निजी हाथों में गई शामलात जमीन पंचायतों को वापस होगी

निजी हाथों में गई शामलात जमीन पंचायतों को वापस होगी
April 15 15:57 2024

पर्यावरण प्रेमियों की मेहनत रंग लाई

फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) भूमाफिया द्वारा हड़पी गई अरावली के गैर मुमकिन (जिस पर कृषि नहीं हो सकती) पहाड़ों की शामलात यानी पंचायत की साझा जमीन मुक्त कराने की पर्यावरण प्रेमियों की कवायद रंग ला रही है। कर्नल सर्वदमन सिंह ओबेरॉय की याचिका पर हाईकोर्ट की सख्ती से हरकत में आए जिला प्रशासन ने राजस्व विभाग से ऐसी जमीनों की जानकारी मांगी है। कर्नल सर्वदमन सिंह ने अरावली पहाडिय़ों की बेशकीमती जमीन पंचायतों को वापस दिए जाने की याचिका दायर की हुई है, यदि उन्हें सफलता मिलती है तो पतंजलि के मालिक लाला रामदेव की कई छद्म कंपनियों के नाम खरीदी गई अरबों रुपये जमीन सहित अन्य भूमाफिया द्वारा कब्जाई गई जमीन भी दोबारा पंचायतों को मिल जाएगी।
पर्यावरण प्रेमी सुनील हरसाना बताते हैं कि अरावली की संरक्षित पहाडिय़ां मध्यकालीन भारत यानी मुगल शासन से गैर मुमकिन यानी कृषि के लिए अयोग्य जमीन के रूप से राजस्व अभिलेखों में दर्ज हैं। यानी इन पहाडिय़ों पर कृषि नहीं होती, इसलिए इस जमीन पर चकबंदी कानून भी नियमानुसार लागू नहीं होता। चकबंदी कानून का उद्देश्य तितर बितर पड़ी कृषि योग्य भूमि को समेकित कर एक बड़ी जोत भूमि के रूप में विकसित करना है। यह कानून गैर कृषि भूमि पर लागू नहीं होता। बताते हैं कि जय सिंह बनाम भारत सरकार केस में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय है कि शामलात जमीन पंचायतों की भूमि है, इसे निजी हाथों में नहीं बेचा जा सकता क्योंकि ये साझा भूमि है।

भूमाफिया ने इस शामलात भूमि को हथियाने के लिए पंजाब विलेज कॉमल लैँड एक्ट 1961 का दुरुपयोग किया। इस एक्ट के अनुसार वर्ष 1938 से पहले किसी व्यक्ति ने इस शामलात भूमि को जोत बो कर इस पर खेती शुरू की थी तो उसे नई तोड़ के रूप में दर्ज किया जाए। ऐसी कृषि भूमि पर कब्जाधारी को मालिकाना हक दिया जाए। बाकी गैर कृषि योग्य भूमि साझा इस्तेमाल के लिए छोड़ दी जाए।

ये एक्ट अरावली पहाडिय़ों पर लागू ही नहीं होता क्योंकि राजस्व अभिलेखों में ये गैर मुमकिन पहाड़ के रूप में दर्ज है। बताते हैं कि मांगर की 4262 एकड़ जमीन में से 3810 एकड़ जमीन गैर मुमकिन पहाड़ में दर्ज है। गैर मुमकिन पहाड़ होने के बावजूद तत्कालीन भूमाफिया, राजनेता, ग्राम पंचायतों और अधिकारियों की मिलीभगत से 1986 में मांगर की इस गैर कृषि योग्य जमीन की चकबंदी करा दी गई। चकबंदी के बाद भूमाफिया ने पंचायतों से, व्यक्तियों से मिलीभगत करके इस जमीन की जीपीए कराकर या अन्य किसी तरह से इसकी खरीद-फरोख्त शुरू कर दी।

रिर्पाेट्स कलेक्टिव की खबर के अनुसार पिछले एक दशक में बाबा रामदेव ने शेल कंपनियों के माध्यम से मांगर में सैकड़ों एकड़ जमीन की खरीद-फरोख्त कर अकूत संपत्ति कमाई। इन कंपनियों में से अधिकतर का प्रबंधन बाबा रामदेव के परिवारी सदस्यों अथवा उनके करीबी व्यापारिक सहयोगियों द्वारा किया जा रहा है। मांगर में बहुत से प्रॉपर्टी डीलरों की पहचान लाला रामदेव के लिए जमीन खरीदने वाले एजेंट के रूप में की जाती है। केवल लाला रामदेव ही नहीं एमथ्रीएम, एवियो सहित अनेक अन्य व्यापारिक संस्थाओं ने यहां बड़ी गैर मुमकिन पहाड़ की ज़मीन कौडिय़ों के भाव खरीद कर सोने के दाम पर बेचकर मोटा मुनाफा कमाया है।

गैर कृषि योग्य भूमि की प्राकृतिक हरियाली उजाड़ कर क्षेत्र के पर्यावरण और पारिस्थिति की तंत्र को धीरे धीरे खत्म किया जा रहा है। दिल्ली-एनसीआर का फेफड़ा कही जाने वाली अरावली, भूमाफिया-भ्रष्ट नेताओं और मौका परस्त प्रशासनिक अधिकारियों के बीच बंदरबांट के कारण खत्म हो रही है। इस पर अंकुश लगाने के लिए गुडग़ांव के पर्यावरणय प्रेमी कर्नल सर्वदमन ओबेरॉय ने हरियाणा एंड पंजाब हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। सुनील हरसाना के अनुसार हाईकोर्ट ने राज्य के राजस्व विभाग से मांगर में हुई खरीद फरोख्त की विस्तृत रिपोर्ट के साथ जवाब तलब किया था लेकिन पिछली पेशी में कोई जवाब नहीं दिया गया। अदालत ने अगस्त में सुनवाई की तारीख तय कर राज्य के राजस्व विभाग को कड़ा पत्र लिख कर जवाब मांगा है, जवाब नहीं देने पर कड़ा फैसला लेने की चेतावनी भी जारी की है।

हाईकोर्ट की फटकार के बाद हरकत में आए राजस्व विभाग ने टीम गठित कर जिला प्रशासन और संबंधित लोगों से दस्तावेज तलब किए हैं। सुनील कहते हैं कि वर्ष 2015 में विशेषज्ञ समिति ने रिपोर्ट प्रस्तुत की थी जिसमें मांगर बनी को घने जंगलों के रूप में चिह्नित करने के साथ ही अवैध कब्जों के कारण पारिस्थितिकी तंत्र को अपरिवर्तनीय क्षति होना बताते हुए इसे रोकने की सिफारिश की थी। बावजूद इसके आज भी इस इलाके में अवैध कब्जे और निर्माण जारी हैं। यदि अदालत ने पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में निर्णय दिया तो शामलात भूमि निजी हाथों से वापस होगी और पहाड़ी का प्राकृतिक रूप लौटेगा।

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Mazdoor Morcha
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