फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) शहर की गंदगी, टूटी सड़कें, अपर्याप्त पेयजल आपूर्ति, उफनते सीवर आदि समस्याएं ज्यादा जोगी मठ उजाड़ वाली कहावत को चरितार्थ कर रही हैं। शहर को सजाने संवारने के लिए यहां नगर निगम, एफएमडीए, हूडा तो हैं ही प्रधानमंत्री मोदी की ड्रीम परियोजना स्मार्ट सिटी भी मौजूद है। इन सभी संस्थानों का बजट कई हज़ार करोड़ है लेकिन शहर की जनता को विकास और सुविधाओं के नाम पर केवल धोखे, जुमले और घोटाले ही मिल रहे हैं। नगर निगम तो स्ट्रीट लाइटों को (सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डेटा इक्विजिशन) स्काडा जोड़ ही रहा है। अब एफएमडीए भी उन्हीं स्ट्रीट लाइटों को स्काडा से जोडऩे जा रहा है, उसने भी पचास करोड़ रुपयों का बजट बनाया है।
सुधी पाठकों को याद होगा कि पूर्व निगमायुक्त मोना ए श्रीनिवास ने बीती जनवरी में घोषणा की थी कि शहर की सारी स्ट्रीट लाइटों को स्काडा सिस्टम से जोड़ा जाएगा। सबसे पहले फरीदाबाद विधानसभा यानी स्थानीय शहरी निकाय मंत्री विपुल गोयल के विधानसभा क्षेत्र की स्ट्रीट लाइटें स्काडा से जोड़ी जाएंगी, उसके बाद बाकी सभी विधानसभा क्षेत्रों में स्ट्रीट लाइटें लगाई जाएंगी। दरअसल, विपुल गोयल ने स्ट्रीट लाइटों की मरम्मत कराने का आदेश दिया था, मरम्मत में थोड़ा बहुत खर्च होता और कमीशन भी जरा सा बनता तो स्काडा का ढिंढोरा पीटा गया था। इस सिस्टम से स्ट्रीट लाइटों को जोडऩे में चालीस-पचास करोड़ रुपये खर्च बनेगा तो कमीशन भी मोटा बनना तय है।
भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार नगर निगम ने इस योजना को अमल में लाने की तैयारी भी शुरू कर दी है। बीते दिनों एफएमडीए के मुख्य अभियंता रमेश बागड़ी ने ऐलान किया कि एफएमडीए शहर की पचास हजार स्ट्रीट लाइटों को स्काडा सिस्टम से जोड़ेगा। सरकार से इसकी मंजूरी भी मिल गई है, पचास करोड़ का बजट बनाया गया है। रमेश बागड़ी के अनुसार एफएमडीए नगर निगम व हूडा के इलाकों की स्ट्रीट लाइटों में यह सिस्टम लगाएगा। पूर्व निगमायुक्त मोना ए श्रीनिवास की मानें तो शहर में बीस हजार स्ट्रीट लाइटें हैं, जबकि रमेश बागड़ी पचास हजार बता रहे हैं यानी तीस हजार स्ट्रीट लाइटें हूडा के क्षेत्र में लगी हैं, यहां समझने वाली बात यह भी है कि हूडा के अधिकतर सेक्टर भी नगर निगम के हैंडओवर हो चुके है यानी उनकी स्ट्रीट लाइटें भी बकौल मोना ए श्रीनिवास बीस हजार में ही शामिल हैं। ऐसे में तीस हजार लाइटें हूडा के अधिकार क्षेत्र में होना असंभव सा प्रतीत होता है।
जानकारों का कहना है कि जितनी ज्यादा संख्या दर्शाई जाएगी उतना ही बड़ा बजट बनेगा इसलिए रमेश बागड़ी ने पचास हजार स्ट्रीट लाइटें गिन डालीं। जानकारों को आशंका है कि एक ही स्ट्रीट लाइट के लिए दोनों विभाग सरकारी धन की बंदरबांट करेंगे। नगर निगमको भी स्काडा का भुगतान किया जाएगा और एफएमडीए को भी। जाहिर है कि करोड़ों की इस रकम का अधिकारियों से लेकर नेताओं के बीच बंटवारा होगा। केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर से लेकर भगोड़ा धनेश अदलखा तक अधिकारियों से कहते सुनाई दिए हैं कि चिंता मत करो अभी बीस साल तक कांग्रेस सत्ता में नहीं आने वाली, इसका अर्थ है कि जमकर घोटाले करो और जनता का धन लूट-बांट लो, हमारी ही सरकार रहने वाली है इसलिए जांच का कोई सवाल ही नहीं उठता।
