पत्रकारिता का अंधा युग-12

पत्रकारिता का अंधा युग-12
February 14 07:21 2026

आनन्द स्वरूप वर्मा (राजसत्ता, माओवाद और पत्रकारिता)
11 सितंबर, 2001 को वल्र्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर हुए हमले के बाद न केवल अमेरिका के लिए बल्कि अमेरिका के प्रभाव क्षेत्र में आने वाले सभी देशों के लिए आतंकवाद विरोधी अभियान शुरू करने के नाम पर जनआंदोलनों का दमन आसान हो गया। जिन देशों में सत्ताधारी वर्गों के उत्पीडऩ से लोग परेशान थे और अपनी न्यायपूर्ण माँगों को लेकर आंदोलनरत थे उन देशों को खासतौर पर अमेरिका ने अपने अभियान में शामिल किया। इन देशों की सरकारों के साथ तालमेल बनाते हुए उसने जनआंदोलनों पर निशाना साधा। तीसरी दुनिया के देशों में नेपाल और फिलीपींस पर अमेरिका ने विशेष रूप से ध्यान दिया। अमेरिकी नीति के लिहाज से इन दोनों देशों का एक रणनीतिक महत्व है इसलिए इन देशों को प्राथमिकता दी गयी है। ध्यान देने की बात है कि यूरोपियन यूनियन ने भी अमेरिका के इस काम में उसे भरपूर मदद पहुँचायी। 11 सितंबर के बाद इसने अमेरिका के साथ इस बात पर सहमति प्रकट की कि आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए नये किस्म के कानून बनाये जाएँ। इसके एक सदस्य देश स्पेन ने प्रस्ताव रखा कि आतंकवाद की ऐसी परिभाषा तैयार की जाए जो सभी देशों को समान रूप से मान्य हो। उसने एक प्रस्ताव तैयार किया जिसमें राजनीतिक सक्रियता और ‘सामाजिक मोर्चों’ के काम को प्रत्यक्ष तौर पर आतंकवाद से जोड़ा गया। स्पेन का कहना था कि ऐसे संगठनों की राजनीतिक गतिविधियों से आतंकवादी समूहों के लक्ष्यों को ‘सहयोग और बढ़ावा’ मिलता है। यूरोपियन यूनियन ने आतंकवाद की जो समान परिभाषा दी है उसमें इसे ‘सहयोग और बढ़ावा’ देने को भी दंडनीय अपराध बताया गया। 11 सितंबर की घटना से पहले से ही स्पेन राजनीतिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए आतंकवाद का सहारा लेता रहा है। लेकिन यूरोपियन यूनियन ने तो जो तैयारी की उसका उद्देश्य हर तरह के आंदोलनों और प्रदर्शनों पर रोक लगाना था। इसने आतंकवाद की जो परिभाषा बनायी उसके अंतर्गत मजदूरों की हड़तालों या भूमंडलीकरण के खिलाफ किसी भी तरह के प्रदर्शन को आतंकवादी कार्रवाई घोषित किया जा सकता है। इसका मानना है कि ‘चूँकि प्रदर्शनों से नागरिक समाज आतंकित महसूस करता है इसलिए यह एक आतंकवादी कार्रवाई है।’ दरअसल सिएटल, जेनोआ (इटली),गोटेनबर्ग (स्वीडन) आदि में भूमंडलीकरण के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के बाद से ही ये सरकारें ऐसे उपाय ढूँढऩे में लगी थीं जिनसे इन्हें रोका जा सके। 11 सितंबर की घटना के बाद उन्हें अपने इस काम में काफी मदद मिली।

