क्या आरएसएस ने भारत की आज़ादी के लिए कुर्बानियां दी थीं?

क्या आरएसएस ने भारत की आज़ादी के लिए कुर्बानियां दी थीं?
October 25 06:14 2025

राम पुनियानी
आरएसएस की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, जो स्वयं आरएसएस के प्रचारक रह चुके हैं, ने संघ की तारीफों के पुल बांधे। उन्होंने कहा कि आरएसएस ने देश की आजादी के लिए बड़ी-बड़ी कुर्बानियां दीं और चिमूर जैसे कई स्थानों पर ब्रिटिश शासन का विरोध भी किया। उनके अनुसार राष्ट्र निर्माण में संघ का जबरदस्त योगदान है। सच क्या है? आजादी की लड़ाई संयुक्त भारतीय राष्ट्रवाद, जिसका मुख्य तत्व समावेशिता था, के पक्ष में थी। मुस्लिम साम्प्रदायिक तत्व, मुस्लिम राष्ट्र के लिए संघर्ष कर रहे थे और हिन्दू साम्प्रदायिक तत्व (आरएसएस, हिन्दू महासभा) हिन्दू राष्ट्र के लिए। हालाँकि, सावरकर आरएसएस में नहीं थे लेकिन वे एक तरह से हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र के प्रमुख सिद्धांतकार और सरपरस्त थे। वे काफी हद तक आरएसएस के मार्गदर्शक थे। माफ़ी मांगने और पहले अंडमान और बाद में रत्नागिरी जेल से रिहा होने के बाद सावरकर ने कभी आज़ादी के आंदोलन का समर्थन नहीं किया और उन्हें पेंशन के रूप में एक बड़ी राशि 60 रुपये (जो आज के लगभग 4 लाख रुपये के बराबर है) हर माह मिलती थी। उन्होंने ब्रिटिश सेना में भारतीयों की भर्ती के लिए अंग्रेजों की मदद भी की।

संघ की स्थापना की वजह क्या थी?
हालाँकि हेडगेवार, जो बाद में आरएसएस के प्रथम सरसंघचालक बने, ने खिलाफत आंदोलन में भाग लिया था और वे एक साल जेल में भी रहे थे। इस आंदोलन में मुस्लिमों के साथ भाग लेने और बाद में केरल के मापोलिया विद्रोह (जो मुख्यत: किसानों का जमींदार विरोधी संघर्ष था) में हिस्सेदारी करने के बाद उनके अन्दर का हिन्दू राष्ट्रवादी जाग उठा और उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी। बाद में अन्य चितपावन ब्राह्मणों के साथ वे आरएसएस के संस्थापकों में से एक बने। संघ की स्थापना की एक वजह यह थी कि उसके संस्थापक ब्राह्मण जमींदारों के खिलाफ गैर-ब्राह्मणों के उस आंदोलन से चिंतित थे जो दलितों के सशक्तिकरण का परिचायक था। दूसरा कारण था गांधीजी का आज़ादी की लड़ाई से मुस्लिमों सहित समाज के सभी वर्गों को जोडऩे का प्रयास। तीसरा कारण था उनका मुसोलिनी और हिटलर से प्रेरित होना।

संघ का राष्ट्रवाद ‘अलग’ था, यह तब स्पष्ट हुआ जब पंडित नेहरू ने 26 जनवरी 1930 को तिरंगा फहराने का आव्हान किया। हेडगेवार ने भी झंडा फहराने का आव्हान किया, किंतु भगवा झंडा फहराने का। अभी हाल में संघ की स्थापना के सौ वर्ष पूर्ण होने पर जारी किए गए स्मारक सिक्के पर भारत माता की तस्वीर भगवा झंडे के साथ दिखाई गई है न कि तिरंगे के साथ। तिरंगे को संविधान में स्वीकार्यता दी गई और सरकार ने इसे 15 अगस्त 1947 को फहराने की योजना बनाई। आरएसएस पर विस्तृत अध्ययन एवं शोध करने वाले एक प्रबुद्ध अध्येता श्मसुल इस्लाम लिखते हैं- ”आरएसएस के अंग्रेजी भाषा के मुखपत्र आर्गनाईजर ने अपने 14 अगस्त 1947 के अंक में राष्ट्रध्वज के विरूद्ध लिखा कि इसे ‘हिंदू कभी स्वीकार नहीं करेंगे और कभी अपना नहीं मानेंगे। तीन की संख्या अपने आप में मनहूस है और तीन रंगों वाले ध्वज का देश पर बहुत बुरा भावनात्मक प्रभाव होगा और यह देश के लिए हानिकारक होगा”।

