आनन्द स्वरूप वर्मा अभिषेक श्रीवास्तव ने अपनी एक रिपोर्ट में 7 सितंबर, 2012 को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक खबर के हवाले से बताया था कि किस तरह टीवी चैनलों और छत्तीसगढ़ सरकार के जनसंपर्क विभाग के बीच एक समझौता हुआ जिसके तहत मुख्यमंत्री रमन सिंह की रैलियों और सरकार समर्थक खबरों को प्रस्तुत करने के लिए एक निश्चित रकम ली गयी। ज़ी न्यूज़ और जिंदल के बीच जो टकराव हुआ और जिसके नतीजे के तौर पर इसके दो संपादक सुधीर चौधरी और समीर अहलुवालिया जेल भी गये, उसकी पृष्ठभूमि में भी छत्तीसगढ़ ही है जहाँ कि रायगढ़ जिले में लंबे समय से जिंदल के स्टील संयंत्र के खिलाफ आंदोलन चल रहा है। उस रिपोर्ट के अनुसार चूँकि कोयला घोटाले से भास्कर समूह के हित गहराई से जुड़े हैं लिहाजा इस घोटाले के समूचे प्रकरण में दैनिक भास्कर’ इकलौता अखबार रहा जिसने किसी भी संस्करण में इस घोटाले से जुड़ी एक भी खबर नहीं छापी। अभिषेक का कहना है कि हाल के दिनों में मीडिया में तीन तरह के लोगों ने उद्यम शुरू किया है-रीयल स्टेट, चिट फंड और नेता तथा उनके सगे संबंधी। सत्ता, मीडिया और निजी पूँजी के इस घालमेल का सबसे बड़ा असर जनता के असल मुद्दों और अधिकारों पर पड़ा है। मुख्यधारा का मीडिया, जिसका काम जनता की समस्याओं और अधिकारों के दमन को सामने लाना था, वह पूरी तरह सत्ता और पूँजी के हितों के आगे बिक चुका है।
जनता के बीच भ्रम फैलाने और एक समुदाय विशेष के खिलाफ नफरत फैलाने के मकसद से आए दिन खबरें प्लांट होती रहती हैं। यहाँ मैं एक खबर का उल्लेख करना चाहूँगा जिससे पता चलता है कि इनका स्वरूप कितना खतरनाक हो सकता है। उत्तर प्रदेश सरकार के धार्मिक स्थल विधेयक के विरोध में 21 अप्रैल, 2000 को नयी दिल्ली के रामलीला मैदान में मुसलमानों की एक विशाल रैली हुई। ‘मजहब बचाओ’ रैली को जामा मस्जिद के शाही इमाम अब्दुल्ला बुखारी के अलावा अनेक मुस्लिम नेताओं ने संबोधित किया। लगभग सभी अखबारों में इस रैली की रिपोर्ट प्रकाशित हुई। इन अखबारों ने अपनी रिपोर्ट में इस तथ्य को रेखांकित किया कि रैली में संविधान समीक्षा तथा धर्मस्थल विधेयक के खिलाफ देश के मुसलमानों ने संघर्ष छेडऩे की घोषणा की। लेकिन दैनिक जागरण’ ने जो समाचार प्रकाशित किया, उसमें एक खास तरह का कौशल दिखायी देता है। इस अखबार ने अपने शीर्षक में लिखा- ‘बुखारी का बाबरी मस्जिद बनाने का एलान’ और इसी के नीचे उपशीर्षक था- मैं आईएसआई का सबसे बड़ा एजेंट, सरकार में दम हो तो गिरफ्तार करे। यह उपशीर्षक बुखारी के किस वक्तव्य से लिया गया इसके लिए राजधानी से प्रकाशित हिंदी और अँग्रेजी के सभी अखबारों को देखना जमती लगा। अन्य अखबारों की खबरों के अनुसार ‘शाही इमाम ने कहा कि आईएसआई एजेंटों की गतिविधियों को रोकने की आड़ में यह बिल लाकर सरकार देश के मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने चुनौती दी कि सरकार अगर एक भी ऐसी मिसाल पेश कर दे जबकि कोई आईएसआई एजेंट किसी मस्जिद या मदरसे में पकड़ा गया हो तो वे खुद को हिंदुस्तान में आईएसआई का सबसे बड़ा एजेंट घोषित कर देंगे। ‘
