सफाई के नाम पर 750 करोड़ डकारने की परियोजना

सफाई के नाम पर 750 करोड़ डकारने की परियोजना
February 12 17:31 2026

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) ट्रायल के तौर पर पहले पौने दो करोड़ रुपए से ओल्ड फरीदाबाद के कुछ वार्डों की सफाई के नाम पर परियोजना को चलाने के बाद पूरे शहर के लिए 384 करोड़ तथा इतनी ही रकम नहर पार बसने वाले ग्रेटर फरीदाबाद के लिए रखी गई है। सर्वविदित है कि किसी भी शहरी निकाय का सर्वप्रथम कार्य सफाई तथा पेयजल आपूर्ति करना ही होता है। ये दोनों काम प्रत्येक शहरी निकाय की भांति यहां का निकाय भी करता आया है। इस काम के लिए कोई विशेष परियोजनाएं बनाने की आवश्यकता नहीं हुआ करती थी। लेकिन जब से रिश्वतखोरी, कमीशनखोरी एवं भ्रष्टाचार का स्तर बढऩे लगा तब से सफाई के नाम पर तरह-तरह की परियोजनाएं बनने लगीं। एक कम्पनी के माध्यम से करीब 20 वर्ष पूर्व सफाई के नाम पर यहां भी एक बहुत बड़ी परियोजना शुरू की गई थी। इसके लिए सैंकड़ों छोटे-बड़े वाहन कूड़ा ढोने के लिए खरीदे गए थे जिनके द्वारा कूड़ा ढो कर गुडग़ाव रोड पर स्थित बंधवाड़ी गांव के निकट ले जाया गया। दावा किया गया था कि कूड़े से गैस, बिजली व खाद तैयार की जाएगी जिससे करोड़ों की आमदनी होगी। आमदनी तो क्या होनी थी, नगर निगम के हजारों करोड़ डूब गए तथा कूड़े का पहाड़ खड़ा हो गया। इससे रिसने वाला जहरीला पानी धरती में समाने लगा और बदबू से होने वाली परेशानी से दुखी होकर ग्रामीणों का आक्रोश बढऩे लगा तो वहां कूड़ा डालना बंद किया गया और इसके लिए नए-नए ठिकाने ढूंढे गए।

वास्तव में कूड़े से गैस, बिजली व खाद बनाना आज कोई अनहोनी बात नहीं रह गई है। दुनिया में अनेकों देश यह काम कर रहे हैं। उनके लिए कूड़ा कचरा न तो कोई मुसीबत है और न ही खर्च का बोझ। यहां पर यह मुसीबत केवल इसलिए है कि सत्ता चोरों के हाथ में है। हर कोई लूट कमाई के चक्कर में रहता है। परियोजना जन उपयोग की बजाय लूट कमाई के लिए बनाई जाती है। चाहे बराही तालाब का सौंदर्यीकरण हो या बडख़ल झील में सीवर का पानी भरना हो।

मौजूदा परियोजना को आकर्षक बनाने के लिए, इसके साथ जन भागीदारी जैसे शब्द जोड़ दिए गए हैं। क्या अब तक सारी परियोजनाएं जन-भागीदारी के बिना ही होते आ रही हैं? क्या पार्षद, विधायक व सांसद, जन-प्रतिनिधियों के रूप में अपनी कोई भागीदारी नहीं निभा रहे? यदि ये नहीं निभा रहे तो अब किन लोगों से यह भागीदारी निभवाई जाएगी? गलियों में सड़ते कूड़े के ढेर, बहता सीवरेज क्या निगम अधिकारियों को दिखते नहीं है। इन्हें लेकर परेशान जनता आए दिन शिकायत पर शिकायत करती है, उसकी सुनवाई तो क्या करनी थी ढोल-धमाके के साथ निगम दफ्तर पर भी प्रदर्शन का कोई असर किसी अधिकारी पर नहीं होता। ऐसे में किस जन-भागीदारी की बात की जा रही है?

बे-लगाम वायु प्रदूषण के लिए सबसे बड़ा दोषी नगर निगम को ही माना जा सकता है। कूड़े के ढेर में आग लगाने पर जुर्माने की जो बात की जा रही है, उसके लिए दोषी आग लगाने वाला नहीं बल्कि खुद निगम है। जब कूड़ा उठेगा ही नहीं तो ढेर-के-ढेर लगे रहेंगे तो अंतिम उपाय, जनता के पास, आग लगाना ही बचता है। खुद कुछ काम करना नहीं और जनता पर जुर्माने लगाने के बहाने, निगम ढूंढता रहता है। नई परियोजना में कूड़ा ढोने के जिन वाहनों की बात की जा रही है उनमें जीपीएस की अनिवार्यता बताई जा रही है। जिसके न होने पर जुर्माने लगाए जाएंगे। सफाई कर्मचारियों के लिए वर्दी, जूते, दस्ताने आदि प्रदान किए जाएंगे। ये सारे ढकोसले बीते बीसियों वर्ष से शहर की जनता देखती आ रही है। जब तक डकैतों के हाथ में सत्ता रहेगी वे जनता को इसी तरह की विभिन्न परियोजनाओं के नाम पर लूटते व बहलाते रहेंगे।

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Mazdoor Morcha
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