एक और मजदूर की मौत उसके लहू से लिखा गया एक और समझौता 29 वर्षीय विकास पुत्र रागीलाल का जन्म गांव परसहर जि़ला संत कबीरनगर यूपी में हुआ था। वे सेक्टर 24 स्थित गाडिय़ों के चेसिस बनाने वाली कंपनी बेल्मैक्स प्राइवेट लिमिटेड मालिक का नाम दीपचंद भाटिया प्लाट नँबर 125 सेक्टर 24 फऱीदाबाद में काम करते थे। 27 मई 2025 को दिन में 1:30 बजे उन्होंने क्रेन द्वारा लिफ्ट करने के लिए माल लोड किया। क्रेन ने जैसे ही स्टील की भारी-भरकम प्लेटों को लिफ्ट किया उसकी चेन टूट गई। लोहे की प्लेटें विकास के सर पर पड़ीं, उनकी चीख़ निकली खून की तेज़ धार बही और उनके प्राण निकल गए। कंपनी के कर्मचारी उन्हें लेकर फोर्टिस एस्कॉट्र्स अस्पताल पहुंचे और तब ही क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा के साथी वहां पहुंच गए। डॉक्टरों ने उन्हें ‘पहुंचने पर ही मृत घोषित कर दिया। खिलाड़ी जैसे दिखने वाले बांके नौजवान विकास की डेड बॉडी बीके अस्पताल की मोर्चरी पहुंच गई।
एक हेलमेट भी अगर विकास के सर पर होता तो उनकी जान बच जाती। 300 मज़दूरों वाली इस कंपनी में कोई यूनियन नहीं ह। सुरक्षा विभागों को तो अब बड़ी-बड़ी कंपनियों में ही नहीं बल्कि सेक्टर 12 स्थित श्रम कार्यालय के ‘औद्योगिक सुरक्षा विभाग के दरवाज़े पर ही मोटा ताला लटक रहा है! आखिऱ ‘व्यवसाय की सुगमता का दौर है! विकास के पिता रागीलाल भी मज़दूर है। लखानी कंपनी में काम करते थे कि इसी महीने उनकी पत्नी की मौत हो गई। सदमे से टूट चुके रागीलाल अपने गांव लौट गए। विकास की पत्नी नेहा मात्र 27 बरस की हैं और उनका बेटा कृष्णा मात्र 7 महीने का है। विकास की मौत के बाद शाम को मुजेसर पुलिस स्टेशन में इस एक और संस्थागत क़त्ल का सबसे तक़लीफदेह और वीभत्स अध्याय शुरू हुआ। फैक्ट्री मालिक पुलिस से संपर्क साध ही चुका था। मातम में डूबे विकास के भाईयों को सांत्वना देते हुए दारोगा जी ने जो कहा उसे गौर और गंभीरता से पढ़ा जाना चाहिए:-
”क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा और इंक़लाबी मज़दूर केंद्र के कार्यकर्ताओं की ओर इशारा करते हुए, देखो भाई इन नेताओं के चक्कर में तो तुम पड़ो मत नहीं तो कुछ भी नहीं मिलेगा। डेड बॉडी को घर तक पहुंचाने को मालिक बोल रहा है। बड़ी मुश्किल से लाख-डेढ़ लाख देने को राजी हुआ है। जो जाने वाला था वो तो चला गया। वो तो वापस आने से रहा। परमात्मा को यही मंजूर था। अरे पिछले साल इसी की फैक्ट्री में बंदा मारा था तुम उससे पूछ लो क्या मिला था। (उसे दरअसल अंतिम संस्कार के लिए 15000/ और मुआवज़ा 20000/ मिला था)। 27 मइ की शाम तक मरहूम विकास के भाई दोनों मज़दूर संगठनों के कार्यकर्ताओं की बात मान रहे थे। इसलिए उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया और मालिक के अधिकारीयों उसके वकील तथा पुलिस की मौजूदगी में कम से कम 20 लाख रुपये मुआवज़ा नक़द (आश्वासन नहीं) तथा उसके बच्चे की पूरी शिक्षा की व्यवस्था करने की मांग रखी गई जिसे ठुकराते हुए पुलिस ने कहा ठीक है तुम जो करना है करो। लिखित शिकायत उसी वक़्त दर्ज करा दी गई और कहा कि एफआईआर दर्ज कर मालिक को गिरफ्तार किया जाए तथा क़ानूनी कार्यवाही की जाए।
27 मई की रात कुछ अज्ञात और अदृश्य घटनाक्रम हुआ। विकास के भाईयों के बोल वचन बदल गए। ‘हमारा समझौता हो गया है जी। मालिक 4.5 लाख रुपये मुआवज़ा देगा और डेडबॉडी को घर पहुंचाएगा। दोनों संगठनों के कार्यकर्ताओं ने उन्हें उसके बाद भी चेताया ‘पैसे लिए बगैर अगर तुम डेडबॉडी को बीके हॉस्पिटल से बाहर ले गए तो वे भी नहीं मिलेंगे! इसी सप्ताह 23 मई को दो महिला मज़दूर लखीसराय बिहार निवासी 23 वर्षीय नमिता देवी तथा माल्दा प. बंगाल की रहने वालीं 35 वर्षीय नन्दनिता देवी बरसों से ओल्ड फऱीदाबाद रलवे स्टेशन पर चल रहे निर्माण कार्य में मिटटी ढहने से जिंदा दफऩ हो गई थीं। काजल देवी (35) तथा गोविन्द कुमार (40) की जान बच गई लेकिन गंभीर रूप से ज़ख्मी हुए। इस कंस्ट्रक्शन साइट पर सुरक्षा इन्तेज़ामों का ये आलम है कि 4 मज़दूर दिन में 12:30 बजे मिट्टी के ढूहे में दब गए लेकिन कंपनी को पता ही नहीं चला। काफ़ी देर बाद जब दूसरे मज़दूर वहां आए और उन्होंने देखा कि यहां तो बहुत बड़ा गड्ढा था मिटटी से लेवल कैसे हो गया! वे चीखे चिल्लाए तब जेसीबी मशीन ने दो लाशों और दो लगभग मृत हो चुके मज़दूरों को बाहर निकाला।
पुलिस का बयान तैयार रहता है ”दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा! आजकल चूंकि अख़बारों ने भी आए दिन होने वालीं इन संस्थागत हत्याओं को कवर करना बंद कर दिया है इसलिए पता नहीं चला कि कोई गिरफ़्तारी हुई भी है या नहीं। वैसे भी मालिक तो ‘बड़ा आदमी होता है उसे कैसे गिरफ्तार किया जा सकता है। किसी सुपरवाइजर या गार्ड को गिरफ्तार कर फाइल बंद कर दी जाती है।