डॉ. रामवीर विभिन्न कारणों से कभी कभी कोई शब्द प्रमुख हो जाता है। ऐसा ही एक शब्द है रोड। यदि गणना की जाए कि दिन भर मीडिया में किन शब्दों की आवृत्ति सर्वाधिक हुई तो उन शब्दों में एक शब्द रोड भी होगा। कहीं सरकारों का रोड बनाने का दावा तो कहीं रोड टूटने की शिकायतें, कहीं रोड निर्माण में घोटाले, कहीं रोड जाम की समस्या-किसी भी रूप में हो रोड का जिक्र रहता है। रोड बनाना सरकार का काम है, ड्यूटी है। यदि सरकारों में डींगें मारने और विज्ञापनबाजी की कमजोरी न हो तो रोड बनना सामान्य सूचनात्मक समाचार ही होगा, मीडिया में अधिक स्थान व समय नहीं लेगा। यदि रोड ईमानदारी से बना होगा तो टूटने के समाचार भी नहीं बनेंगे। वास्तविक आवश्यकता और रोड इंजीनियरिंग का ध्यान रख कर बनाए रोड पर जाम की सम्भावना भी न्यून होगी। रोड तक तो ठीक है, रोड से ही जुड़े रोड शो और रोडरेज जैसे और सिरदर्द हैं।
आने जाने के लिए बने रास्तों को यातायात के अतिरिक्त अन्य गतिविधियों में प्रयोग करना अनैतिक है। वह चाहे सड़क पर नमाज पढऩा हो, भंडारे लगाना हो या राजनेताओं के रोड-शो हों- सब समान रूप से अवांछित हैं। नेताओं के बौद्धिक स्तर में ह्रास और तदनुसार ही सामान्य जनों में घटती सुरुचि का नित बढ़ते रोडशोज के तमाशों से सीधा सम्बन्ध है। अब स्टालवाट्र्स तो रहे नहीं, पिग्मीज रोड-शो करके कद बढ़ाने की कोशिश करते दिखते हैं। इधर उनके अनुयायी ऐसा रोड-शो कर देते हैं कि अपना, अपने दल और अपने प्रदेश तक का नाम चमका देते हैं। दिल्ली-मुम्बई एक्सप्रेस-वे पर किन्हीं मनोहर लाल धाकड़ ने जो धाकड़ मनोहर शो किया है उसके कारण तो सोशल मीडिया में इस एक्सप्रेस-वे को लोग धाकड़ रोड ही कह रहे हैं। संस्कारों के दावेदारों का विकारों के शिखर छूना चकित और दुखित करता है। जिस मध्यप्रदेश में ‘मुझे तोड लेना वनमाली… जैसी कविता लिखने वाले ‘एक भारतीय आत्मा उपनाम से ख्यात कवि माखनलाल चतुर्वेदी जैसे प्रेरणापुंज जन्मे थे वहां से ऐसे बेहूदा समाचार आते हैं तो पीडा होती है, उनके जीवनकाल में यदि ऐसा कुछ हुआ होता तो वे स्वयं को ‘एक भारतीय आत्मा जैसा उपनाम न देते।