क्रांतिकारी मजदूर मोर्चा जब से पता चला था, कि घर से मात्र 1 किमी की दूरी पर, मेवला महाराजपुर गांव में, एक वयो वृद्ध, कॉमरेड महाशय होराम सिंह रहते हैं; उनसे मिलने की भूख बढ़ती ही जा रही थी. आज तृप्ति हो गई. 1960 में, मतलब 65 वर्ष पहले, इसी गांव से शुरू हुई, कम्युनिस्ट यात्रा का वृतांत तथा फऱीदाबाद के मज़दूर आंदोलन का इतने लंबे समय का इतिहास किसी और तरह जीना, मुमकिन ही नहीं था. कॉमरेड महाशय की उम्र 85 साल है, लेकिन जैसे ही 17 अक्टूबर 1979 को, नीलम चौक फऱीदाबाद पर, हड़ताली मज़दूरों पर हुई बर्बर पुलिस गोलीबारी का जि़क्र आया, कॉमरेड के चहरे पर लालिमा उभर आई. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, कुल 3 हड़ताली मज़दूर शहीद हुए थे, असलियत में कहीं ज्यादा. अपने कामरेडों की मौत से तिलमिलाए मज़दूरों ने, बिना किसी चेतावनी, मज़दूरों को मारने के इरादे से, गोली चलाने वाले, दरोगा को बहुत बुरी तरह पीटा था. कुछ ही दिन बाद उसकी भी मौत हो गई थी.
इस कुख्यात गोलीकांड की PUCL द्वारा की गई, ‘FACT FINDING REPORT’ में कॉमरेड महाशय ने, उस गोलीकांड पर लिखी और देश भर में मक़बूल हुई अपनी एक कविता भी सुनाई. उसकी विडियो रिकॉर्डिंग का भी आप आनंद ले सकते हैं. बातचीत में, कॉमरेड महाशय ने एक गुगली भी फेंकी, जिसका जवाब मेरे पास नहीं था. फऱीदाबाद के मज़दूरों की दुर्दशा का जि़क्र आते ही, पहले कॉमरेड गंभीर हो गए, आधा मिनट सोचते रहे, फिर बोले; सतबीर कॉमरेड, मज़दूर हैं कहाँ, ये तो बताओ? मज़दूर कहते किसे हैं, मुझे यह तो समझाओ. मुझे तो मज़दूर कहीं नजऱ नहीं आते!! बंदा कारखाने में काम कर रहा है, महज़ इतने से वह मज़दूर नहीं हो जाता. धर्म-जाति में बंट जाने वाला मज़दूर नहीं होता. मज़दूर वह होता है, जिसमें मज़दूर वर्गीय चेतना होती है, भले वह कारख़ाने में काम करे या नहीं!! क्या बात बोली है, कॉमरेड; मेरी ज़बान से स्वत:स्फूर्त निकल पड़ा!! सी राजेश्वर राव से शुरू कर, आज तक की सीपीआई की दिल्ली-हरियाणा-पंजाब की जीवंत दास्तां, जेल यात्राओं का वर्णन सुनकर, दिल की गहराई तक तृप्ति का अहसास हुआ. उन दिनों फऱीदाबाद पंजाब प्रांत में होता था. उनकी खुशी भी बाहर छलक रही थी। कॉमरेड महाशय होराम सिंह को क्रांतिकारी मजदूर मोर्चा का लाल सलाम।