फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) पुलिस उपायुक्त ट्रैफिक जयवीर सिंह ने मंगलवार को मॉल संचालकों के साथ बैठक कर उन्हें फरमान सुनाया कि यदि किसी मॉल के बाहर सड़क पर कोई वाहन खड़ा मिलेगा तो उसका चालान काटा जाएगा, साथ ही मॉल के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह आदेश शहर की मुख्य सड़कों पर वाहन खड़े होने से लगने वाले जाम की समस्या के मद्देनजर जारी किया।
वैसे ज्यादातर मॉल में पार्किंग की व्यवस्था है, बावजूद इसके सड़क पर खड़े वाहनोंं को हटाने के लिए कार्रवाई करने के फैसले का आम लोगों ने स्वागत किया है। साथ ही लोगों का सवाल है कि हार्डवेयर से बाटा ओवरब्रिज तक सड़क के दोनों ओर बड़े बड़े 30-30, 40-40 पहियों वाले ट्रक, ट्रॉले कैसे खड़े रहते हैं, क्या यातायात पुलिस ने ये सड़कें इन ट्रक वालों को बेच रखी हैं। इन भारी वाहनों के कारण ही दिन के अधिकतर समय यहां जाम की स्थिति बनी रहती है। ये भारी वाहन यातायात पुलिस को क्यों नजर नहीं आते, जबकि यातायात पुलिस यहां दिन भर डोलती रहती है। यही हाल सेक्टर 13 में एस्कॉट्र्स के सामने वाली सड़क का है यहां भी दिन भर सड़क तक वाहनों की कतार खड़ी रहती है। यातायात पुलिस को यह सब क्यों नजर नहीं आता। जानकार कहते हैं कि मॉल के सामने अधिकतर आम आदमी के दोपहिया चार पहिया वाहन खड़े होते हैं, उनसे वसूली करने में महकमे की बदनामी होती है, इसलिए उनका चालान काट कर सरकार द्वारा दिया गया टारगेट पूरा किया जाता है, रही बात भारी वाहनों की तो वह बिना चूं चपड़ किए नजराना दे देते हैं और कहीं शिकायत नहीं करते। इस तरह यातायात पुलिस सरकार और अपनी वसूली का संतुलन साधती है, यही कारण है कि दिन दहाड़े सड़कों के किनारे खड़े भारी वाहनों की तरफ यातायात पुलिस देखती भी नहीं।
यातायात पुलिस को सड़कों पर बिना रजिस्ट्रेशन प्लेट अवैध रूप से चल रहे ट्रैक्टर-ट्रॉलियां भी नजर नहीं आतीं। कई ट्रैक्टर तो दो दो ट्रॉलियां एक साथ जोड़कर उन पर खतरनाक ढंग से सरिया, लोहे की शीट लेकर सड़कों पर दौड़ते रहते हैं। इन ट्रैक्टरों की चपेट में आकर अक्सर कोई न कोई दोपहिया वाहन सवार गंभीर हादसे का शिकार होते रहते हैं, बिना इंडिकेटर वाले ये खतरनाक ट्रैक्टर ट्रॅाली कहीं भी अचानक मुड़कर या लेन बदलने के कारण पीछे से आने वाले वाहनों के लिए खतरा साबित होते हैं। यातायात पुलिस को ये खतरनाक ट्रैक्टर-ट्रॉली और टैंकर नजर नहीं आते। सड़क पर खतरनाक ढंग से चल रहे ये अवैध वाहन यमदूत की सवारी से कम नहीं है लेकिन यातायात पुलिस की नजर में सब चंगा है, उसे तो बस मॉल के बाहर खड़े वाहनों के कारण लगने वाले जाम से दिक्कत है। डीसीपी ट्रैफिक महोदय, शहर की यातायात व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए दिखावे की बैठकों से काम नहीं चलेगा, यदि आप सच में गंभीर हैं तो सिर्फ मॉल के सामने ही नहीं शहर में कहीं भी खासकर हार्डवेयर-बाटा और सेक्टर 13 में एस्कॉट्र्स कंपनी के बाहर अवैध रूप से पार्क किए गए वाहनों को हटवाइए, हां, इसमें महकमे की ऊपरी कमाई बंद होने का जोखिम है।
