मारुति के बरख़ास्त मज़दूर मानेसर में आर-पार को तैयार “रोज़ी-रोटी के साथ ही, ये इंसाफ़ और इज्ज़त की लड़ाई है; ख़ाली हाथ वापस नहीं जाएँगे”

मारुति के बरख़ास्त मज़दूर मानेसर में आर-पार को तैयार “रोज़ी-रोटी के साथ ही, ये इंसाफ़ और इज्ज़त की लड़ाई है; ख़ाली हाथ वापस नहीं जाएँगे”
September 30 23:59 2024

क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा
“पूरे 13 साल हो लिए जी, हमें लड़ते हुए. सड़कों पर भी आंदोलन कर लिए, हरियाणा सरकार से फ़रियाद कर ली. अदालत में केस लड़ लिए. अदालत भी कह चुकी, हम बेक़सूर हैं. यही बात, एसआईटी अपनी रिपोर्ट में लिखकर दे चुकी. पीयूडीआर की विस्तृत जांच रिपोर्ट से भी साबित हो गया. अंजली देशपांडे तथा नंदिता हक्सर की प्रख्यात पुस्तक, ‘जापानी मैनेजमेंट- इंडियन रेजिस्टेंस’ से सारी दुनिया, मारुति-सुजूकी प्रबंधन की असलियत जान गई. उसके बाद भी हम सड़क पर हैं. अब तो बच्चे भी बड़े हो लिए. वे पूछते हैं; ‘पापा, आप काम कहाँ करते हो? आपने क्या किया है, जो आपकी नोकरी चली गई? बच्चों की फ़ीस नहीं भर पा रहे. रोटी के लाले हैं. अब तो अति हो ली. अब और सहन नहीं होता. इंसाफ मिलने तक, अब हम, यहाँ से नहीं हटने वाले, चाहे सरकार जेल में डाल दे, चाहे गोली मार दे.”

25 सितंबर को, मानेसर तहसील की सामने वाली सड़क के फुट पाथ पर बैठे, आंदोलनकारी मज़दूरों की 13 साल की जमा पीड़ा, बाहर फूट पड़ रही थी. उनके चेहरों और आखों की चमक से ज़ाहिर हो रहा था, बोल, सीधे उनके दिलों की गहराई से निकल रहे हैं. शीशम के दरख्तों की छांव और ऊपर आकाश में घुमड़ते बादलों के नीचे भी, आक्रोश की आंच महसूस की जा सकती थी. सड़क के डिवाईडर के साथ पुलिस की जिप्सियां खड़ी थीं. सीने में धधकते आक्रोश और स्वाभिमान से सराबोर, ये बोल, जब मज़दूरों की जुबान से निकल रहे थे, तब वहां तैनात पुलिस अधिकारियों के चेहरे नीचे ज़मीन की और झुके थे. उनके ही तो भाई-बेटे हैं, ये प्रौढ़ होते नौजवान, जिनकी बढ़ी दाढिय़ों के आधे बाल सफ़ेद हो चुके, जो कभी गर्व से उस कंपनी में नोकरी पर लगे थे, जिसकी बनी कारें, इस देश की पहचान बन चुकी हैं.

फुटपाथ की नुकीली ग्रिल के पीछे, पेड़ों की घनी छाया में, 7 मज़दूर दोपहर का खाना तैयार कर रहे थे; “लड़ाई लंबी है, कॉमरेड, बाहर के खाने से गुजारा नहीं होगा. बहुत हो गईं अदालत की तारीखें. बहुत देख लिए हरियाणा के मुख्यमंत्रियों और निकम्मे प्रशासन के आश्वासन. अब मामला आर-पार का है. कंपनी और सरकार हमें क़ातिल समझती है, तो साफ़ बताए, जेल में डाले. हम ये अपमान और नहीं सह सकते. आपको भी लंगर हमारे साथ ही छकना है!” मज़दूरों के इरादों की परख उनके बोलों से ही नहीं, वहां के माहौल के चप्पे-चप्पे हो रही थी. गांव के गऱीब किसानों की ये पीढ़ी, गांव की संस्कृति की पहचान हुक्के को भी साथ लाई है.

