अनूप चौधरी चंडीगढ़। नये साल का आगाज कुछ खटक रहा है। देश के बेरोजगार युवाओं के मुरझाए चेहरे आत्मविश्वास की कमी,सड़कों पर धरने बैठे किसान-मजदूरों के आत्मविश्वास को चुनौती देती केंद्रीय सरकार और संसद के भीतर और बाहर संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर को पग-पग पर निशाने पर लेकर अपमान करने से आहत, आक्रोशित दलित समाज का मौजूदा व्यवस्था पर सवाल खड़े करने कि मजबूत इरादा है। भ्रष्टाचार और मंहगाई से निजात पाने के खदबदा रहा आम जनमानस घर से बाहर निकलने के लिए आतुर है पर अगुवाई कौन करे।
साल 2025 का आज नोवा दिन है। पर क्या आप ने कही पढ़ा या सुना कि भविष्य के लिए भाजपा का रोड़ मैप क्या है? युवाओं को रोजगार देने कि क्या योजना है? आमजनता को मंहगाई से छुटकारा दिलाने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे? आसमान छूती रोज़मर्रा की दिक्कतों से कर्मचारियों को कैसे राहत दी जाएगी।आधी दुनिया याकि महिलाओं की सुरक्षा और आत्मसम्मान बरकरार रखने के लिए क्या क़दम उठाए जाएंगे। भ्रष्टाचार पर नकेल कसने का क्या इरादा है या विपक्षी नेताओं को ही ईडी सीबीआई और इनकम टैक्स के जरिए डराना और धमकाना है। शिक्षा स्वास्थ्य के बारे में तो कभी सोचा ही नहीं गया। अलबत्ता शिक्षा की गुणवत्ता आज निचले पायदान पर है। कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कोई पहल नहीं।देश में चीनी के अतिक्रमण को रोकने की कोई योजना नहीं है।
नये साल के पहले हफ्ते में ही भाजपा ने अपने रंग दिखाना शुरू कर दिए हैं। चुनाव आयोग पिंजरे का तोता बन कर रह गया है। कोई कायदा कानून इनके लिए कोई मायने नहीं रखता है। मतदाता सूची में जब चाहो जिसका नाम काट दो जब चाहो सूची में जिसका नाम जोड़ दो। कोई कहने वाला नहीं सुनने वाला नहीं है। अजब-गजब और दुखदाई यह कि देश की सुप्रीम कोर्ट समेत सभी संस्थाएं
मूकदर्शक बनी हुई है। केंद्र सरकार और आरएसएस ने नया साल शुरू होते ही अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। खनौरी बार्डर पर 46 दिनों से अपनी मांगों को लेकर कर किसानों के लिए आमरण-अनशन पर बैठे जगजीत सिंह डल्लेवाल की सेहत बहुत नाज़ुक दौर में पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के बचाव में उतर गया है। केंद्र सरकार को किसानों की बात सुनने के आदेश देने की बजाय बार-बार पंजाब सरकार को किसानों के अनशन का हल निकालने के लिए फटकार लगा रहा है। देश की सर्वोच्च अदालत यह सब किसके इशारे पर कर रही है जगजाहिर है।
नये साल के आगाज के पहले हफ्ते में ही प्रधानमंत्री समेत भाजपा नेताओं ने अपने रंग दिखाना शुरू कर दिए हैं। आरएसएस और उसके मुखौटे भाजपा का चाल चरित्र और नैतिकता सब जानते हुए भी लोग सब चुपचाप सहन कर रहे हैं। हालांकि प्रधानमंत्री और उनकी टीम ने 2024 से सांप्रदायिक,जातीय और क्षेत्रवाद का जहर उगलना शुरू कर दिया था। ईवीएम के सहारे स्वयंभू विजेता भी बन गए। राजनीतिक दलों और आम लोगों ने मजबूती से इस के खिलाफ सड़कों पर आने की जहमत नहीं उठाई और अलोकतांत्रिक शक्तियों के आगे नतमस्तक हो गए।
बेरोजगार युवा ऐसे ही मुरझाए चेहरे और आत्मविश्वास की कमी के चलते बजरंग दल और हिन्दू वादी संगठनों के एक दिन के रोजगार के लिए अपना और अपने परिवार का भविष्य दांव पर लगा रहे हैं। इन्हें संघ और भाजपा कुछ देने वाले नहीं। अतीत इसका प्रमाण है। किसान और मजदूर ने अपने अस्तित्व की लड़ाई में सब कुछ झोंक दिया है। दोनों केंद्र सरकार से आर-पार की लड़ाई में उतर गये है। युवा बेरोजगारों की फौज अब अधेड़ उम्र में बदल रही है। अपने हक के लिए लडऩे की बजाय युवा नशे और अपराध को अंगिकार कर रहा है। बेरोजगार युवा यह दोनों ही गर्त में ले जाने वाले का मौजूदा हुक्मरानों के मंसूबे पूरे करने के लिए कर रहे हैं। आज के दिन केंद्र ने आम और खास लोगों में आंतक और दहशत इतनी बना दी है कि कोई चूं नहीं कर सकता है।
हालांकि नाउम्मीद से गुजर रहे आम लोगों को उम्मीद की एक किरण ही दिखानी ताकि उनका हौसला और आत्मविश्वास लौट सके। पर यह करेगा कौन? इंडिया गठबंधन जिसमें एक दूसरे को कमजोर करने की बातें अब खुल कर सामने आ रहे हैं। मोदी और अडानी इसी साल साम-दाम-दंड-भेद की नीति से गठबंधन को बोथरा बना देंगे। चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, ईडी सीबीआई पहले ही नंपुसक बना दिए गए हैं। लोगों को जनांदोलन खड़ा करना ही होगा। यह जरूरी नहीं कि इस आंदोलन की अगुवाई कांग्रेस ही करे। आत्मविश्वास और मजबूत मनोबल लेकर और अपने वर्तमान और भविष्य की परवाह किए बिना आगे आएगा लोग उसके पीछे खड़े हो जाएंगे। पर सवाल यह कि पहले आप पहले आप के चक्कर में सामने आने से नेता कतरा रहे हैं।
राजनितिक पार्टियां और उनके नेता समझ लें कि अभी नहीं तो कभी नहीं। यह साल अंधभक्तों और नाउम्मीद के दौर से गुजर रहे युवाओं को नशे की ओर धकेल रही सत्तारूढ़ पार्टी पर नकेल कसने का है। समय रहते हम सचेत नहीं हुएं तो लोकतंत्र हाथ से फिसल जाएगा। यह बताते चलें कि निरंकुश शासन को लाने के लिए इंडिया गठबंधन ही जिम्मेदार हैं। लोकसभा चुनाव आमलोगों ने आगे आकर लड़ा था पर नेता तो अपनी जीत का बचाव भी नहीं कर सके थे।