सरकार ने छीन लिया प्रदूषण मुक्त वातावरण फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) जि़ला प्रशासन हो अथवा सुप्रीम कोर्ट, इन सबको सैंकड़ों किलामीटर दूर जलती पराली का धुंआ तो दिख जाता है, लेकिन इनकी नाक के नीचे सड़कों से उड़ती धूल कबाड़ों के जलते ढेर तथा हर मौके-बेमौके-बजते पटाखे नज़र नहीं आते। सड़कों पर लगने वाले लम्बे-लम्बे जाम के कारण होने वाले प्रदूषण से भी किसी को कोई दिक्कत नहीं और उद्योगों से निकलने वाले धुंए व गैसों से भी किसी को कोई तकलीफ नहीं। सारी तकलीफ है तो केवल किसान के खेत में जलने वाली पराली से।
बीते 50 वर्षों से वायु तथा जल प्रदूषण के साथ-साथ ध्वनि प्रदूषण भी लगातार बेकाबू होता जा रहा है। ज्यों-ज्यों प्रदूषण बढ़ता जा रहा है त्यों-त्यों सरकार द्वारा किए जा रहे उपाय न केवल सरकारी बल्कि चन्द अ$फसरों की कमाई बढ़ाने के स्रोत बनते जा रहे हैं। प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर बने बोर्ड तथा विशेष न्यायालय अपने उद्देश्य में पूरी तरह से विफल सिद्ध हुए हैं। परन्तु इनके द्वारा किए जा रहे जुर्माने व लूट कमाई को देखते हुए कहा जा सकता है कि इनका असली उद्देश्य प्रदूषण नियंत्रण न करके केवल वसूली करना रह गया है।
प्रति वर्ष मध्य अक्टूबर के बाद यानी जब मौसम बदलने लगता है तो वायु प्रदूषण तेजी से बढऩे लगता है क्योंकि तापमान व वायु गति घटने से प्रदूषण धरती पर ही टिका रह जाता है। जाहिर है जो धूल-कण व हर प्रकार का धुंआ आकाश की ओर बढऩे के साथ-साथ वायु गति के द्वारा इधर-उधर हो जाते थे, अब स्थिर होकर प्रदूषण बढ़ोत्तरी को दर्शाने लगते हैं। इसी दौरान किसान धान की कटाई भी शुरू करते हैं। अधिकांश किसान पराली जलाने की बजाय उसका सदुपयोग करने लगे हैं। कुछ किसान जिनके पास पर्याप्त साधन नहीं होते वे मजबूरन इसे जला कर अपने खेत खाली करते हैं ताकि गेहूं की बिजाई समय पर हो सके।
खेतों से पराली को काटने व उनकी गांठे बनाने की जो मशीनें सरकार ने उपलब्ध कराई हैं, उनकी व्यवस्था पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबी हुई है। अपनी व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त करने की अपेक्षा सरकार ने किसानों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज करने व भारी जुर्माने लगाने तो कई वर्षों से शुरू कर रखे थे, अब उन किसानों की फसल भी सरकार नहीं खरीदेगी। आए दिन किसानों पर होने वाली दंडात्मक कार्रवाई की चर्चा तो खूब देखने-सुनने को मिलती है; परन्तु भवन निर्माण व सड़कों से उडऩे वाली धूल, तथा जगह-जगह जलते कबाड़ों के ढेर को देखने वाला कोई नहीं है।
पटाखों की तो बात ही छोड़ दीजिए, उनसे तो शायद पवित्र ऑक्सीजन निकलती होगी। आए वर्ष सुप्रीम कोर्ट पटाखों पर प्रतिबन्ध तो लगाती है परन्तु धर्म के ठेकेदार सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर जाकर पटाखे जला कर धर्म की रक्षा करना अपना पुनीत कर्तव्य समझते हैं। दशहरे के दिन पूरे देश में खास कर उत्तर व मध्य भारत में न जाने कितने हजारों व लाखों, पटाखों २से भरे रावण के पुतले जलाए जाते हैं। क्या यह प्रक्रिया वायु प्रदूषण घटाती है? प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर अब होटलों ढाबों में जलने वाले तंदूरों को लेकर भी चालान किए जाने लगे हैं। इस हिसाब से देखा जाए तो वह दिन दूर नहीं जब उपलों व लकड़ी से जलने वाले गरीबों के चूल्हों का भी चालान होने लगेगा। गौरतलब है कि धान कटाई एवं पराली समेटने व जलने का समय अधिकतम 20 से 25 दिन तक का ही रहता है। इस हिसाब से यदि सारा प्रदूषण कबाड़ जलने का ही है तो इसे 10 नवम्बर के बाद तो नही ही होना चाहिए। लेकिन इसके विपरीत ज्यों-ज्यों सर्दी बढ़ती जाएगी और वायु गति घटती जाएगी त्यो-त्यों वायु प्रदूषण बढ़ता जाएगा। जो एक्यूआई (एयर क्वालिटी इंडेक्स) इस समय 200-300 तक देखा जा रहा है, वह आने वाले महीनों में 500-600 तक हो जाता है। विभिन्न स्थानों पर एक्यूआई दर्शाने वाले उपकरण लगा कर सरकार यह तो बताती है कि प्रदूषण किस कदर बढ़ता जा रहा है और इससे जनता की सेहत पर क्या-क्या दुष्प्रभाव पड़ रहा है। लेकिन यह कोई नहीं बताता कि प्रदूषण बढ़ाने का दोषी कौन है और उसके विरुद्ध कार्रवाई कौन करेगा? टूटी व निर्मार्णाधीन सड़कों से लगातार उड़ती धूल तथा वाहनों के लगने वाले जाम से होने वाले प्रदूषण के लिए शासन-प्रशासन के अलावा और कौन जिम्मेवार हो सकता है?