“20-25 साल पहले, जब हम मारुति में लगे थे, तब हर 45 सेकंड में एक गाड़ी बनती थी. हमें रिलीवर भी नहीं मिलता था. कन्वेयर बेल्ट लगातार घूमती रहती थी. सामने रखी बोतल से पानी पीने के लिए रुकना भी संभव नहीं था. पेशाब रोके रखने से हम बीमार पड़ जाते थे. एक वर्कर को एक से अधिक स्टेशन संभालने पड़ते थे. एक दिन की भी छुट्टी लेने पर, इंसेंटिव के नाम पर मिलने वाला, कुल 3,500/ रु मासिक सैलरी का बड़ा हिस्सा कट जाता था. हममें से कुछ ही मज़दूर पक्के थे. ज्यादातर तो ठेके पर ही थे, जिन्हें कभी भी निकाला जा सकता था. आज भी कंपनी में 1,800 मज़दूर पक्के हैं और 9,000 से ज्यादा, अप्रेंटिस, ट्रेनी और ठेका मज़दूर हैं. ये है, जापानी मैनेजमेंट के शोषण की हकीक़त!! हमने यूनियन बनाने और ठेका प्रथा ख़त्म करने की बात की, तो क्या ग़लत किया?”

ये बातें, धरना स्थल पर मौजूद यूनियन के किसी नेता या कार्यकर्ता की नहीं, बल्कि वहां मौजूद हर मज़दूर बातचीत में शामिल था. मालिकों का मुनाफ़ा, मज़दूरों की मेहनत की चोरी से ही आता है. उसका खून ज्यादा से ज्यादा निचोडऩे से बढ़ता है. उसी से पूंजी के पहाड़ खड़े होते हैं. यही वज़ह है कि मज़दूरों के संगठित होने की भनक मिलते ही, मालिकों की आँखों में खून उतर आता है, उसकी धमनियों में बहता लहू जमने लगता है.

मारुति-सुजूकी, बल्कि अब तो सुजूकी-मारुति कहा जाना चाहिए, के 13 साल से ज़ारी, मज़दूर आंदोलन और हज़ारों मज़दूरों द्वारा झेली गई बे-इन्तहा मुसीबतों, जेल की सज़ाओं और उस दौरान मौतों, हज़ारों परिवारों को उजडऩे की इस दर्दनाक दास्तां की जड़; मजदूरों के संगठित होने की इच्छा और उसे कुचल डालने की मैनेजमेंट की इच्छा ही है, जिसके सामने हरियाणा और भारत की सरकारों ने बेशर्म समर्पण किया हुआ है.

मज़दूरों को सब याद है. बात शुरू होते ही फिल्म के फ्लैशबैक की तरह कहानी पीछे चलनी शुरू हो जाती है. 8 सितंबर को मुख्यमंत्री नायब सैनी ने हमें न्याय दिलाने का आश्वासन दिया. हरियाणा राज्य श्रम आयुक्त ने कंपनी प्रबंधन को बुलाया और मज़दूरों से न्यायपूर्ण समझौता करने का हुक्म सुनाया. प्रबंधन ने मुंडी भी हिलाई. उससे पहले, इसी साल, पहले मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने भी मज़दूरों, मालिकों और श्रमायुक्त को अपने दफ़्तर बुलाकर कहा था; “भाई, बड़े-बड़े झगड़े हो जाते हैं, क़त्ल हो जाते हैं, उसके बाद भी समझौते ही होते हैं. आप समझौता क्यों नहीं कर लेते. बहुत मुसीबतें झेल चुके, इन मज़दूरों को काम पर क्यों नहीं ले लेते?”