भारत में भी 13 दिसंबर, 2001 को संसद पर हुए आतंकवादी हमले के बाद सरकार को ‘पोटा’ (प्रिवेंशन ऑफ टेररिज्म ऐक्ट) जैसे कानून बनाने में बहुत आसानी हुई। 12 दिसंबर तक अर्थात् इस हमले से एक दिन पहले तक संसद के अंदर हुई बहस को उठा कर देखें तो साफ पता चलता है कि पोटा के खिलाफ व्यापक जनमत था और यह सोचा जा रहा था कि लोकसभा और राज्यसभा का संयुक्त अधिवेशन बुला कर बहुमत के आधार पर इस विधेयक को पारित किया जाए ताकि यह कानून का रूप ले सके। लेकिन 13 दिसंबर के बाद स्थिति पूरी तरह पोटा के पक्ष में हो गयी और यह बिना किसी विरोध के कानून बन गया।प्रसंगवश इन दोनों घटनाओं से यह सबक तो लिया ही जा सकता है कि आतंकवादी गतिविधियाँ अनिवार्य रूप से जनवादी आंदोलनों को कमजोर करती हैं। दूसरा सबक यह भी लिया जा सकता है कि जनवादी आंदोलनों को कमजोर बनाने के लिए सरकारें अपनी खुफिया एजेंसियों की मदद से अपने ‘काउंटर इन्सरजेंसी’ कार्यक्रम के तहत तैयार किये गये आतंकवादी गिरोहों की मदद लेकर कोई आतंकवादी गतिविधि करा सकती है ताकि उसे जनआंदोलनों और नागरिक अधिकारों का दमन करने के लिए कानून बनाने का बहाना मिल सके।

आज स्थिति यह हो गयी है कि किसी भी तरह के विरोध को बड़ी आसानी से आतंकवादी कार्रवाई की सूची में शामिल किया जा सकता है। जैसे-जैसे जनतांत्रिक तौर तरीकों से काम करने का दायरा सिकुड़ता जाएगा, जनता के अंदर अपने रोष को अभिव्यक्त करने का जो भी तरीका विकसित होगा उसे सरकारें आतंकवाद का ही नाम देंगी।मुठभेड़ के नाम पर राज्य द्वारा संचालित हत्याकांडों का सिलसिला तो बढ़ा ही है अब वह प्रवृत्ति भी काफी तेजी से जड़ जमाने लगी है जिसके तहत छत्तीसगढ़ में सलवा जुडुम शुरू किया गया। पंजाब, कश्मीर और असम में इसका एक दूसरा रूप देखने को मिला था। असम में उग्रवादी संगठन उल्फा के भूतपूर्व सदस्यों को लेकर बनाये गये संगठन ‘सुल्फा’ (सरेंडर्ड उल्फा) को सरकार समर्थित अपराधियों का गिरोह माना जाता है। इस गिरोह ने तो ‘असम जातीय महासभा’ नाम से एक राजनीतिक दल बना कर चुनाव भी लडऩे की योजना तैयार की थी। आंध्र प्रदेश में टी. पुरुषोत्तम की हत्या से महज दो दिन पूर्व पुलिस महानिदेशक डोरा ने एक संवाददाता सम्मेलन में आठ लोगों को पेश किया और बताया कि ये लोग ‘प्रजा प्रतिघटना’ नामक एक नक्सलवादी गुट के सदस्य हैं जो अब हिंसा का रास्ता छोड़ रहे हैं। 19 नवंबर, 2000 को ‘डकन क्रॉनिकलÓ ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की कि किस प्रकार सरकार पूर्व नक्सलवादियों को हथियार और पैसा देकर अपने संरक्षण में उनसे अपराध करा रही है। यहाँ तक कि अप्रैल 2000 में कथूला समैया नामक एक पूर्व नक्सलवादी ने पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में एक संवाददाता सम्मेलन किया जिसमें वह अपने सामने मेज पर दो रिवाल्वर और एक बंदूक रख कर पत्रकारों को संबोधित कर रहा था।