अब देखना यह है कि सरकार स्ट्रीट लाइटों में किसी एक संस्था से ही स्काडा सिस्टम लगवाती है या दोनों ही काम करेंगे, यदि ऐसा हुआ तो एक काम के लिए दोहरा भुगतान होना निश्चित है। दोहरा भुगतान यानी लूट कमाई में सबकी हिस्सेदारी। आर्थिक मामलों के जानकार बताते हैं कि सरकारों का जीएसटी कलेक्शन लगातार बढ़ता जा रहा है। जनता से जिस कदर टैक्स वसूला जा रहा है उसे सही साबित करने के लिए विकास कार्यों का दिखावा भी तो करना है और नेता-अधिकारियों की जेब भी भरनी है। इसलिए बड़ी बड़ी और मोटे खर्च वाली योजनाएं लाई जाती हैं। कमीशनखोरी इतनी ज्यादा होती है कि कोई भी विकास कार्य दो- तीन साल में ही बर्बाद हो जाता है, इसे फिर से बनवाने का खेल किया जाता है। कई बार तो एक ही विकास कार्य के लिए कई विभागों को भुगतान कर दिया जाता है, स्ट्रीट लाइटों को स्काडा में बदलने मेें भी यही खेल न खेला जाए।
स्काडा से भी सस्ती तकनीक उपलब्ध एफएमडीए स्ट्रीट लाइटों को सुबह-शाम समय पर जलाने-बुझाने के लिए पचास करोड़ की मोटी रकम खर्च करने वाला है। अधिकारियों का दावा है कि यदि कोई स्ट्रीट लाइट खराब हुई तो कमांड एंड कंट्रोल सेंटर में बैठे अधिकारी को तुरंत पता चल जाएगा और उसे दुरुस्त करवाया जाएगा। यानी कमांड एंड कंट्रोल सेंटर के संचालन उसमें लगे स्काडा के उपकरण, कंप्यूटर की देखभाल, उनके संचालन के लिए स्टाफ पर भी साल में एक डेढ़ करोड़ का खर्च। इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर शकील अहमद के अनुसार जापान जैसे देशों में स्ट्रीट लाइट समय से जलाने बुझाने के लिए लाइट डिपेंडेंट रजिस्टेंस (एलडीआर) आधारित तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।
दो ढाई सौ रुपये की इस तकनीक में एक निश्चित अंधेरा होते ही स्ट्रीट लाइटें स्वत: जल जाती हैं और निश्चित उजाला होने पर बुझ जाती हैं। कितना उजाला होने पर लाइट बुझेगी और कितना अंधेरा होने पर जलेगी यह सब सर्किट से निर्धारित किया जा सकता है, यही कारण है कि जहां यह तकनीक लगी है वहां बारिश के काले बादल छाने पर प्रकाश की मात्रा कम होते ही ये लाइटें अपने आप जलने लगती हैं। यह तकनीक सस्ती तो है ही, इसकी देखरेख के लिए करोड़ों का कमांड सेंटर, उसके साफ्टवेयर की रॉयल्टी और निगरानी करने वाले स्टाफ का खर्च भी नहीं होगा।
एक एलडीआर की लाइफ साइकिल कम से कम दस लाख स्विचिंग की होती है यानी बीसियों साल की फुरसत। संदर्भ वश, बीते कई माह से यह संवाददाता देखता आ रहा है कि बाटा रेलवे ओवरब्रिज पर लाइटें जलाने बुझाने की कोई व्यवस्था नहीं है, पूरे दिन ये लाइटें जलती रहती हैं। इस तरह की अव्यवस्था केवल बाटा पुल पर ही नहीं है, शहर में इस तरह के न जाने कितने स्थान हैं जहां पर बिजली की बर्बादी हो रही है। और यह भी तब हो रहा है जब आए दिन बिजली कमी की वजह से कट लगते हैं।