कंपनी मैनेजमेंट ने उस वक़्त भी मुंडी हिलाई थी. उससे पहले, कांग्रेसी मुख्यमंत्री हुड्डा के ज़माने में भी बिलकुल यही हुआ था. मैनेजमेंट ने, लेकिन, कंपनी पहुंचकर, इन मुख्यमंत्रियों की बातों को दो कौड़ी की इज्ज़त नहीं दी, और इन मुख्यमंत्रियों ने भी अपनी इस बेईज्ज़ती का बिलकुल बुरा नहीं माना!! पूंजी की चाकरी इसे ही कहा जाता है. संघर्ष, मालिक और मज़दूरों के बीच हो, तो सरकारों की असल मंशा नहीं होती, जो उनकी ज़ुबान कहती है. ‘मज़दूरों की, इतने बड़े मालिकों की आंख में आंख डालकर बात करने की जुर्रत कैसे हुई, जापानी और इंडियन कॉर्पोरेट, मज़दूरों को यह सबक़ सिखा रहे हैं, और उनकी ताबेदार सरकारें अपना ‘फज़ऱ् निभा रही हैं. मज़दूरों की जुर्रत को मिटाने की क़वायद है, सुजूकी-मारुति मैनेजमेंट का मज़दूरों पर यह निर्मम हमला.

मुख्यमंत्री नायब सैनी के 8 सितंबर के आदेश के बाद भी, जब कंपनी के कान पर जूं नहीं रेंगी, तब 18 सितंबर को बरखास्त मज़दूरों ने कंपनी के गेट पर धरना देने का फ़ैसला किया. प्रबंधन कोर्ट चला गया. कोर्ट ने आदेश दिया कि मज़दूर, कंपनी गेट से 500 मीटर की दुरी पर धरने बैठ सकते हैं, लेकिन धरना शांतिपूर्ण रहना चाहिए. मालिकों के इशारे पर, मानेसर पुलिस ने, अपने तीन मुख्यमंत्रियों के आदेशों तथा अदालत के आदेश की परवाह ना करते हुए, मज़दूरों को कंपनी गेट से लगभग 6 किमी दूर, मानेसर चौक पर, तहसील कार्यालय पर ही रोक दिया. उसी दिन से ये मज़दूर उसी जगह धरने पर बैठे हुए हैं.

18 जुलाई, 2012 को मारुति के मानेसर प्लांट में हुई बहुत दर्दनाक मारामारी, आगजनी और उसमें एक प्लांट मेनेजर, अवनीश कुमार देव की खौफऩाक मौत की असलियत तो, उस घटना के बाद गठित एसआईटी की रिपोर्ट तथा पीयूडीआर की प्रतिष्ठित पत्रकारों, शशि सक्सेना और शाहना भट्टाचार्य द्वारा, अदालत के फैसले की महत्वपूर्ण समीक्षा पर आधारित विस्तृत रिपोर्ट, “A Pre-Decided Case: A Critique of the Maruti Judgement if 2017” से ही सामने आ चुकी थी. प्रतिष्ठित लेखकों, अंजली देशपांडे और नंदिता हक्सर की शोधपूर्ण पुस्तक ‘जापानीज मैनेजमेंट इंडियन रेजिस्टेंस ने उस पूरे षडयंत्र का पर्दाफ़ाश ही कर के रख दिया है.

कृपया देखें, अक्टूबर 23 के प्रथम अंक में ‘मज़दूर मोर्चा में छपा लेख, ‘मारुति मज़दूरों के साथ अदालत में घोर अन्याय हुआ है. ‘देशी-विदेशी पूंजी, हरियाणा और केंद्र सरकार गठजोड़, पुलिस, प्रशासन तथा अपने आदेशों की अवमानना को नजऱंदाज़ करने वाली अदालतें, सब मिलकर, जब मज़दूरों के खि़लाफ़ हो जाएं, तो मज़दूर, आम जन-मानस के समर्थन की ओर देखते हैं. हम सब का यह कर्तव्य बन जाता है कि सच्चाई जानें और अन्याय के विरुद्ध और न्याय के समर्थन में अपनी आवाज़ बुलंद करें. जन-शक्ति से शक्तिशाली कुछ नहीं होता. 18 जुलाई की उस दर्दनाक वारदात की असलियत को जानना हम सब का फज़ऱ् है, जिसने 2,400 परिवार तबाह कर डाले हैं. कंपनी में प्रेशर कुकर जैसे दमघोटू वातावरण की तफ्शील हम ऊपर पढ़ ही चुके हैं. काम के माहौल को सहनीय बनाने के लिए, मज़दूरों के प्रतिरोध आंदोलन की शुरुआत जून 2011 में हुई. ठेका मज़दूरों को भी इंसान समझा जाए, ‘ट्रेड यूनियन एक्ट, 1926 से हांसिल यूनियन बनाने के मज़दूरों के अधिकार का कंपनी सम्मान करे; नियमित मज़दूरों ने ये मांगें उठाई. प्रबंधन इस आवाज़ को अनसुना करता रहा, सिफऱ् इतना ही नहीं, बल्कि बाद में उजागर हुई असलियत से पता चला कि प्रबंधन, मज़दूरों की विरोध करने की ‘जुर्रत हमेशा के लिए मिटा डालने का निश्चय कर चुका था. 18 जुलाई 2012 की दर्दनाक वारदात, उसी षडयंत्र का परिणाम था.

