बृजेश सिंह चौधरी एक के बाद एक जिस तरह खुलासे हो रहे हैं, सड़क से लेकर संसद तक जिस तरह सवाल पूछे जा रहे हैं उसके बाद यह तो बिल्कुल स्पष्ट हो गया है की चुनाव आयोग का खेल भारत के लोकतंत्र में किस तरह काम कर रहा है। आयोग द्वारा जिस तरह साइंटिफिक रीगिंग की जा रही थी, वह शीशे की तरह साफ है, लगभग वह प्रक्रिया अब समझ में आ गई है, जिससे चुनाव आयोग खेल करा करता था।
सबसे पहले तो एपिक नंबर का खेल जिस तरह उजागर हुआ और बंगाल में हल्ला मचने के बाद बाद चुनाव आयोग ने यह स्पष्टीकरण दिया नंबर भले एक हो लेकिन मतदाता के नाम एक नहीं हो सकते लेकिन उसके बाद जिस तरह सोशल मीडिया पर और अन्य एक्टविस्ट के प्रोफाइल पर जानकारी आई उसके बाद चुनाव आयोग को कुछ कहते नहीं बना! क्योंकि एक ही नंबर के और एक ही नाम के कई मतदाताओं के नाम सोशल मीडिया पर आने लगे!
एपिक नंबर अर्थात इलेक्शन फोटो आइडेंटी कार्ड जिसे सरकार आधार कार्ड की तरह दावा करती थी की यूनिक होता है लेकिन जब एक ही कार्ड के नंबर हरियाणा दिल्ली और महाराष्ट्र में पाए गए तो आयोग को स्वीकार करना ही पड़ा एपिक कार्ड में कुछ धांधली हो रही है, एक ही नंबर के एक ही नाम के मतदाता हरियाणा में भी वोट डाल रहे हैं महाराष्ट्र में भी और दिल्ली में भी।
जन विचार संवाद के एडमिन अपूर्व भारद्वाज जो हम सब के आदर्श है का एक फीचर प्रकाशित हुआ उत्तर प्रदेश के रामकमल दास का जिसके 43 पुत्र बताए गए, जो एक ही मकान में रहते हैं और आश्चर्य तो इस बात का है कि उनके 13 बेटों की उम्र भी एक जैसी है। उसके पहले राहुल गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया था महाराष्ट्र के एक घर में जो शिर्डी में है 5000 वोटर हैं। ऐसी ही एक घटना राजस्थान के सीकर से वायरल है जहां एक ही नंबर के मकान पर 3000 वोट दर्ज हैं। दरअसल पूरा खेल स्पष्ट नजर आता है, लाखों फर्जी मतदातां चुनाव आयोग ने मतदाता सूची मे पैदा किए हैं और बाद में जब चुनाव के बाद के समय में वोट बढ़ाया जाता है वह इन्हीं वोटर का होता है। और यही कारण है की गिरे हुए वोटो और गिने गए वोटो में अंतर आता है। चुनाव आयोग खेल कर कर रीगिंग से जो वोट बढ़ाता है, समय समाप्त होने के बाद उसके पीछे यही लॉजिक काम करता है तभी तो लोकसभा में 11 दिन बाद वोटिंग टर्न आउट के आंकड़े दिए गए और महाराष्ट्र में तीन दिन में दो बार आंकड़ों में परिवर्तन हुआ हरियाणा में भी यह खेल साफ-साफ नजर आया।
एक्टिविस्ट पूनम अग्रवाल ने अपडेट वीडियो में बताया था की अभी संपन्न लोकसभा चुनाव में 365 लोकसभा क्षेत्र में गिरे गए वोटो और गिने गए वोटो में अंतर था। हरियाणा के उचाना विधानसभा में कांग्रेस के आए हुए प्रत्याशी बृजेंद्र सिंह की एक रिट स्वीकार की गई है जिसमें उन्होंने आरोप लगाया है कि 150 पोस्टल बैलट का एक बंडल जिसका कोड वेरीफाई नहीं हो रहा था उसे चुनाव आयोग ने गिनने से मना कर दिया, और वह मात्र 37 वोटो से चुनाव हारे जबकि नियम यह है की कभी इस तरह की स्थिति आ जाए और जीत हार का अंतर इस तरह खारिज वोटों से कम हो तो दोबारा वोट गिनने चाहिए जिसमें उन्हें भी शामिल करना चाहिए।
लेकिन चुनाव आयोग ने प्रक्रिया के नियमों को धता बताते हुए अपनी मनमानी चलाकर भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार को जीता घोषित किया। हरियाणा के ही एक विधान सभा उम्मीदवार सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार 45,000 रुपये जमा करने के बाद ईवीएम और वीवीपैट के मिलान की बात करने लगे तो चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को नहीं मानते हुए यह सफाई दी कि वोट डिलीट कर दिए गए हैं और अब आप नए सिरे से नए चुनाव चिन्ह पर वोट डालकर ईवीएम और वीवीपैट चेक करें। यही खेल महाराष्ट्र में भी किया गया जब वेरिफिकेशन के पहले सारे डाटा डिलीट कर दिए गए। 70 लाख मतदाताओं के बढ़ाए जाने के आरोपी और मतदाता सूची मांगने की कांग्रेस की मांग अभी तक चुनाव आयोग द्वारा संतोषप्रद रूप से जवाब नहीं दी जा रहा और तो और सरकार नए-नए कानून और नियम बना रहा है जिससे पारदर्शिता प्रभावित हो रही है। अभी-अभी सरकार ने कुछ दिनों पहले यह कानून बनाया के चुनाव आयोग किसी तरह के इलेक्ट्रॉनिक डॉक्यूमेंट उपलब्ध नहीं कराएगा। एक के बाद एक खुली परत के बाद यह स्पष्ट नजर आने लगा है कि भारत का चुनाव आयोग लोकतंत्र में एक राजनीतिक दल के दलाल की भूमिका अदा कर रहा है। 99 प्रतिशत चार्ज बैटरियों पर इलेक्शन आयोग अभी तक कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाया है! एक आरटीआई में ईवीएम निर्माता कंपनी ने यह भी स्वीकार किया है की वोटिंग मशीनों में छेड़छाड़ की जा सकती है!
ईडी सीबीआई पुलिस और अब चुनाव आयोग संस्थाओं को किस तरह गुलाम बना कर देश के लोकतंत्र का मजाक बनाया जा रहा है, यह अंदर ही अंदर देश में सुलगने वाले हालात पैदा कर रहा है! आपकी अमूल्य राय हमारा मार्ग दर्शन करेगी! ईवीएम हटाओ, चुनाव आयोग सुधारो देश बचाओ।