मज़दूर मोर्चा ब्यूरो 28 अक्टूबर के अधिकांश अखबारों के मुख पृष्ठ पर बड़ी सुर्खी थी, ‘पहली जनवरी 2026 से केन्द्रीय कर्मचारियों के वेतन में बम्पर वृद्धि’ खबर पढ़ते ही तमाम कर्मचारी व पेंशनर एकदम से 2026 की पहली तारीख का उत्सुकता से इंतजार करने लगते हैं, उनके मन में लड्डू फूटने लगते हैं। लेकिन जब पूरी खबर पढ़ लेते हैं तो उनकी हालत गुब्बारे से निकली हवा जैसी हो जाती है। वास्तव में खबर यह है कि बिहार चुनाव सिर पर देखते हुए मोदी सरकार ने दसवें वेतन आयोग की घोषणा मात्र ही की है। इसकी चेयरपर्सन सुप्रीम कोर्ट की एक सेवा निवृत जज श्रीमती देसाई होंगी। कुल मिलाकर देखा जाय तो मोदी ने अभी वेतन ओयोग के चेयरपर्सन का चुनाव किया है। इसके बाद धीरे-धीरे आयोग के सदस्य चुने जाएंगे, फिर उनके बैठने का स्थान तय किया जाएगा, फिर उनके स्टाफ, वाहन व अन्य खर्चे आदि का प्रावधान किया जाएगा। इस सारी कवायद में कम से कम छ: माह का समय तो लगेगा ही।
जब मार्च 2027 में यूपी का चुनाव सिर पर होगा तब फिर से इस आयोग की कुछ गतिविधियों को लीक करवा कर मीडिया में सुर्खियां बनवाई जाएंगी। धीरे-धीरे यह आयोग अपनी सिफारिशों का एक ब्योरा तैयार करेगा। इसको कैबिनेट में रखने व संसद से पास करवाने के बाद लागू करने की घोषणा की जाएगी। यह सारा काम होते-होते 2028 का वर्ष पूरा होने के निकट होगा। जाहिर है कि तब तक 2029 का लोकसभा चुनाव निकट आने वाला होगा। उस चुनाव में राजनीतिक लाभ उठाने की नीयत से इस वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने का लाभ उठाया जाएगा। यह सब तो मोदी का ख्याली पुलाव है। कोई नहंी जानता कि 14 नवम्बर यानी बिहार चुनाव परिणामों के बाद देश की राजनीतिक स्थिति क्या होगी? नीतीश कुमार कहां होंगे और मोदी कहां? बेशक इस बात की कोई गारंटी नहीं कि 2029 के लोकसभा चुनाव तक मोदी गद्दी पर कायम रह भी सकें या नहीं, फिर भी उन्होंने कौड़ी तो दूर की ही चली है। मीडिया पर अपनी मजबूत पकड़ के चलते एक बार तो इन्होंने सरकारी कर्मचारियों व पेंशनरों के बीच टुकड़ा तो फेंक ही दिया है। ताज्जुब: हरियाणा का सीएम सैनी बिहारी है।