इस अखबार ने अगले दिन बुखारी के आईएसआई के सबसे बड़े एजेंट से संबंधित बयान के विरोध में इंद्रप्रस्थ विश्व हिंदू परिषद, अखंड हिंदुस्तान मोर्चा, अखिल भारतीय ब्राह्मण संघ, शिवसेना पूर्वी दिल्ली, भारतीय विद्यार्थी सेना जैसे ढेर सारे संगठनों के बयान प्रकाशित किये जिसमें माँग की गयी थी कि बुखारी को गिरफ्तार किया जाए और उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाए। इसके बाद 25 अप्रैल को ‘दैनिक जागरण’ ने पाँच कालम में फैला एक शीर्षक लगाया- ‘अब्दुल्ला बुखारी को गिरफ्तार करने की माँग जारी। इस शीर्षक के अंतर्गत एक दर्जन संक्षिप्त समाचार थे। जिस समाचार से यह शीर्षक बनाया गया था वह किसी ‘भारत हितैषी’ नामक संगठन के अध्यक्ष कमल कुमार का वक्तव्य था। खबरों के साथ इस तरह का खिलवाड़ दैनिक जागरण’ पहले भी करता रहा है और अयोध्या में कारसेवा के दौरान इसे इसके लिए ख्याति भी मिल चुकी है। रिपोर्टर ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि ‘उम्मीद से ज्यादा भीड़ देखते ही बुखारी पहले से तैयार अपना भाषण पढऩा भूल गये और रामलीला मैदान से संसद की तरफ इशारा करते हुए कहा कि मारो इसे। उनके यह जोशीले अल्फाज सुनते ही मैदान में जमा हजारों मुसलमान भी मारो – मारो कह कर संसद की तरफ निहारने लगे।’ यह एक खास तरह की रिपोर्टिंग थी जो किसी और अखबार में नहीं दिखायी दी।
हमारे मीडिया पर आमतौर पर पश्चिमोन्मुख (यूरोसैट्रिक) होने का आरोप लगता था पर अब तो हालत यह हो गयी है कि यह पूरी तरह आत्मलीन और कूप मंडूक हो गया है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान अफ्रीकी छात्रों और नागरिकों पर हुए हमलों के संदर्भ में मीडिया के रवैये को देखें तो इसके नस्लवादी चरित्र की ही झलक मिलती है। 1970 और 1980 के दशक के अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं पर निगाह डालें तो कोई सप्ताह ऐसा नहीं है जब इनमें अफ्रीकी और लातिन अमेरिकी देशों के राजनीतिक सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य पर लेख न हो। इन दो दशकों में खुद मैंने ही अफ्रीकी राजनीति और संस्कृति पर सैकड़ों लेख लिखे थे और ‘दिनमान’ में तो इन देशों के लिए नियमित स्तंभ ही होता था। राजेंद्र माथुर ने ‘नवभारत टाइम्स’ में और प्रभाष जोशी ने ‘जनसत्ता’ में तीसरी दुनिया के देशों पर समय-समय पर काफी सामग्री दी लेकिन 1990 के बाद की स्थिति पर गौर करें। हालत इतनी बदतर हुई कि 342 साल की गोराशाही के बाद दक्षिण अफ्रीका में 1994 में जब अश्वेत बहुमत को आजादी मिली तो वहाँ रिपोर्टिंग के लिए भारत से केवल तीन पत्रकार गये थे-एक ‘मलयालम मनोरमा’ से, दूसरे ‘दि वीक’ से और तीसरा हिंदी से मैं जो अपनी पहल पर गया था और ‘जनसत्ता’ के लिए रिपोर्टिंग कर रहा था। बाद में ‘दि हिंदू’ से आनंद सहाय भी पहुँचे थे। पिछले दो दशकों के दौरान जब से भारत में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जबर्दस्त उछाल आया, मीडिया से इन देशों की खबरें गायब होती गयीं।
नतीजतन नाइजीरिया के बारे में या मोटे तौर पर अफ्रीका के बारे में एक आम धारणा है कि यहाँ के लोग नशीली दवाओं की तस्करी करते हैं, कुत्ते बिल्ली खाते हैं, अपसंस्कृति फैलाते हैं और हर तरह के समाज विरोधी कामों में लिप्त रहते हैं। हमारे अंदर सदियों से जड़ जमा कर बैठे नस्लवाद को, जो कभी जातीय विद्वेष तो कभी छूत-अछूत के रूप में प्रकट होता रहा है, राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक हालात ने जो खाद-पानी मुहैया कराया है उसके विस्फोटक नतीजे सामने आ रहे हैं। हमारे मीडिया ने इस जहर को और मारक बनाने में भरपूर मदद की है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान नाइजीरिया, केन्या, तांजानिया आदि के नागरिकों के साथ दिल्ली, नोएडा, बंगलुरु या देश के अन्य स्थानों में जो कुछ हुआ है उसे रंगभेद और नस्लवाद का वीभत्सतम रूप कहा जाना चाहिए। इस नस्लवादी घृणा के शिकार केवल अफ्रीकी ही नहीं बलि अपने देश के उत्तर-पूर्व राज्यों के लोग भी होते रहते हैं। मीडिया में इन्हें कहीं जगह नहीं मिलती। मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश या अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों के प्रति मीडिया की उदासीनता और यहाँ के लोगों के बारे में इसकी अज्ञानता हैरान कर देने वाली है।