कंपनी मज़दूर जियालाल को सुपरवायजऱ ने जातिसूचक गाली दी, जिसे वे सहन नहीं कर पाए. प्रबंधन ने, उन्हें ससपेंड कर दिया लेकिन सुपरवायजऱ पर कोई कार्यवाही नहीं की. यूनियन ने आवाज़ उठाई तो प्रबंधन ने अपने घिनौने षडयंत्र का कार्यान्वयन कर डाला. 150 बाउंसर कर्मचारियों की वर्दी में कंपनी में दाखिल हुए. सीसीटीवी कैमरे या तो बंद कर दिए गए, या उन्हें बाद में नष्ट कर दिया गया क्योंकि अदालत के हुक्म के बावजूद भी, प्रबंधन सीसीटीवी फुटेज़ पेश नहीं कर पाया. किस ने आग लगाई, अदालत में साबित नहीं हुआ.

जिस प्रबंधक, अवनीश कुमार देव की आग में जल कर मौत हुई, वे मज़दूरों की ज़ायज़ मांगों का समर्थन करते थे. यूनियन बनाने में मदद के लिए वे मज़दूरों के साथ चंडीगढ़ भी गए थे, जिससे उच्च प्रबंधन उनसे बहुत खफ़़ा था. जिससे तंग आकर उन्होंने अपने पद से स्तीफा दे दिया था, लेकिन ‘दूसरे प्रबंधक की नियुक्ति तक रुक जाइए यह कहकर उन्हें प्रबंधन ने कार्य-मुक्त नहीं किया था. अवनीश कुमार देव युवा थे. वे आग में जलकर इतनी बुरी तरह राख हुए, कि पहचाने नहीं जा सकते थे, जबकि कोई भी दूसरा व्यक्ति गंभीर रूप से नहीं जला. वे आग में जलकर रख हो गए लेकिन उसी जगह माचिस की डिब्बी सही सलामत रही!!! अवनीश देव को उसी दिन बौंसरों ने बुरी तरह पीटा था, यह तथ्य भी साबित हो गया.

इतना ही नहीं, 18 से 28 नंबर के बयानों में गंभीर तथ्यात्मक उलटफेर है, मज़दूरों के वकील, आर एस चीमा, रेबेका जॉन तथा वृंदा ग्रोवर, ने अदालत में साबित भी कर दिया, लेकिन न्यायाधीश रविन्द्र गोयल पर कोई फर्क नहीं पड़ा. प्लांट में आग मज़दूरों ने लगाई, या अवनीश देव को मज़दूरों ने मारा, यह साबित नहीं हुआ. जज साहब ने एक विचित्र रुख अपनाते हुए, मुक़दमे की इन गंभीर कमजोरियों को ना सिर्फ ‘मामूली

विसंगतियां कऱार दिया, बल्कि न्यायप्रणाली के आधारभूत नियम को ही पलट डाला; “चूँकि मज़दूर, ये साबित नहीं कर पाए कि उन्होंने आग नहीं लगाई और मेनेजर की मौत के लिए वे जि़म्मेदार नहीं थे, इसलिए अभियोजन पक्ष का कहना ठीक है, वे ही आगजनी और क़त्ल के गुनहगार हैं!!” मतलब आरोपों को, आरोपकर्ता सिद्ध नहीं करेगा, बल्कि आरोपी ख़ुद को बेक़सूर साबित करेगा!! अपराध न्याय प्रणाली की आधारभूत नैसर्गिक बुनियाद है; ‘भले 100 क़सूरवार छूट जाएँ, लेकिन किसी बेक़सूर को सज़ा नहीं होनी चाहिए. अभियोजन गवाह न 101, नितिन सारस्वत ने अदालत में कबूल किया कि उन्होंने 89 मज़दूरों की लिस्ट, पुलिस की मौजूदगी में लेबर ठेकेदारों को सौंपी. इनमें कई ठेकेदारों को, चश्मदीद गवाह बनाया गया लेकिन वे अदालत में किसी को भी नहीं पहचान पाए. ये तथ्य क्या साबित करते हैं, पाठक स्वयं तय करे.

