ईएसआईसी मुख्यालय में चला मंत्री का टोरा हरामखोरों में मची भगदड़, वीआरएस के दिए नोटिस

ईएसआईसी मुख्यालय में चला मंत्री का टोरा हरामखोरों में मची भगदड़, वीआरएस के दिए नोटिस
October 14 05:32 2024

नई दिल्ली (मज़दुर मोर्चा) ईएसआई कॉर्पोरेशन मुख्यालय में तैनात नालायक एवं निकृष्ट अधिकारियों को लेकर ‘मज़दूर मोर्चा’ काफी समय से आवाज़ बुलंद करता आ रहा है। लगता है कि मौजूदा केन्द्रीय श्रममंत्री मनसुख मांडविया को इन अफसरों की नालायकी व हरामखोरी समझ में आ गई है। मंत्रीजी ने ज्यों ही इन हरामखोरों पर काम का दबाव डालने की बात कही तो करीब 50 उच्चाधिकारियों ने स्वैच्क्षिक सेवानिवृत्ति का नोटिस दे दिया है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार मंत्रीजी ने बीते दिनों यह निर्णय लिया था कि वे सप्ताह में तीन दिन (शुक्र, शनी व रविवार) को कॉर्पोरेशन मुख्यालय में आकर बैठा करेंगे। इसके लिए न केवल उनका कमरा चेयरमैन के नाम से सुसज्जित कर दिया गया है बल्कि वे उसमें बैठने भी लगे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार शनिवार को मुख्यालय में कार्यरत केवल उच्चाधिकारी ही दफ्तर में आया करेंगे बाकी छोटा स्टाफ छुट्टी मनाएगा। रविवार के दिन ये तमाम उच्चाधिकारी कॉर्पोरेशन के विभिन्न अस्पतालों व डिस्पेंसरी आदि में जाकर उनकी स्थिति का अवलोकन करके मंत्रीजी को अपनी रिपोर्ट दिया करेंगे।

अब दिक्कत की बात यह है कि जिन निकम्मे-नालायक अधिकारियों को तिनका तोडऩे तक में ज़ोर पड़ता था, महीनों-महीनों फाइल को दबाए रखते थे, देश भर के अस्पतालों व संस्थानों से आने वाली मेल को पढ़ते तक नहीं थे, अपने दफ्तर में लगे डैशबोर्ड पर, अस्पतालों से आने वाले आंकड़े तक पढऩे की जहमत नहीं उठाते थे, अब मंत्रीजी उनसे हर दिन का हिसाब मांगने लगे तो वे नौकरी छोड़ कर भागेंगे नहीं तो क्या करेंगे? नौकरी के इस आखिरी पड़ाव में वे किसी के प्रति जवाबदेह होने के बजाय घर में पडऩा बेहतर समझते हैं।

इन हालात में मंत्रीजी को चाहिए कि तीन महीने का नोटिस देने वालों को तुरन्त ही नौकरी से मुक्त करके कॉर्पोरेशन का करोड़ों रुपये बचा लें। समझा जा सकता है कि जिन्होंने पहले कभी काम नहीं किया वे नोटिस देने के बाद भला क्या काम करेंगे? ऐसे में उनसे शीघ्रातिशीघ्र छुटकारा लेने में ही भलाई है। इस संदर्भ में डॉ. एम श्रीनिवास द्वारा बतौर डीन ईएसआई मेडिकल कॉलेज सनत नगर हैदराबाद के उदाहरण को देखा जा सकता है। वहां के छोटे से बड़े बाबूओं ने हड़ताल कर दी थी तो डीन ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था और अपनी कर्मठता से संस्थान को उनके बगैर ही बेहतर ढंग से चला कर दिखा दिया था। परिणामस्वरूप जल्द ही हड़ताली बाबू घुटनों पर आ गए थे और माफियां मांग कर काम पर लौटे थे।

हरामखोरों के अगुआ समझे जाने वाले इंश्योरेंस कमिश्नर अक्षय काला को हड़काया
किसी जमाने में $फरीदाबाद स्थित ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज में डायरेक्टर रह चुके अक्षय काला पदोन्नतियां पाते हुए मुख्यालय में बतौर इश्योरेंस कमिश्नर बन बैठे। संदर्भवश फरीदाबाद में अपनी तैनाती के दौरान उन्होंने मुख्यालय में बैठे अपने जैसे हरामखोरों से मिलकर इस मेडिकल कॉलेज को कभी भी न चलने देने का भरसक प्रयास किया था। वह तो भला हो उस डीजी दीपक कुमार का जिन्होंने मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. असीम दास की बात मानकर, सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगा कर किसी तरह वर्ष 2015 में यह कॉलेज चालू करवा दिया।

हरामखोरी के आदी इस काला की फितरत को पहचानने में मंत्री जी ने कोई देर नहीं लगाई। हुआ यूं कि कॉर्पोरेशन द्वारा विभिन्न संस्थानों एवं प्रोजेक्टों पर चल रहे कार्यों की समीक्षा करते हुए यह पाया कि जो काम छ: माह से लेकर एक वर्ष तक में पूरा हो जाने चाहिए थे, वे कई वर्षों से अधर में लटके हुए हैं। इसका सबसे बड़ा ज्वलंत उदाहरण मुंबई का मेडिकल कॉलेज अस्पताल है जो कई वर्षों से अपने जीर्णोद्धार की बाट जोह रहा है। इन सभी मसलों पर जब मंत्री जी ने काला से पूछताछ की तो उनके जवाब सुनकर मंत्रीजी भड़क उठे। मामला कहां तक पहुंचा इसकी पूरी जानकारी तो अभी नहीं उपलब्ध हो पाई है परन्तु इन हालात में ऐसे हरामखोर का मंत्री की छाया में टिके रह पाना मुमकिन नज़र नहीं आता।

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Mazdoor Morcha
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