अब से कुछ वर्ष पूर्व 2002 में मीडिया/जनसंपर्क / संचार / प्रबंधन के क्षेत्र में सक्रिय लोगों के एक संगठन नार्थ ईस्ट इंडिया इमेज मैनेजर्स’ ने दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु में कार्यरत 400 पेशेवर लोगों से एक सर्वेक्षण के दौरान बातचीत की।’ जिन से बातचीत की गयीं, वे संचार और सेवा क्षेत्र से संबद्ध लोग थे जो देश की रोजमर्रा की घटनाओं से खुद को अपडेट रखते थे। इस सर्वेक्षण में पाया गया कि 87 प्रतिशत लोग उत्तर-पूर्व भारत के सभी राज्यों के नाम भी नहीं बता सकते थे। 52 प्रतिशत ऐसे थे जिनका इन राज्यों के प्रति बहुत नकारात्मक नजरिया था। 76 प्रतिशत लोगों को इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि उत्तर-पूर्व के किसी विद्रोही गुट के साथ सरकार की बातचीत चल रही है या नहीं। 70 प्रतिशत लोगों को इस केंद्र बात पर यकीन नहीं था कि उत्तर-पूर्व के तीन राज्यों में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से भी ज्यादा है। ऐसी बहुत सारी बातों का खुलासा हुआ जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। मजे की बात यह है कि जिन लोगों पर यह सर्वेक्षण केंद्रित था वे प्रबुद्ध थे और मीडिया, संचार, विज्ञापन, जनसंपर्क, मानव संसाधन, वित्त प्रबंधन तथा मार्केटिंग के क्षेत्र से जुड़े थे। सर्वेक्षणकर्ताओं का कहना लोग था कि ‘हम इस तथ्य से हतप्रभ रह गये कि जिन से हमने सवाल • पूछे उनका बहुमत अगर भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र के बारे में कोई जानकारी नहीं रखता तो देश का आम आदमी कैसे इसके बारे में जान सकता है।’ इस सिलसिले में जब उनसे और छानबीन की गयी कि इस अज्ञानता की वजह क्या है तो 61 प्रतिशत लोगों ने जवाब दिया कि उन्हें राष्ट्रीय मीडिया में उत्तर-पूर्व भारत के बारे में पढऩे को नहीं मिलता। कुछ देखने यह सही है। मीडिया में उत्तर-पूर्व भारत की अनुपस्थिति ने ही ‘भेनलैंड’ से उनके अलगाव को तीव्र किया है। अखबारों या चैनलों के दफ्तरों में भी उनकी मौजूदगी नहीं के बराबर है। 1958 से ही ‘आफ्सपा’ (आर्ल्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स ऐक्ट) की मार झेलते पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में मानव अधिकार की स्थितियों और दमन की तरफ देश के बौद्धिक वर्ग की निगाह भी तभी जाती है जब मणिपुर में सेना मुख्यालय के सामने निर्वस्त्र होकर औरतें प्रदर्शन करती हैं या इरोम शर्मिला जैसी कोई महिला भूख हड़ताल से जान देने पर आमादा हो जाती है। इन सात राज्यों में दिल्ली या मुंबई से निकलने वाले सभी प्रमुख अखबार पहुँचते हैं, यहाँ सभी न्यूज चैनल देखे जाते हैं पर असम को छोड़ कर शायद ही किसी राज्य में इनके संवाददाता मौजूद हों। पत्रकार सी.पी. झा ने अपनी एक रिपोर्ट में इस बात पर रंज भी प्रकट किया था कि त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड जैसे पूर्वोत्तर राज्यों की • विधानसभा चुनाव की खबरों के मुकाबले मीडिया ने राजस्थान और बंगाल की कुछ सीटों पर हुए उपचुनावों को ज्यादा तरजीह दी। वैसे सी.पी. झा ने पूर्वोत्तर राज्यों पर काफी कुछ लिखा लेकिन जरूरत इस प्रक्रिया को और तेज करने की है।