विवाह आदि कार्यक्रमों में मटर-पनीर की सब्जी बहुत आम है…लेकिन मटर-पनीर की सब्जी में मटर और पनीर के बीच आपसी तालमेल हो, यह जरूरी नहीं। बहुत बार मटर, पनीर में होते हुए भी पनीर से खफ़ा-खफ़ा सा जुदा-जुदा सा रहता है.. दो तीन तरह की बेमेल सब्जी के गठबंधन से बनीं सब्जियां, लजीज बनें. देखने में एकसार लगें. एक के जिस्म की शिनाख्त दूसरे के जिस्म से हो..तो इसके लिए जरूरी है कि सब्जी, अच्छी शोहबत में पकायी जाये. मिलन की कुछ शर्तों को निभाया जाये. वक्त के नजाकत को समझा जाये. हर सब्जी को उसकी औकात के हिसाब से ही मिलाया, तपाया, दबाया और घुमाया जाये. यह नहीं कि कढ़ाई में मटर पनीर झोंक…और लगे कलछुल पटकने.
दरअसल होता यूं है कि जब तक ऐसी सब्जी कड़ाही या डोंगे में होती हैं तो देखने और सुगंध लेने वालों को गुमराह कर जातीं हैं..लेकिन जब वही सब्जी कलछुल के गिरफ्त से छूटकर थाली में उतरती है तो मटर, पनीर का हाथ झटक थाली के तटबंधों पर लग जाता है.. उधर पनीर ठगे हुए दुल्हे की तरह जयमाला की कुर्सी पर बैठा पाया जाता है. और हाँ! एक बचा बिना जनाधार का शोरबा! वो बेचारा पूरे थाली में दौड़-दौड़कर फैल-फैलकर पनीर और मटर के बीच एक अंडर करंट पैदा करने की कोशिश और गुजारिश करता है. – रिवेश प्रताप सिंह