गुडग़ांव (ममो)। वर्तमान में मारुति कार फैक्ट्री में 36000 मजदूर काम करते हैं। इनमें केवल 17 प्रतिशत परमानेंट मजदूर हैं जबकि शेष 83 प्रतिशत गैर परमानेंट मजदूर हैं। यानि के मारुति में करीबन 30000 गैर परमानेंट मजदूर हैं. गैर परमानेंट मजदूरों को 12000 से 30000 रुपये मासिक वेतन दिया जाता है. जबकि परमानेंट मजदूरों को तकरीबन 130000 रुपये मासिक वेतन दिया जाता है. दूसरे शब्दों में यदि यह मान भी लिया जाये कि गैर परमानेंट मजदूरों सभी को 30000 रुपये दिया जाता है तो भी प्रति मजदूर एक लाख रुपया कम मजदूरी दी जाती है। दूसरे शब्दों में गैर परमानेंट मजदूर को सालाना 12 लाख रुपये कम मजदूरी दी जाती है। यह मजदूरी का कम से कम 3600 करोड़ रुपये का डाका मजदूरों को गैर परमानेंट रख कर किया जा रहा है.
जानकारी हो की वर्ष 23-24 में मारुति ने 13210 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया था. इस में से 25 प्रतिशत हिस्सा गैर परमानेंट मजदूरों की मजदूरी की डकैती का है। मारुति सुजुकी के गुरुग्राम-मानेसर कारखानों में काम कर चुके और कर रहे तीन हजार से अधिक अस्थायी श्रमिक जिनमें ठेका, प्रशिक्षु, अपरेंटिस, टीडब्ल्यू, सीडब्ल्यू, एमएसटी आदि शामिल हैं, ने स्थायी नौकरी, समान वेतन, वेतन वृद्धि और अन्य मांगों को लेकर गुरुग्राम में एक जनसभा की। एक महत्वपूर्ण कदम के तहत 5 जनवरी 2025 को गुरुग्राम के कृष्ण चौक के पास एक बड़ी जनसभा आयोजित की गयी थी। यह सभा मारुति सुजुकी अस्थायी मजदूर संघ की स्थापना के अवसर पर आयोजित की गई थी। हरियाणा के विभिन्न क्षेत्रों के अतिरिक्त बिहार, झारखंड, राजस्थान, ओडिशा और अन्य राज्यों से श्रमिक रातभर की यात्रा करके इस सभा में शामिल होने पहुंचे। इस बैठक में श्रमिकों द्वारा अपना मांगपत्र तैयार और हस्ताक्षरित किया गया। श्रमिकों ने 10 जनवरी को गुरुग्राम के डीसी कार्यालय पर बड़ी संख्या में एकत्र होकर श्रम विभाग और कंपनी प्रबंधन के समक्ष अपनी मांगों को प्रस्तुत करने का आह्वान किया। इस सभा में आगे की गतिविधियों के समन्वय के लिए प्रतिनिधि मंडल का भी चुनाव किया गया।
मारुति सुजुकी के अस्थायी कर्मचारियों ने मांग की तेज स्थायी नौकरी और समान वेतन की मांग को लेकर हजारों मज़दूर श्रम विभाग पहुंचे। देश भर से आए अस्थायी श्रमिकों ने कंपनी में काम करने के अपने अनुभव और उसके बाद बेरोजगारी के संघर्ष की अपनी-अपनी कहानियां साझा कीं। गंगानगर के एक श्रमिक ने बताया कि कैसे वे तीन साल से अधिक समय तक आकस्मिक श्रमिक के रूप में काम करने के बाद कंपनी द्वारा आयोजित प्रवेश परीक्षा में असफल होने पर कंपनी के गेट पर ही टूटकर रो पड़े थे। बहादुरगढ़ जिले के सुमित ने कहा कि सात महीने तक मारुति में अस्थायी श्रमिक के रूप में मिले रुपये 30,000 वेतन ने उनके परिवार में झूठी उम्मीदें पैदा कर दीं, जो बाद में कंपनी-दर-कंपनी चकनाचूर होती रहीं और उन्हें कहीं काम करने योग्य नहीं छोड़ा।
उत्तर प्रदेश के उन्नाव के एक श्रमिक ने बताया कि यदि अस्थायी श्रमिक एक तिमाही में दो से अधिक छुट्टियां लेते हैं तो उनके पैसे काटे जाते हैं, जबकि नियमानुसार वे सात छुट्टियों के हकदार होते हैं। मोदी के बनारस में प्रशासन ने पथ विक्रेता अधिनियम की खुलेआम अवहेलना कर ठेले वालों के पेट पर लात मार बरपाया कहर ! एक अन्य श्रमिक ने बताया कि हरियाणा सरकार की नौकरी के लिए उनकी उम्मीद इसलिए टूट गई, क्योंकि मारुति द्वारा दिया गया अनुभव पत्र किसी विशेष कौशल का उल्लेख नहीं करता और वास्तव में एक बेकार कागज का टुकड़ा मात्र है। बिहार के विवेक ने उनकी जिंदगी की तुलना एक फुटबॉल से की, जिसे हर छह से सात महीने में कंपनियां लात मारकर बाहर फेंक देती हैं। उन्होंने मारुति में टीडब्लयू-1 और टीडब्लयू-2 के रूप में काम करने के अलावा हीरो मोटोकॉर्प और होंडा में भी काम किया था। इन कहानियों के साथ श्रमिकों के मन में अन्याय के प्रति गुस्से का एक जबरदस्त ज्वार उमड़ पड़ा कि कैसे उन्होंने अपने जीवन के सबसे अच्छे साल कंपनी को दे दिए, जिसने बदले में उन्हें भविष्य के लिए कोई आशा नहीं दी।
आजीविका की रक्षा के लिए कुलियों ने चलाया हस्ताक्षर अभियान, संसद के शीतकालीन सत्र में कुलियों की रेलवे में नौकरी पर चर्चा की उठायी मांग वर्तमान में मारुति सुजुकी गुडग़ांव स्थित अपने चार कारखानों में 36,000 श्रमिकों को रोजगार देती है, जिनमें से मात्र 17 प्रतिशत स्थायी हैं और बाकी श्रमिक अस्थायी श्रेणियों, जैसे अस्थायी श्रमिक 1 और 2, आकस्मिक श्रमिक, प्रशिक्षु, ठेका श्रमिक और छात्र प्रशिक्षुओं में विभाजित हैं। प्लांट का पूरा उत्पादन अस्थायी श्रमिकों पर निर्भर है, जबकि स्थायी श्रमिकों की भूमिका अधिकांशत: पर्यवेक्षी कार्यों तक सीमित है। स्थायी और अस्थायी श्रमिकों के वेतन में बड़ी खाई है, जहां स्थायी कर्मचारियों का औसत वेतन रुपये 1,30,000 है, वहीं अस्थायी श्रमिकों का वेतन रुपये12,000 से रुपये 30,000 के बीच है। अस्थायी श्रमिकों को केवल सात महीने के लिए नियुक्त किया जाता है। एक अन्य बड़ा हिस्सा छात्र प्रशिक्षु कार्यबल का है, जिन्हें प्रशिक्षुता और आईटीआई शिक्षा के नाम पर मुख्य उत्पादन कार्य में लगाया जाता है, लेकिन दो साल बाद उन्हें एक ऐसा प्रमाणपत्र दिया जाता है, जिसका श्रम बाजार में कोई महत्व नहीं होता।