विशेषज्ञ डॉक्टरों को भगाने का कोई अवसर छोड़ते नहीं हैं डीन डॉ. कालिदास रेडियोलॉजी में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर कार्यरत बेहतरीन डॉक्टर शालिनी ने जब एसोसिएट प्रोफेसर बनने की तमाम शर्तें पूरी कर ली थीं तो दिसंबर 2025 में उन्होंने डीन कालिदास को कहा कि बेशक उनका 1.40 लाख रुपये वेतन एपी का ही रहने दिया जाए लेकिन उन्हें एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर डेजिग्नेट कर दिया जाए। इससे कॉरपोरेशन को तो एक ढेले का भी नुकसान नहीं होता लेकिन डॉक्टर की वरिष्ठता बढऩी शुरू हो जाती है और इस तरह की सुविधा कालिदास से पहले के डीन अपने डॉक्टरों को देते रहे हैं लेकिन कालिदास ने साफ मना कर दिया। जब डॉक्टर शालिनी ने नौकरी छोडऩे का नोटिस कालिदास को थमा दिया तो वे उनकी बात मानने को तैयार होने का दिखावा करने लगे लेकिन डॉ. शालिनी ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि मां अमृतानंमयी अस्पताल में उनकी भर्ती बतौर एसोसिएट प्रोफेसर हो गई है और वेतन भी तीन लाख रुपये है, उन्होंने फरवरी में वहां ज्वाइन कर लिया। इसी तरह चर्म रोग विशेषज्ञ एक डॉक्टर भी इनकी नौकरी छोड़कर एक प्राइवेट अस्पताल में चली गई। कॉर्डियोलॉजी में डॉ. अरविंद स्थायी तैनाती पर थे और एक अन्य डॉक्टर बिनय पांडेय जो सुबह तीन चार घंटे आकर कॉर्डियोलॉजी का काफी काम कर जाते थे। अगस्त 2025 मेें डॉ. जैन की छुट्टी कर दी गई और डॉ. अरविंद को बसई दारापुर भेज दिया गया। कॉरपोरेशन की मूखर्ता की बात यह है कि जो डॉ. अरविंद कैथलैब पर रोजाना कितने ही हृदयरोगियों के उपचार करते थे वहां ले जाकर ओपीडी में बैठा दिए गए। वहां उनका काम केवल मरीजों को देखना, बहकाना और जरूरी हो तो रेफर करना ही रह गया था। अरविंद जैसे नौजवान बेहतरीन काम करने वाले डॉक्टर ने चंद माह में ही समझ लिया कि यदि वे यूं ही ओपीडी में बैठे रहे तो कैथलैब पर काम करना ही भूल जाएंगे लिहाजा उन्होंने कॉरपोरेशन की तीन लाख की नौकरी को ठोकर मार कर फरीदाबाद के सर्वाेदय अस्पताल में पांच लाख की नौकरी पकड़ ली। इनके अलावा नेफ्रोलॉजी की डॉ. डेनिस, न्यूरोलॉजी के डॉ. मयंक व ऑन्कोलॉजी के डॉ. राय को यहां से भगाने वाले मामले पिछले अंकों में प्रकाशित किए जा चुके हैं। संदर्भवश, यह जानना भी जरूरी है कि मुख्यालय में जो नकली डॉक्टर कमिश्नर पदों पर बैठे मोटी मोटी तनख्वाहें झटक रहे हैं उनको बाजार में टके भाव नहीं पूछा जाता। गौरतलब है कि ये तथा कुछ ऐसे ही और भी कर्तव्यनिष्ठ डाक्टर लोग जो व्यापारिक अस्पतालों में न जाकर सरकारी अस्पतालों में बेहतरीन सुविधा देने की इच्छा रखते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से कारपोरेशन में बैठे हरामखोर निकम्मे एवं अफसरशाही के नशे में डूबे लोगों को इनसे काम लेने की तमीज भी नहीं है। सेनाओं से सेवानिवृत्त होकर आने वाले अधिकांश डॉक्टर जो बीस-बीस साल पहले प्रोफेसर बन चुके होते हैं निजी अस्पतालों में जाने की अपेक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पतालों को प्राथमिकता देते हैं। इसी के चलते पूर्व डीन डॉ. दास ने सेनाओं से अनेकों काबिल डॉक्टरों को अपने यहां तैनात किया था लेकिन कॉरपोरेशन के मौजूदा सिस्टम पर काबिज लोगों की बदतमीजियों को देखते हुए ऐसे लोग भी यहां आने से गुरेज करने लगे हैं।