फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) नगर निगम में भ्रष्टाचार के रोज नए कीर्तिमान बन रहे हैं, विकास कार्यों में करोड़ों रुपयों की बंदरबांट करने वाले खाऊ अधिकारियों ने कूड़े से भी लूट कमाई कर डाली। निगम के भ्रष्ट अधिकारी लूट कमाई के लिए म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट का निस्तारण करने में तो रुचि नहीं लेते लेकिन जिस इंडस्ट्रियल वेस्ट, बायोकेमिल वेस्ट, सीएंडडी वेस्ट के निस्तारण की उनकी जिम्मेदारी नहीं है, उसका निपटान करवा मोटी कमाई कर रहे हैं। यह सब काम प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निकम्मे और खाऊ अधिकारियों की मिलीभगत से ही संभव हो पाता है। इस तरह ये भ्रष्ट अधिकारी नगर निगम के खजाने पर दूसरे कचरों के निस्तारण का बोझ डाल कर खुद अपनी जेबें भर रहे हैं। पांच लाख का लहंगा, ज्वैलरी, महंगी गिफ्ट मिलने पर मैडम भी मातहतों की रिश्वतखोरी पर आंखें बंद कर लेती हैं।
हरियाणा शहरी स्थानीय निकाय विभाग की ओर से नगर निकायों को म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट के प्रबंधन और निस्तारण का जिम्मा दिया गया है। म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट में औद्योगिक कचरा, बायोमेडिकल कचरा, कंस्ट्रक्शन एंड डिमोलिशन वेस्ट शामिल नहीं है। आंकड़ोंं के अनुसार औद्योगिक नगर होने के कारण फरीदाबाद में निकलने वाले कूड़े में 96 प्रतिशत से अधिक कचरा औद्योगिक इकाइयों, सीएंडडी वेस्ट, बायोमेडिकल का होता है। निगम सूत्रों के अनुसार केवल तीन प्रतिशत कचरा ही म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट के तहत आता है, जिसका आसानी से निस्तारण किया जा सकता है लेकिन इतने कम कचरे से न तो वेंडर कंपनी का भला होगा न ही निगम और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के खाऊ अधिकारियों का।
औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले कचरे के निस्तारण और प्रबंधन का जिम्मा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का है, यहां तक कि उद्योगों की कैंटीन से निकलने वाले कचरा के निपटारे की जिम्मेदारी भी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की है। बोर्ड उद्योगों में ही वेस्ट मैनजमेंट प्लांट लगवाकर या किसी एजेंसी के द्वारा यह काम करवा सकता है। बोर्ड के निकम्मे अधिकारी इसमें रुचि नहीं ले रहे और उद्योगों का कचरा म्युनिसिपल वेस्ट दर्शा कर नगर निगम के खत्तों और ट्रांसफर स्टेशनों तक पहुंचाया जा रहा है। निगम के भ्रष्ट अधिकारी भी इस नियम से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि औद्योगिक कचरा नहीं डाला जा सकता, इसलिए बाकायदा रेट तय किए हैं।
भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार औद्योगिक कचरा उठाने वाले प्रत्येक छोटे ट्रैक्टर ट्रॉली से दो हजार रुपये, बड़े ट्रैक्टर ट्रॉली से पांच हजार रुपये प्रतिमाह वसूले जाते हैं, इसके अलावा प्रत्येक वेंडर चालीस से पचास हजार रुपया प्रतिमाह अदा करता है। सूत्र बताते हैं कि यह रकम एचकेआरएन का जेई अरुण और अंकित वसूल कर आका फर्जी डिग्री वाले एक्सईएन पद्मभूषण तक पहुंचाते हैं। एसडीओस सुरेंद्र खट्टरतक भसी काली कमाई का कुछ हिस्सा पहुंच जाता है जिस कारण वसह भी बस तमाशा देखता है। वर्तमान में पद्मभूषण ही कूड़ा माफिया की भूमिका में है जो पांच अलग एजेंसियों और अपने चेले बिल्लू के माध्यम से अवैध उगाही कर रहा है। इसी तरह प्रत्येक डिवीजन में निकलने वाले औद्योगिक कचरे की मात्रा के अनुसार कमाई होती है। सारी कमाई की हिस्साबांट ऊपर तक की जाती है।
यह औद्योगिक कचरा नगर निगम के ट्रांसफर स्टेशन और खत्तों में डाला जाता है और इसे म्युनिसिपल वेस्ट बता कर ढोने वाले वेंडर को प्रति टन की दर से निगम के खजाने से भुगतान किया जाता है। यानी वेंडर खुश, जेई-एक्सईएन भी खुश और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी भी खुश। निगम सूत्रों के अनुसार कचरे के इस खेल में प्रतिमाह कई करोड़ रुपयों की बंदरबांट होती है।
भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार 29 जनवरी को डबुआ मंडी स्थित नगर निगम के डंपिंग यार्ड में दो ट्रैक्टर ट्रॉलियों को औद्योगिक कचरा डालते हुए पकड़ा गया। पूछताछ मेंं सामने आया कि यह तो नियमित रूप से औद्योगिक कचरा डालते आ रहे हैं। इसकी जानकारी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों को भी दी गई लेकिन समाचार लिखे जाने तक उनकी ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई थी। वेंडर धर्मराज और योगेश नगर निगम में एक्सईएन पद्मभू्षण से मिलकर अपने इधर ट्रैक्टर-ट्रॉली छुटाने के प्रयास में जुटे थे।
पार्क-गोबर से भी हो रही कमाई निगम के भ्रष्ट और खाऊ अधिकारी लूट कमाई के हर तरीके अपना रहे हैं उनमें एक है हॉर्टीकल्चर वेस्ट। नगर निगम के अधिकतर पार्कों की देखरेख, मेनिंटेंस करने का जिम्मा आरडब्ल्यूए के पास है अन्य बड़े पार्कों को कॉरपोरेट कल्चर के तहत कॉरपोरेट कंपनी, अस्पताल वालों ने गोद ले रखा है। पार्क गोद लेने की शर्तों में उसमें से निकलने वाले कचरे का भी निस्तारण उन्हें ही करना है, फूल पत्ती, फलों के छिलके आदि बायो वेस्ट को खाद में तब्दील करने के लिए पार्क में ही प्लांट लगाया जाना चाहिए, इसी तरह पार्क के ठोस कचरे का प्रबंधन भी किया जाना चाहिए।
कंस्ट्रक्शन एंड डेमोलिशन वेस्ट के सौ प्रतिशत निस्तारण का जिम्मा निर्माणकर्ता का ही है लेकिन खाऊ अधिकारियों और वेंडरों की मिलीभगत से यह भी उठा कर निगम के खत्तों में डाल दिया जाता है, इसका भुगतान जनता के पैसों से किया जाता है जबकि निर्माणकर्ता से वसूली गई राशि की मैडम तक हिस्साबांट होती है। निगम सूत्रों के अनुसार सड़कों पर आवारा घूमने वाले गोवंश व अन्य पशुओं का गोबर आदि उठाने की जिम्मेदारी भी निगम की नहीं है। इसके लिए कैटल डंग मैनेजमेंट पॉलिसी निर्धारित है लेकिन अधिकारी जानबूझ कर इसे लागू नहीं कर रहे। सड़कों पर पड़ा गोबर भी लंबे समय से म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट बता कर उठाया जा रहा है, और निगम के खजाने से उसका भुगतान भी किया जा रहा है।