ऐसा लग रहा है कि राजसत्ता के इस काम में विभिन्न राजनीतिक दल, इन दलों के अधीन चलने वाले मजदूर संगठन और इनकी राजनीति को हवा पानी देने वाले अखबार ये सभी उन्हीं नीतियों को मजबूती देंगे जिन्हें सरकार आतंकवाद के नाम पर वाजिब आंदोलनों को कुचलने के लिए तैयार करेगी।पिछले 10 वर्षों के दौरान अब आम आदमी भी देखने लगा है कि इस देश में दो देशों का अस्तित्व है। एक ऐसा देश जिसमें आबादी का 15-20 प्रतिशत रहता है और शेष 80-85 प्रतिशत दूसरे देश का बाशिंदा है जिसके पास सामान्य नागरिक के भी अधिकार नहीं होंगे। केंद्रीय सत्ता इस दूसरे देश के नागरिक के प्रति कतई जवाबदेह नहीं होगी। निजीकरण के जरिये सब कुछ बड़े कॉरपोरेट घरानों को सौंप दिया जाएगा जिसकी तार्किक परिणति यह होगी कि जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों का कोई महत्त्व नहीं रहेगा। इन निर्वाचित प्रतिनिधियों की संस्था अर्थात् संसद का भी कोई महत्त्व नहीं रहेगा। प्रधानमंत्री और उसके मंत्रिमंडल की नियुक्ति बाजार की शक्तियाँ तय करेंगी। सभी सेवाओं का निजीकरण हो जाने के बाद प्रधानमंत्री अपने मंत्रिमंडल के अथवा मंत्रिमंडल के बाहर के कुछ लोगों को लेकर एक शीर्ष समिति बनायेगा जो इन निजी कंपनियों के लिए ‘फेसिलिटेटर’ का काम करेगी।

अभी अगर बिजली या पानी की आपूर्ति में कोई दिक्कत होती है तो आप अपने चुने प्रतिनिधि के जरिये या अन्य तरीकों से सरकार का गला पकड़ सकते हैं लेकिन निजीकरण के बाद आप अगर कोई आंदोलन करेंगे तो उन कंपनियों के हितों की रखवाली के लिए सरकार का दमनकारी तंत्र सामने खड़ा मिलेगा। जो 20 प्रतिशत के दायरे में आते हैं उनकी जिंदगी में खलल डालने वाले इन 80 प्रतिशत लोगों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आंध्र प्रदेश, विदर्भ (महाराष्ट्र) या पंजाब के किसान अगर आत्महत्या करते हैं तो उनकी सुध लेने वाला भी कोई नहीं रहेगा। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में छत्तीसगढ़ की तरह देश के अन्य इलाके भी अशांत होंगे और वहाँ सचमुच माओवादी आंदोलन विकसित होगा। सरकार यही चाहती भी है। तब उसके लिए दमन करना और भी आसान हो जाएगा। आज सरकार को अपने बने रहने का औचित्य (लेजिटिमेसी) साबित करने के लिए जरूरी हो गया है कि वह आतंकवाद उग्रवाद/नक्सलवाद/माओवाद का हौव्वा बना रहने दे भले ही यह उसके लिए आत्मघाती क्यों न हो।
लेकिन यह सरकार की अदूरदर्शिता ही कही जाएगी। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें उस 20 प्रतिशत आबादी को किसी भी हालत में स्थायी सुरक्षा नहीं मिल सकती जिसके लिए यह सारा तामझाम किया जा रहा है। बारूद के ढेर पर बैठ कर आप कब तक सुरक्षित महसूस कर सकते हैं!

