी ने भी वैदिक विद्वान की पहचान नहीं की और विद्वान के खिलाफ कोई गवाह नहीं था। उन्होंने इस मामले को उठाया और अपील की। स्वामीनाथन के कहा कि शास्त्री के लिए एक अच्छी बात यह हुई कि अपील की सुनवाई करने वाला न्यायाधीश उनका (स्वामीनाथन) सहपाठी था। अंतत: शास्त्री को बरी कर दिया गया क्योंकि उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं था।
न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने कहा, उस दिन मुझे एहसास हुआ कि जब हम वेदों की रक्षा करेंगे, तो वेद हमारी रक्षा करेंगे। उस समय तक, मुझे ऐसे मामलों में गहरी दिलचस्पी नहीं थी। सोचिए, कम से कम एक गवाह तो यह कह सकता था कि शास्त्री जी कार चला रहे थे। एक ने भी ऐसा नहीं कहा। स्वामीनाथन की मानी जाए तो केस में वेदों से पहले खुद शास्त्री जी ने ही खेल कर दिया था। जिस महिला के कारण एक बेगुनाह व्यक्ति की जान चली गई उसे तो वेद शास्त्री जी ने अमेरिका रवाना कर दिया। दूसरी बात, जब शास्त्रीजी ने खुद ही व्यक्ति की मौत का इकबाल करते हुए पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया था तो फिर गवाहों की क्या जरूरत थी। क्या न्यायमूर्ति यह कहना चाह रहे थे कि यदि कोई वेदों की रक्षा करता है तो उसके परिवार वालों को किसी की जान लेने का हक मिल जाता है और क्योंकि वह वेदों का ज्ञाता है इसलिए कानून उसे बरी कर देगा।
दरअसल, न्यायमूर्ति स्वामीनाथन भी न्यायपालिका में संघ-भाजपा के उस स्लीपर सेल की तरह काम कर रहे थे जो ताकत में आने तक निष्पक्ष और निरपेक्ष होने का दिखावा करता है। सत्ता हाथ में आते ही अपने असली रंग में उतर पड़ता है। यह सब, सर्व धर्म समभाव और धर्म निरपेक्षता के मौलिक सिद्धांतों का पालन करने वाले भारत को 2014 में दूसरी आजादी मिलने के बाद ही संभव हो सका है। संघी मानसिकता का भीड़तंत्र देश में राज करने लगा तो ये स्लीपर सेल भी न्यायपालिका में अपनी औेकात दिखाने लगे। इसकी शुरूआत विज्ञान को पुराणों से नीचे बताने वाले राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व जज महेशचंद शर्मा ने 2017 में की थी। तब उन्होंने कहा था कि मोर ब्रह्मचारी होता है वह मोरनी से सेक्स नहीं करता, मोरनी उसके आंसू पीकर ही गर्भवती हो जाती है।
न्यायपालिका संविधान और कानून की बजाय भगवान की सलाह पर फैसले सुनाने लगी। बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद में निर्णय देने वाले जजों में शामिल रहे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्यन्यायाधीश चंद्रचूड को फैसला सुनाने के लिए भले ही भगवान राम ने कोई सलाह न दी हो, यह तय है कि जो राम को लाए हैं हम उनको लाएंगे गाना बजाने वाले राजनेताओं का आदेश उन तक जरूर पहुंचा था। अब न्यायमूर्ति स्वामीनाथन वेदों के संरक्षकों को न्यायिक संरक्षण देने की बात कर रहे हैं। वैसे सोचने वाली बात यह है कि हिंदू धर्म में वेद केवल ब्राह्मण ही पढ़-सुन सकते हैं, तो क्या जस्टिस स्वामीनाथन यह कह रहे थे कि ब्राह्मणों के अलावा क्योंकि कोई और वेद का ज्ञाता नहीं होता इसलिए ओबीसी, दलित आदि को यह लाभ नहीं मिल पाएगा।