कुत्तों की नसबंदी के बाद अब माइक्रोचिप के नाम पर लूट-बांट की तैयारी

कुत्तों की नसबंदी के बाद अब माइक्रोचिप के नाम पर लूट-बांट की तैयारी
May 11 06:16 2025

फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) नागरिकों के लिए जान जोखिम बने शहर के आवारा कुत्ते नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग और कथित कुत्ता प्रेमी संस्थाओं की मोटी कमाई का साधन हमेशा से रहे हैं। पहले कुत्तों की नसबंदी के नाम पर करोड़ों की बंदरबांट होती थी, अब उनमें माइक्रोचिप लगाने का फर्जीवाड़ा कर जनता की गाढ़ी कमाई लूटने की तैयारी की जा रही है। खास बात यह है कि नगर निगम हर साल कुत्तों की नसबंदी पर लाखों रुपये खर्च दिखाता है लेकिन उसके पास कुत्तों की नसबंदी के कोई आंकड़े नहीं रहते।

आरटीआई कार्यकर्ता रवींद्र चावला के अनुसार शहर में कितने आवारा कुत्ते हैं, कितने पालतू हैं, कितने कुत्तों का इस वर्ष या सीजन में जन्म दिया इसका कोई भी आंकड़ा नगर निगम के पास नहीं है। ऐसे में बीते दस सालों में आवारा कुत्तों की नसबंदी, घायल कुत्तों की देखभाल, इलाज के नाम पर करोड़ों की बंदरबांट की जा चुकी है। अब उनमें माइक्रोचिप लगाने का खेल खेला जा रहा है। बताया जा रहा है कि माइक्रोचिप लगाए जाने से कुत्ते का टीकाकरण हुआ है या नहीं इसकी जानकारी हो जाएगी, साथ ही कुत्ते की पहचान हो जाएगी।

मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार पीएफए की यूनिट हेड वृंदा शर्मा ने बताया कि अभी तक शहर में ढाई हज़ार कुत्तों को माइक्रोचिप लगाई भी जा चुकी है। अच्छी बात है, लेकिन जिन कुत्तों को माइक्रोचिप लगाई गई है उन्हें चेक करने की कोई भी व्यवस्था नगर निगम के पास नहीं है। ढाई हजार कुत्तों का रिकॉर्ड ऑनलाइन जांचने के लिए भी कोई व्यवस्था नहीं है। न ही वृंदा शर्मा ने बताया कि ढाई हजार कुत्तों का डेटा उन्होंने किस वेबसाइट पर या अपनी संस्था की सोशल साइट पर डाल रखे हैं। जब कोई डेटा ही नहीं है तो फिर वो ढाई हजार क्या पचास हजार कुत्तों को माइक्रोचिप लगाया जाना बताएंगी, तो नगर निगम के कमीशनखोर अधिकारी मान लेंगे।

सवाल यह भी है कि माइक्रोचिप लगाने के लिए पीएफए के पास कोई ऑपरेशन थियेटर है या नहीं। जब नसबंदी के लिए ही पीएफए के पास कोई ऑपरेशन थियेटर, स्थायी वेटरिनरी डॉक्टर नहीं है तो फिर माइक्रोचिप लगाने के लिए कहां होगा। यह और कुछ नहीं बीते ग्यारह साल से पीएफए और नगर निगम द्वारा कुत्तों के नाम पर की जाने वाली करोड़ों रुपयों की लूट का ही विस्तार है।

सुधी पाठकों को याद दिला दें कि 2014 में भाजपा सरकार बनते ही खट्टर ने मेनका गांधी की खास कही जाने वाली शहर की प्रीति दुबे की संस्था पीएफए को कुत्तों के टीकाकरण, नसबंदी, भोजन, शेल्टर आदि सेवाएं देने का ठेका दिया था। सच्चाई यह है कि शहर में कितने आवारा कुत्ते हैं, कितने पालतू हैं, कितने कुत्तों ने जन्म दिया इसका कोई भी आंकड़ा नगर निगम के पास नहीं है। इसका फायदा उठाते हुए प्रीति दुबे की संस्था ने कागजों पर काम दिखा कर बिल लगाए और कमीशनखोर अधिकारियों की मिलीभगत से भुगतान होता रहा। संस्था द्वारा किए गए कामों का न तो प्रीति दुबे ने कोई रिकॉर्ड नगर निगम को दिया न ही रिश्वतखोर अधिकारियों ने उससे मांगा। दुबे का यह ठेका 2018 में खत्म हो गया लेकिन पांच साल तक उसे रिन्यू किया जाता रहा।

आरटीआई कार्यकर्ता नरेंद्र सिरोही के अनुसार केवल 2018 से 2023 के बीच नगर निगम ने प्रीति दुबे को सवा करोड़ रुपये का भुगतान कर डाला लेकिन नसबंदी-टीकाकरण या घायल कुत्तों के इलाज का कोई रिकॉर्ड नहीं लिया गया, लेते क्या प्रीति दुबे के ही पास कोई रिकॉर्ड नहीं था। कुत्तों की नसबंदी में करोड़ों हड़पने के समाचार प्रकाशित होने से प्रीति दुबे की छवि खराब हो गई। इसका तोड़ निकाला गया कि 2024 में वृंदा शर्मा का चेहरा आगे किया गया। बताया जा रहा है कि नगर निगम ने वित्त वर्ष 2023-24 की समाप्ति यानी मार्च 2024 में कुत्तों की नसबंदी का करीब चालीस लाख रुपये का ठेका वृंदा शर्मा को दिया था। वित्तीय मामलों के जानकारों के अनुसार वर्ष के अंतिम दिनों में बकाया धन लैप्स न हो जाए तो उसकी इसी तरह लूट बांट की जाती है। यही वृंदा शर्मा अब माइक्रोचिप लगा रही हैं। सवाल है कि क्या नगर निगम ने माइक्रोचिप लगाने के लिए कोई टेंडर आमंत्रित किया है या नहीं। यदि नहीं किया है तो फिर वृंदा शर्मा को इसका भुगतान किस मद से किया जाएगा। इस संबंध में नगर निगम स्वास्थ्य अधिकारी नितीश परवाल से पूछा तो उन्होंने बैठक में होने की बात कह पल्ला झाड़ लिया।

बताते चलें कि ये वही नितीश परवाल है जिसे एंटी करप्शन ब्यूरो ने 29 मार्च 2024 को पांच लाख रुपये रिश्वत लेते हुए रंगेहाथ गिरफ्तार किया था। तब भी यह इसी पद पर बैठा था और बल्क वेस्ट जेनरेटर संस्थानों से कूड़ा उठाने का लाइसेंस जारी करने के एवज मे बसेलवा निवासी हरिओम से पांच लाख रुपये मांगे थे। रंगेहाथ पकड़े गए रिश्वतखोर को खट्टर-सैनी की ‘ईमानदार’ सरकार ने फिर इसी नगर निगम में उसी पद से नवाज़ कर उस हरिओम जैसे अन्य शिकायतकर्ता और जनता को संदेश दिया है कि भले ही शिकायत कर लो, तुम्हारा काम हमारा यही भ्रष्ट अधिकारी ही करेगा, यानी लाइसेंस लेना है तो पैसा देना ही होगा।

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Mazdoor Morcha
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