मज़दूरों के पैसे से चलने वाले कॉर्पोरेशन के मेडिकल कॉलेजों में यह नियम बनाया गया था कि एमबीबीएस कोर्स में दाखिले के लिए बीमाकृत मज़दूरों के बच्चों के लिए विशेष आरक्षण रखा जाएगा। इस आरक्षण के तहत सीटों का कोटा विभिन्न राज्यों में अलग-अलग है। हरियाणा के मामले में 15 प्रतिशत सीटें केन्द्र सरकार की काट कर शेष आधी सीटें राज्य और बाकी ईएसआई कोटे की रहती हैं। इसके लिए सम्बन्धित कॉलेज को आवेदन के समय राज्य सरकार के साथ बाकायदा एक अनुबंध करना होता है।
हाल-फिलहाल में कॉर्पोरेशन द्वारा चालू किए गए 10 मेडिकल कॉलेजों में से अधिकांश में ईएसआई कोटा रखा ही नहीं गया है। कारण सम्बन्धित कॉलेजों के डीन की अज्ञानता तथा मुख्यालय में बैठे नालायक कमिश्नरों व खुद डीजी की अज्ञानता एवं उदासीनता को समझा जा रहा है। यदि समय रहते मुख्यालय इस ओर ध्यान देता तो बीमाकृत मज़दूरों के बच्चों के लिए सीटें आरक्षित हो सकती थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यदि मुख्यालय में बैठे डीजी व उनके कमिश्नरों को मेडिकल कॉलेज चलाने सम्बन्धी कानून-कायदों की थोड़ी भी जानकारी होती तो वे अपने इन संस्थानों को राज्य सरकारों से पूर्णतया मुक्त करके 85 प्रतिशत सीटें ईएसआई कोटे के तहत बीमाकृत मज़दूरों के बच्चों के लिए आरक्षित कर सकते थे। इसके लिए इन्हें केवल थोड़े हाथ पैर हिलाकर केंद्र सरकार से अपने संस्थानों को राष्ट्रीय महत्व के संस्थान घोषित कराना होता है लेकिन ऐसी घोषणा करने के लिए भी तो फाइल चलानी पड़ती है। जिसके लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है जो इस मुख्यालय में उपलब्ध नहीं है और जहां उपलब्ध है वहां से गृहण करने में अपनी तौहीन समझते हैं।
अपने अधिकारों के लिए जागरूक मज़दूर पहुंचे डीन के पास दिनांक 23 अक्टूबर को हुए सुविधा समागम में जहां मज़दूर प्रतिनिधियों ने, अस्पताल में घटती सुविधाओं को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया था वहीं एक दिन पहले यानी बुधवार को कुछ मज़दूर डायलिसिस कराने के बाद डीन कार्यालय में जा धमके। उनकी मांग थी कि उन्हें मिलने वाला भोजन क्यों बंद कर दिया गया है? दूसरी मांग यह थी कि उन्हें लगने वाले आवश्यक इंजेक्शन क्यों बंद कर दिए गए हैं, अस्पताल किस आधार पर उन्हें बाजार से खरीद कर लाने को कह सकता है? यद्यपि उस दिन डीन डॉ. कालीदास उपस्थित नहीं थे, उनकी गैरहाजिरी में कार्यवाहक डीन ने मज़दूरों को तुरन्त भोजन उपलब्ध कराना तो स्वीकार कर लिया लेकिन इंजेक्शनों की आपूर्ति के लिए एक माह का समय मांगा।
डीन से मिलने आए मज़दूर बेशक कुछ जागरूक तो थे लेकिन पूरी तरह से जुझारू न होने के चलते यह नहीं पूछ सके कि दो महीने से बंद इंजेक्शनों के आने में अभी एक महीना और क्यों लगेगा? वे ये भी नहीं पूछ सके कि उनका खाना क्यों बंद कर दिया गया था? वे केवल इतने से ही संतुष्ट होकर चले गए कि खाना तो तुरन्त और इंजेक्शन महीने बाद शुरू हो जाएंगे। कुल मिलाकर मज़दूरों की ये पहल सराहनीय एवं प्रेरणादायक है। इससे प्रेरित होकर मज़दूरों को अपने अधिकारों के लिए स्वयं लडऩे का रास्ता सीखना चाहिए। दूसरी ओर प्रबन्धन को भी समय रहते यह समझ लेना चाहिए कि मज़दूरों को आक्रोशित करके प्रदर्शन की ओर न धकेला जाए।