फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) जिला शिक्षा अधिकारी अजीत सिंह के अनुसार जिले के सभी राजकीय विद्यालयों की कक्षाओं में स्मार्ट डिजिटल बोर्ड लगाए जाएंगे। यानी अब प्राथमिक, माध्यमिक, वरिष्ठ माध्यमिक, मॉडल संस्कृति विद्यालयों के छात्र इस स्मार्ट बोर्ड के ज़रिए पढ़ाई करेंगे।
भाजपा सरकार जिस तरह हर क्षेत्र में हवा हवाई विकास के पुल बांध रही है उसी तरह बिना आधारभूत संरचना, मानव संसाधन के सरकारी स्कूलों में डिजिटल शिक्षा देने का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। सुधी पाठक जानते ही होंगे कि जिले के चालीस राजकीय विद्यालयों में स्मार्ट डिजिटल बोर्ड काफी पहले से ही लगे हैं। इन बोर्ड पर पढ़ाई नहीं कराई जाती क्योंकि शिक्षकों को इन्हें इस्तेमाल करने और इनकी डिजिटल सामग्री का शिक्षण में उपयोग करने का ज्ञान उन्हें नहीं है, संभवत: उन्हें प्रशिक्षण नहीं मिला है। ऐसे में इन स्कूलों में डिजिटल स्मार्ट बोर्ड का आधिकारिक इस्तेमाल पढऩे-पढ़ाने के लिए नहीं बल्कि प्रधानमंत्री की मन की बात कार्यक्रम का प्रसारण करने के लिए ही किया जा रहा है। जनता के जहन में पार्टी और अपनी छवि स्थायी करने के लिए डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बेहतर शायद ही कोई जानता हो। काम नहीं काम का ढिंढोरा पीटते रहने के अपने फार्मूले के तहत ही वह अंधभक्त जनता में अपनी छवि बनाए रखने के लिए मन की बात, गोदी इंटरव्यू, इवेंट आदि राजनीतिक स्टंट करते रहते हैं और डबल इंजन सरकारों में सारे महकमे उसका प्रचार प्रसार करने में जुट जाते हैं। जिले के चालीस सरकारी विद्यालय और उनमें लगाए गए स्मार्ट डिजिटल बोर्ड भी मोदी के प्रचारक बन चुके हैं।
रही बात स्मार्ट बोर्ड से पढ़ाई कराने की तो करोड़ों रुपये खर्च कर ये लगा भी दिए गए तो जिस तरह चालीस बोर्ड धूूल खा रहे हैं वही हश्र इन बोड्र्स का भी होने वाला है। कारण कई हैं, पहला तो ये कि किसी भी सरकारी स्कूल में सभी विषयों के शिक्षक ही तैनात नही हैं। पूर्व सीएम खट्टर ने 2022 में खुद स्वीकार किया था कि प्रदेश में सरकारी शिक्षकों के 30 हज़ार पद खाली हैं। शिक्षा के प्रति सरकार कितनी गंभीर है इससे समझा जा सकता है कि उन्होंने इनमें 15 हजार पद गैर जरूरी बता कर खत्म करने की बात कही थी। अगर खट्टर की ही मान ली जाए तो भी बाकी के जो 15 हजार खाली पद भी आज तक पूरे नहीं भरे गए हैं। उन्हें तो छोडि़ए सरकार जिन मॉडल संस्कृति स्कूलों का ढिंढोरा पीट रही है उनमें से अधिकतर में पर्याप्त शिक्षक शेष पेज दो पर नहीं हैं। कहीं गणित तो कहीं विज्ञान, अंग्रेजी, सामाजिक विज्ञान के टीचर नहीं हैं। एक दूसरा पहलू ये भी है कि सरकारी स्कूलों में अधिकतर शिक्षकों को पारंपरिक शैक्षिणक कौशल की ही जानकारी है। कंप्यूटर, ऑपरेटिंग सिस्टम और डिजिटल शैक्षणिक सामग्री के पठन-पाठन की उन्हें ट्रेनिंग ही नहीं मिली हुई है, जिसके बिना उनका पढ़ा पाना लगभग असंभव है। मोटे शब्दों में स्कूलों में स्मार्ट डिजिटल बोर्ड लगा देने भर से ही उससे पढ़ाई कराई जाने लगेगी ऐसा नहीं है। इसके लिए पहले हर स्कूल में प्रत्येक विषय का शिक्षक तैनात किया जाए और उसे अपना विषय डिजिटल तकनीकि से पढ़ाने का पूरा प्रशिक्षण दिया जाए। फिलहाल सरकार की मंशा इतना काम करने की नजर नहीं आ रही वो तो नाखून कटा कर शहीदों में नाम दर्ज कराने वाले मुहावरे की तर्ज पर स्मार्ट बोर्ड टांग कर पूरी शिक्षा व्यवस्था को डिजिटलाइज करने का ढिंढोरा पीटेगी।
जिला शिक्षा अधिकारी के मुताबिक शिक्षक इन स्मार्ट डिजिटल बोर्ड में सीडी लगाकर बच्चों को पढ़ा सकेंगे। सुधी पाठकों को अच्छी तरह से मालूम है कि कंप्यूटर जगत में ऑप्टिकल स्टोरेज डिवाइस यानी कॉम्पैक्ट डिस्क (सीडी) का इस्तेमाल एक दशक पहले ही बंद हो चुका है। यानी यह टेक्नोलॉजी पुरानी और लुप्त प्राय हो चुकी है। अब तो अब सॉलिड स्टेट ड्राइव (एसएसडी) और नॉन वोलेटाइल मेमोरी एक्सप्रेस (एनवीएमई) आधारित अति आधुनिक और तेज स्टोरेज तकनीकि आ चुकी है। यदि सीडी वाले स्मार्ट डिजिटल बोर्ड?लगाए जा रहे हैं तो यह भी बड़ा घोटाला ही होने वाला है क्योंकि पुरानी और समाप्त हो चुकी तकनीकी पर खर्च करके सरकार जनता की गाढ़ी कमाई से अपने चंद संघी व्यापारियों का कबाड़ा खरीद कर उनका घर भरने जा रही है। यदि लग भी गए तो आउटडेटेड होने के कारण कुछ ही अर्से में इन्हें हटा कर नये लगाए जाएंगे, जिसमें एक बार फिर सरकार के संघी साथियों का खजाना भरा जाएगा।
यह बात सरकार और शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों को भी अच्छी तरह मालूम होगी कि सीडी तकनीकि समाप्त हो चुकी है, बावजूद इसके यदि इस तकनीकि वाले बोर्ड सरकारी स्कूलों में लगाए जा रहे हैं तो इसके दो परिणाम होंगे। पहला यह कि पुरानी तकनीकि होने के कारण कुछ ही अर्से में ये नई तकनीकि से मैच नहीं कर पाने के कारण टीवी या मॉनिटर बन कर रह जाएंगे, हां इसके बावजूद इनका इस्तेमाल प्रधानमंत्री मोदी के मन की बात का प्रसारण करने के लिए किया जाता रहेगा, जो मोदी और सैनी सरकार की प्राथमिकताओं में है, सरकार नौकरियां तो खत्म कर ही रही है इसलिए वह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के प्रति गंभीर नहीं है, क्योंकि शिक्षित और जागरूक युवा रोजगार नहीं मिलने पर सरकार को उखाड़ फेकेगा। ऐसे में सरकार शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने का ढिंढोरा ही पीट रही है कुछ ठोस नहीं कर रही, संभवता डिजिटल स्मार्ट बोर्ड इसी कड़ी का हिस्सा हैं।