फैक्ट्री में आग लगने और मेनेजर की दुर्भाग्यपूर्ण मौत के बाद, कंपनी प्रबंधन, मज़दूरों पर टूट पड़ा. जाँच- पड़ताल किए बगैर, 2,500 मज़दूरों को बरखास्त कर दिया गया, जिनमें 546 स्थाई और बाक़ी ठेका मज़दूर थे. इस बहुत चर्चित मुक़दमे का फैसला 17 मार्च 2017 को आया. गुडग़ांव सेसन जज, रविन्द्रपाल गोयल ने, 13 मज़दूरों; जिया लाल, राम मेहर, सुरेश ढल, संदीप ढिल्लों, सरबजीत सिंह, अजमेर सिंह, योगेश कुमार यादव, पवन कुमार दहिया, प्रदीप गूजर, सोहन कुमार, धनराज भाम्बी, अमरजीत कपूर एवं रामविलास को, अवनीश कुमार देव के क़त्ल का जि़म्मेदार ठहराते हुए, उम्र क़ैद की सजा सुनाई. 4 मज़दूरों को 5-5 साल की सज़ा हुई,

17 को, जितना वक्त जेल में काटा उतनी सजा सुनाई गई. 64 मज़दूर, आज तक गिरफ़्तारी से बचने के लिए फऱार हैं. उम्र क़ैद की सज़ा काट रहे 2 और फऱार मज़दूरों में 2 की मौत हो चुकी है. 117 मज़दूरों को अदालत ने बेक़सूर ठहराते हुए, बा-इज्ज़त रिहा किया. जिन 117 मज़दूरों को अदालत ने बिलकुल बेक़सूर ठहराया, प्रबंधन उन्हें भी काम पर नहीं ले रहा. नवंबर 2022 से ये मज़दूर डीसी, गुडग़ांव कार्यालय पर कई बार प्रदर्शन, धरने कर चुके हैं.

“इन 12 सालों का एक-एक दिन कैसे बीता है, हम ही जानते हैं. मारुति के क्रूर प्रबंधन ने हमें बर्बाद कर दिया लेकिन हमारा हौसला नहीं टूटा और ना टूटेगा. हम अन्याय के खि़लाफ़ आवाज़ बुलंद करते रहेंगे. हमें ख़ुशी है कि गुडग़ांव, मानेसर, धारूहेड़ा ही नहीं, बल्कि पूरे देश के मज़दूरों ने हमारा साथ दिया है. संयुक्त किसान मोर्चा के किसानों ने भी हमारा साथ दिया है. रोज़ी-रोटी के साथ ही, इंसाफ और इज्ज़त की यह लड़ाई अब निर्णायक दौर में पहुँच चुकी है. इन्साफ पसंद हर इंसान से हमारी अपील है, कि न्याय की इस लड़ाई में हमारा साथ दें.”

‘मारुति सुजूकी स्ट्रगल कमेटी तथा ‘मारुति सुजूकी वर्कर्स यूनियन द्वारा, 30 सितंबर 2024 को, 10 बजे से 5 बजे तक, मानेसर तहसील कार्यालय पर आयोजित होने जा रही ‘मज़दूर सभा में सभी लोग भारी तादाद में शामिल होकर हमारा हौसला बढ़ाएंगे और इंसाफ की ये जंग हम ज़रूर जीतेंगे, इस अपील और उम्मीद के साथ, मारुति के इन बहादुर मज़दूरों ने बहुत आत्मीयता के साथ विदा किया.

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Mazdoor Morcha
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