ऐसी स्थिति में मीडिया की भूमिका क्या होगी इस पर भी विचार करना जरूरी है। नयी आर्थिक नीति के साथ यह बात अनिवार्य रूप से जुड़ी है कि देश के अंदर आंदोलनों का माहौल नहीं होना चाहिए वरना विदेशी कंपनियाँ यहाँ पूँजीनिवेश नहीं करेंगी। इस नीति का एक ‘बिल्ट इन मेकेनिज्म’ है मीडिया से जनआंदोलनों की खबरों का गायब होना। इसके तहत जनआंदोलनों, हड़तालों, धरना प्रदर्शनों आदि की खबरें या तो पूरी तरह गायब कर दी जाती हैं या उन्हें स्थानीय पृष्ठों तक सीमित कर दिया जाता है ताकि यह खबर बस उन्हीं लोगों तक पहुँचे जो लोग इन कार्यक्रमों में शामिल थे। अन्य इलाकों में जाने वाले पृष्ठ पर अगर ऐसी खबर प्रकाशित होगी तो दूसरे क्षेत्र के लोग भी इस तरह की घटनाओं से प्रेरणा ले सकते हैं। जिन इलाकों में बाजार की शक्तियाँ प्रवेश करने की योजना पर काम कर रही हैं वहाँ अँग्रेजी मीडिया के लिए कोई जगह नहीं है। इन इलाकों में अँग्रेजी पढऩे लिखने वालों की संख्या बहुत कम है। ऐसी स्थिति में अपनी बात को जनता तक पहुँचाने और अपने उत्पादों से जनता को अवगत कराने के लिए हिंदी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं का ही सहारा लेना पड़ेगा। आज अगर किसी एक घराने से हिंदी और अँग्रेजी दोनों भाषाओं के अखबार निकलते हैं और बेशक हिंदी अखबार का प्रसार अँग्रेजी के मुकाबले ज्यादा क्यों न हो, विज्ञापन अँग्रेजी अखबारों को ही ज्यादा मिलते हैं। यह बात टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स जैसे अखबारों से लेकर इंडिया टुडे जैसी पत्रिकाओं पर समान रूप से लागू होती है। आने वाले दिनों में यह स्थिति पलट जाएगी। हिंदी और क्षेत्रीय भाषा के अखबारों को मिलने वाले विज्ञापनों में अभूतपूर्व वृद्धि होगी। लेकिन क्या उस समय ये अखबार उन आंदोलनों की खबरें छापेंगे जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ आम जनता द्वारा चलाये जाएँगे? क्या कोका कोला का विज्ञापन न मिलने की कीमत पर कोई अखबार कोका कोला के खिलाफ चलने वाले आंदोलन की खबर प्रकाशित करेगा? हमने अतीत में देखा है कि अपने संस्थान में कभी ट्रेड यूनियन न बनने देने का दावा करने वाले एक घराने ने, जब भी किसी संकट का सामना किया, तमाम अखबारों को अपनी चिटफंड कंपनी के बड़े-बड़े विज्ञापन देकर उनका मुँह बंद कर दिया। ऐसे में निश्चय ही भाषाई पत्रों के सुनहरे दिन तो शुरू हो जाएँगे पर आम आदमी के लिए एक अंधकारमय युग की शुरुआत भी होगी। उसे चौथे स्तंभ का भी सहारा नहीं मिलेगा और उसके आंदोलन के खिलाफ सारे स्तंभ एकजुट हो जाएँगे।

ऊपर जो तस्वीर खींची गयी है वह बहुत निराशाजनक लग सकती है। लेकिन ऐसा है क्या? लातिन अमेरिकी देश बोलीविया में या अर्जेंटीना में विश्वबैंक की नीतियों के खिलाफ जनता ने जिस तरह एकजुट होकर संघर्ष किया और बोलीविया में तो पानी का निजीकरण समाप्त ही करा दिया, उससे यह सबक तो मिलता ही है कि संघर्ष की एकजुटता के आगे सत्ता को झुकना पड़ेगा। अगर संघर्ष इस सीमा तक बढ़ जाता है कि पूरा देश ‘शासन करने योग्य न रह जाए’ (अनगवर्नेबुल) तो बाजार की शक्तियाँ ही सरकार पर दबाव डालना शुरू करेंगी कि वह 80 प्रतिशत लोगों की भी खोज खबर ले लेकिन इस स्थिति तक पहुँचने से पहले काफी खून-खराबा हो चुका होगा। क्रमश:

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Mazdoor Morcha
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