फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा)। निगम के कर्मचारियों के साथ नाइंसाफी करने, उनके अधिकार छीनने वाले डीए ब्रांच अधीक्षक गिर्राज की खुराफात सामने आने पर निगमायुक्त धीरेंद्र खडगटा ने अंतत: उसे निगम सचिव कार्यालय भेज दिया। निगम में यह पद खुड्डेलाइन लगाने वाला कहा जाता है।
गिर्राज ने पद का दुरुपयोग करते हुए निगम में जुलाई 1997 में नलकूप चालक राजेंद्र सिंह की पदोन्नति में बाधाएं डाल कर उसे अपने हक से लंबे समय तक वंचित रखा था। राजेंद्र सिंह अपने नियमितीकरण, पदोन्नति और उसके आधार पर बढ़ा हुआ वेतनमान पाने के लिए बीते तीस साल से संघर्ष कर रहे हैं। राजेंद्र सिंह के पदोन्नति के आवेदन को जुलाई 2008 में तैनात तत्कालीन सहायक स्थापना अधिकारी वीके वर्मा ने रिश्वत न मिलने के कारण दबा दिया और गलत रिपोर्ट लिख कर आला अधिकारियों को गुमराह किया और राजेंद्र से कनिष्ठ कई कर्मचारियों को नियमित कर दिया।। संघर्ष कर रहे राजेंद्र सिंह ने अधिकारियों के सामने सच्चाई रखी तो जांच कराई गई। धांधली करने पर वीके वर्मा के खिलाफ अक्तूबर 2008 को रूल सात के तहत कार्रवाई हुई। गिर्राज वीके वर्मा को अपना गुरू मानता है। वर्मा की सेवानिवृत्ति के बाद गिर्राज को सहायक स्थापना अधिकारी बनाया गया तो अपने गुरु का बदला लेने के लिए उसने भी राजेंद्र सिंह की फाइल लंबे अर्से तक दबाए रख कर उसका हक मारा।
इतना सब होने के बावजूद राजेंद्र सिंह हतोत्साहित नहीं हुए और अधिकार पाने के लिए लगातार लड़ाई लड़ते रहे लेकिन हर बार गिर्राज फाइल में कुछ न कुछ बेवजह की कमियां निकाल कर उनकी पदोन्नति अटका देता। राजेंद्र सिंह के साथ हो रही नाइंसाफी को मज़दूर मोर्चा भी समय समय प्रकाशित करता रहा है। हाल ही में पीडि़त ने निगमायुक्त से मिल कर मामले की जांच एंटी करप्शन ब्यूरो या सीबीआई से कराने की मांग की। इस पर निगमायुक्त धीरेंद्र खडगटा ने खुद ही उनकी फाइलों का निरीक्षण किया और गिर्राज की करतूतें खुल गईं। कारनामे सामने आने पर गिर्राज को खुड्डे लाइन लगा दिया। गिर्राज का तबादला तो कर दिया गया लेकिन राजेंद्र सिंह को इंसाफ कब मिलेगा, यह प्रश्न अभी भी अपनी जगह है। राजेंद्र सिंह कहते हैं कि यदि इंसाफ नहीं मिला तो वह खुद एंटी करप्शन ब्यूरो से लेकर न्यायपालिका तक जाएंगे, अपना हक लेकर रहेंगे।