फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) प्रति वर्ष दो करोड़ नौकरियां देने का जुमला फेंक कर सत्ता में आये नरेन्द्र मोदी ने नौकरियां पैदा करने की बजाय पकौड़े तलने की सलाह दे डाली। यानी इनका मतलब सा$फ है कि नौकरियां अथवा रोजगार देना सरकार का काम नहीं है। लेकिन जो सेवाएं देने के बदले उनकी सरकार जनता से नियमित वसूली कर रही है, उन्हें न देकर सरकार उनके साथ एक और बड़ी धोखाधड़ी कर रही है। यह धोखेबाज़ी ठीक वैसी ही है जैसे कि एक $फल विक्रेता केलों का भाव 60 रुपये दर्जन बता कर रकम लेने के बाद एक दर्जन की बजाय मात्र आधा दर्जन केले ही दे रहा हो। ठीक ऐसा ही धोखा सरकार द्वारा अपनी जनता को दिया जा रहा है।
ईएसआई कॉर्पोरेशन देश भर में करीब-करीब चार करोड़ मज़दूरों से उनके वेतन का चार प्रतिशत नियमित वसूल करती है। इसके बदले उसे अपने इन अंशदाताओं को नियमित चिकित्सा व अन्य सुविधायें देनी होती हंै। इसके लिये उसे आवश्यकतानुसार डिस्पेंसरियों, अस्पतालों तथा ब्रांच दफ्तरों को स्थापित करना होता है। जाहिर है इन सब कामों के लिये कॉर्पोरेशन को भवन निर्माण के अलावा सेवाएं देने के लिये विभिन्न प्रकार के स्टाफ की भर्ती करनी होती है। दुर्भाग्य की बात है कि कॉर्पोरेशन अपना यह दायित्व ईमानदारी से न निभाकर अपने अंशदाताओं के साथ घोर अन्याय एवं धोखाधड़ी कर रहा है।
संदर्भवश सुधी पाठक समझ लें कि 10,000 अंशदाताओं के लिये बनी एक डिस्पेंसरी में कुल पांच डॉक्टर और 25 पैरा मेडिकल स्टा$फ होना चाहिए। बीते कुछ वर्ष पूर्व जब अंशदाताओं की कुल संख्या मात्र डेढ़ करोड़ थी तो डिस्पेंसरियों की संख्या देश भर में 1500 थी। दुख की बात यह है कि अंशदाताओं की संख्या चार करोड़ हो जाने के बावजूद भी इनकी संख्या में कोई वृद्धि नहीं की गई। जबकि इन डिस्पेंसरियों की संख्या चार हजार हो जानी चाहिए थी। इस आधार पर इनमें 16 हजार अतिरिक्त डॉक्टरों के पद होने चाहिए, उसके साथ 80 हजार नर्सिंग एंड पैरामेडिकल स्टाफ की तैनाती होनी चाहिए। जाहिर है कि यह वृद्धि न करके कॉर्पोरेशन अपने अंशदाताओं को पर्याप्त सेवा न देकर उनके अधिकारों पर बड़ा डाका मार रहा है।
कॉर्पोरेशन ने वसूली के लिये अंशदाताओं की संख्या तो दोगुणे से भी अधिक बढ़ा कर अपनी खजाने में भरपूर बढ़ोतरी कर ली, लेकिन उन्हें सेवाएं देने के लिये किसी प्रकार की कोई बढ़ोतरी नहीं की। ऐसे में स्वीकृत पद तो खाली हैं सो हैं, नये पद स्वीकृत न करके भी कॉर्पोरेशन अपने अंशदाताओं के साथ उस फल-विक्रेता की तरह ही धोखाधड़ी कर रहा है जो पूरी $कीमत लेकर आधा दर्जन केले ही दे रहा है। डिस्पेंसरियों के अतिरिक्त ईएसआई अस्पतालों में डॉक्टरों के नौ हजार पद स्वीकृत हैं जबकि कम से कम 15 हजार डॉक्टर चाहिए, इसके विपरीत केवल छह हजार डॉक्टर ही तैनात हैं। इसी अनुपात में पैरा मेडिकल और नर्सिंग स्टाफ की संख्या में भी बढ़ोतरी होनी चाहिए। अंशदाताओं की सेवा के लिये केवल डिस्पेंसरियां व अस्पताल ही नहीं बल्कि प्रशासनिक कार्य चलाने के लिये क्षेत्रीय निदेशालयों से लेकर ब्रांच कार्यालयों तक की आवश्यकता होती है। ये कार्यालय अंशदाताओं को विभिन्न प्रकार की सेवाएं देने के लिये आवश्यक समझे गये थे। इनमें स्वीकृत पदों की कुल संख्या 20,494 रखी गई थी। अंशदाताओं की संख्या बढऩे के बावजूद इनकी संख्या में वांछित बढ़ोतरी करना तो दूर, इनमें से भी 9246 खाली पड़े हैं। जाहिर है कि जब सेवाएं देने के लिये कर्मचारी ही नहीं होंगे तो अंशदाताओं को पर्याप्त सेवाएं मिल पाना असम्भव है।