इस दौरान उन्होंने अन्य लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के प्रति हतोत्साहित किया। एक संगठन के रूप में आरएसएस ने किसी भी ब्रिटिश विरोधी आंदोलन में भाग नहीं लिया। भारत छोड़ो आंदोलन में क्या हुआ? सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनके कई दावों की कलई खुल गई और उनका खोखलापन सामने आ गया। अटल बिहारी वाजपेयी ने दावा किया था कि उन्होंने आजादी की लड़ाई में हिस्सेदारी की थी। ”1998 के आम चुनावों के दौरान उन्होंने मतदाताओं के लिए एक अपील जारी की थी जिसमें उन्होंने कहा था कि वे न केवल शाखा स्तर पर आरएसएस के लिए काम कर रहे थे बल्कि उन्होंने आज़ादी के आंदोलन में भी भाग लिया था”। हकीकत यह है कि वे उस दौरान आरएसएस में थे और चूँकि स्कूल-कॉलेज बंद हो गए थे इसलिए वे अपने पैतृक गांव बटकेश्वर चले गए थे। वहां वे दूर खड़े होकर भारत छोड़ो आंदोल न के सिलसिले में निकाले गए एक जुलूस को देख रहे थे। वे चूँकि वहां मौजूद थे, इसलिए उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। उन्होंने आनन-फानन में एक पत्र लिखकर यह स्पष्टीकरण दिया कि वे उस जुलूस में शामिल नहीं थे और कुछ ही दिनों में उन्हें रिहा कर दिया गया। “27 अगस्त 1942 को दोपहर लगभग 2 बजे काकू उर्फ लीलाधर और महुना आला पहुंचे और उन्होंने भाषण दिया तथा लोगों को वन कानून तोडऩे के लिए राजी करने का प्रयास किया। दो सौ लोग वन विभाग के कार्यालय गए और मैं भी अपने भाई के साथ भीड़ के पीछे गया और बटेश्वर के वन विभाग के कार्यालय पहुँचा। मेरे भाई नीचे रूके रहे और बाकी सब लोग ऊपर गए। मैं काकू और महुना, जो वहां मौजूद थे, के अलावा भीड़ में शामिल किसी भी अन्य व्यक्ति का नाम नहीं जानता”।

उस समय गोलवलकर सरसंघचालक थे। ”सन् 1942 में कई लोगों के दिलों में तीव्र भावनाएं थीं। तब भी संघ का सामान्य कार्यकलाप जारी रहा। संघ ने स्वयं सीधे कोई कार्यवाही न करने का निश्चय किया।” (श्री गुरूजी समग्र दर्शन खंड 4 पृष्ठ 39-40)।

अंग्रेज़ों के खिलाफ़ संघर्ष एजेंडा था या नहीं?
आरएसएस के विचारक साफ़ शब्दों में बताते हैं कि अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष कभी उनके एजेंडे का हिस्सा नहीं रहा। ”हमें यह याद रखना चाहिए कि अपनी प्रतिज्ञा में हम धर्म और संस्कृति की रक्षा के माध्यम से देश की आजादी की बात करते हैं, इसमें अंग्रेजों को यहां से भगाने का कोई जिक्र नहीं है।” गोलवलकर के एक अपेक्षाकृत बड़े उद्धरण से उनका समग्र रवैया स्पष्ट होता है। ”देश में समय-समय पर पैदा होने वाले हालातों को लेकर मन में कुछ व्याकुलता उत्पन्न होती थी। सन् 1942 में भी इसी तरह की व्याकुलता थी। इसके पहले 1930-31 में आंदोलन हुआ था। उस दौरान भी कई लोग डॉक्टरजी (हेडगेवार) के पास गए। इस प्रतिनिधिमंडल ने डॉक्टरजी से अनुरोध किया कि इस आंदोलन के ज़रिए आजादी हासिल होगी और संघ को भी इसमें भागीदारी करनी चाहिए। उस समय जब एक सज्जन ने डॉक्टरजी से कहा कि वे जेल जाने को तैयार हैं, तब डॉक्टरजी ने उनसे कहा ”जरूर जाइए, पर आपके जेल जाने पर आपके परिवार की देखभाल कौन करेगा”? उन सज्जन ने जवाब दिया ”मैंने न केवल घर के दो साल के खर्चे के लिए पर्याप्त व्यवस्था कर दी है बल्कि आवश्यकतानुसार जुर्माना अदा करने के लिए भी इंतजाम कर दिया है”। तब डॉक्टरजी ने उनसे कहा, ”अगर आपने खर्चों के लिए पर्याप्त व्यवस्था कर दी है तो आइए और संघ के लिए दो साल तक कार्य करिए”। घर पहुंचने के बाद वे सज्जन न तो जेल गए और ना ही संघ के काम में जुटे”।

गोलवलकर यह भी बताते हैं कि ”उस समय भी संघ का सामान्य कामकाज जारी रहा। संघ ने सीधे कुछ भी न करने का संकल्प लिया, हालाँकि संघ के कार्यकर्ताओं के दिलों में उथल-पुथल जारी रही।
संघ निष्क्रिय लोगों का संगठन है, वे बेमतलब की बातें करते हैं, न केवल संघ के बाहर के लोग बल्कि हमारे बहुत से कार्यकर्ता भी इस तरह की बातें करते थे। वे बहुत निराश भी थे। लेकिन संघ का कोई भी ऐसा प्रकाशन या दस्तावेज नहीं है जो भारत छोड़ो आंदोलन के लिए संघ द्वारा परोक्ष रूप से किए गए महान कार्य पर थोड़ी सी भी रोशनी डालता हो”। मोदी के दावों का सच्चाई से कोई नाता नहीं है। आरएसएस हिन्दू राष्ट्र के लिए कार्य करने वाला संगठन है और उसका आजादी के आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं था जिसका लक्ष्य एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, समावेशी राष्ट्र की स्थापना करना था।
(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

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