जलते कबाड़ों के ढेर तथा कारखानों से होने वाले प्रदूषण से निबटने का जिम्मा प्रशासन का है या जनता स्वयं लाठी लेकर सड़कों पर निकले? लेकिन जनता को इतनी सुध कहां है, वह तो धर्म की अफीम खाकर भजन-कीर्तन में व्यस्त है।
प्रदूषण के नाम पर वाहनों से लूट वाहनों से निकलने वाले धुंए की जांच के नाम पर सरकार ने जगह-जगह ‘धुम्मा पर्ची की दुकानें खुलवा रखी है। इस पर्ची को लेने के बाद वाहन चाहे जितना मर्जी धुंआ छोड़े, कोई दिक्कत नहीं। यदि शासन-प्रशासन वास्तव में ही वाहनों के धुंए पर नियंत्रण करना चाहे तो सड़कों पर चल रहे वाहनों की मौके पर ही जांच करके उन पर जुर्माना कर सकता है। इसके लिए करीब 30-35 वर्ष पूर्व दिल्ली में मोबाइल जांच गाडिय़ां लगाई गईं थी। आज वे सब कबाडख़ाने में पड़ी है।
इसी प्रदूषण के नाम पर बिना किसी भेदभाव के 10 साल पुराने डीजल व 15 साल पुराने पेट्रोल वाहनों को सड़क से हटाने के आदेश भी जारी कर रखे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि 10 व 15 साल पुराना वाहन चाहे कितनी ही बढिय़ा स्थिति में हो, उसे सड़क से हटना होगा और दो-चार साल पुराना वाहन चाहे कितना ही अनफिट हो सड़कों पर प्रदूषण फैलाता रहेगा। तमाम विकसित देशों में प्रति दो वर्ष या प्रति तीन वर्ष के बाद वाहनों की फिटनेस जांच इसी दृष्टि से की जाती है। दरअसल इस सरकारी आदेश के पीछे प्रदूषण नियंत्रण न होकर वाहन उद्योग को बढ़ावा देना है।
प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर समय-समय पर दिल्ली में भारी वाहनों का प्रवेश बंद कर दिया जाता है अथवा सरकारी तौर पर प्रवेश शुल्क वसूला जाता है। इस शुल्क की आड़ में नगर निगम व पुलिसकर्मी अच्छी-खासी लूट कमाई करते हैं। इसके चलते जनता को प्रदूषण के साथ-साथ सरकारी लूट को भी भुगतना पड़ता है।
जल और ध्वनि प्रदूषण वायु प्रदूषण को तो अनदेखा नहीं किया जा सकता इसलिए इस पर तो चर्चा सदैव चलती रहती है। चर्चा के साथ-साथ तरह-तरह के धंधे भी चलते रहते हैं। लेकिन जल प्रदूषण की चर्चा यदा-कदा ही होती है। इसके नाम पर कभी नमामि-गंगे तो कभी यमुना प्रोजेक्ट चलाए जाते हैं। बीते तीसियों वर्ष में इन प्रोजेक्टों पर हजारों-करोड़ रुपए शासन-प्रशासन द्वारा डकारे जा चुके हैं और यूं ही डकारे जाते रहेंगे। हरियाणा व दिल्ली का शायद ही कोई सीवेज प्लांट ठीक से काम कर रहा हो, अधिकांश तो ठप्प पड़े हैं। इन प्लांटों पर भी जनता के सैंकड़ों करोड़ रुपए डकारे जा चुके हैं।
ध्वनि प्रदूषण को तो प्रदूषण माना ही नहीं जा रहा। कायदे-कानून के हिसाब से लाउड स्पीकर का इस्तेमाल करने के लिए जि़ला प्रशासन की अनुमति अनिवार्य होती है। परन्तु गली-गली में लाउड स्पीकरों से शोर मचाने वालों को इन कानूनों का कोई ज्ञान नहीं दिखता और न ही प्रशासन उन्हें इससे अवगत कराने की कोई आवश्यकता समझता है। रात हो या दिन जब जिसका जी चाहे कितनी ही ऊंची आवाज़ में शोर मचाए बहरे प्रशासन को कुछ भी सुनाई नहीं देता।
प्रदूषण के नाम पर होटलों व ढाबों से वसूली बीते तीन-चार वर्षों में होटल व ढाबों को भी प्रदूषण नियंत्रण विभाग ने अपने शिकंजे में ले लिया है। ऐसे में भला नगर निगम पीछे क्यों रहता, उसने भी कूड़े-कचरे के नाम पर इन्हें लपेट लिया है। सर्वविदित है कि होटलों व ढाबों से किसी भी प्रकार का कोई कूड़ा-कचरा नहीं निकलता। भोजन की जो जूठन बचती है उसे प्रति दिन सुअर पालक नियमित रूप से लेकर जाते हैं। सूखा कूड़ा- कबाड़ा लेने के लिए बाकायदा कबाड़ी इनके यहां आते रहते हैं। ऐसे में नगर निगम का कोई यहां दखल बनता ही नहीं है लेकिन प्रशासनिक दादागीरी के चलते निगम इनसे वसूली करता रहता है। अधिकांश होटलों व ढाबों में अब लकड़ी व कोयले का इस्तेमाल न होकर बिजली चालित उपकरणों व गैस का ही इस्तेमाल होता है। इसके बावजूद भी प्रदूषण विभाग अपनी दादागीरी के बूते इन्हें नोचता रहता है।