खट्टर सरकार की छत्र-छाया में सैनिक विहार सोसायटी की खुली लूट

खट्टर सरकार की छत्र-छाया में सैनिक विहार सोसायटी की खुली लूट
September 06 14:43 2022

फरीदाबाद (म.मो.) ग्रेटर फरीदाबाद के सेक्टर 88 में वर्ष 2005 में सैनिक विहार नामक रिहायशी सोसायटी बना कर सहकारी विभाग में रजिस्टर कराई गई थी। सरकारी शर्तों के अनुसार निश्चित मात्रा में ज़मीन की खरीदारी शुरू की गई। सोसायटी ने 49.35 एकड़ जमीन खरीद ली। इसमें से चार एकड़ जमीन सडक़ में निकल गई। शेष बची 45.35 एकड़।
दूसरी ओर सोसायटी प्रबन्धन लगातार सदस्यों की संख्या बढाता जा रहा था। क्योंकि हर नये बनने वाले सदस्य से लाखों रुपये मिलते थे। परिणामस्वरूप सदस्यों की संख्या हो गई 702। उपलब्ध जमीन में से इन सभी सदस्यों को प्लॉट दे पाना सम्भव नहीं था। लिहाजा योजना बनाई गई कि इस जमीन पर फ्लैट बनाकर सदस्यों को आवंटित किये जायें। अब फ्लैट कौन बनाये, इसके लिये टीडीआई नामक बिल्डर कंपनी से सांठ-गांठ की गई।

पूरी सेटिंग करने के बाद सदस्यों के सामने 27 जुलाई 2014 को एक प्रस्ताव रखा गया। इसके अनुसार टीडीआई कंपनी 702 फ्लैट बना कर सदस्यों को आवंटित करेगी। ये फ्लैट मात्र 22 एकड़ जमीन पर बनाये जाने थे। इनको बनाने की पूरी लागत टीडीआई कंपनी सदस्यों से वसूलेगी। इसके बदले सोसायटी ने बिल्डर कंपनी को शेष 23.35 एकड़ जमीन दे दी। पूरी सोसायटी के भूखंड से निकलने वाला 6000 वर्ग गज कमर्शियल क्षेत्र भी बिल्डर को मिलेगा। इस सौदे के मुताबिक ईडीसी (बाहरी विकास शुल्क), आईडीसी (भीतरी विकास शुल्क) पर खर्च होने वाला 23 करोड़ भी सोसायटी भरेगी।

अब सवाल आता है कि बिल्डर टीडीआई कंपनी 23.35 एकड़ ज़मीन व 6000 वर्ग गज़ कमर्शियल क्षेत्र लेकर बदले में क्या देगी? सौदे के मुताबिक बिल्डर कंपनी लाइसेंस फीस, सीएलयू (भूमि उपयोग परिवर्तन) और स्क्रीनिंग फीस भरेगी। इन तीनों कामों के लिये बिल्डर को केवल 8 करोड़ 86 लाख खर्च करना पड़ेगा। अब समझिये सारा गणित। बिल्डर को दी गई 23.35 एकड़ जमीन की कीमत 2014 में आंकी गई थी 94 करोड़। सोसायटी की कुल जमीन 45.35 एकड़ में से 6000 कमर्शियल घोषित की गई थी। जिसका बाजार भाव 25 करोड़ आंका गया था। सुधी पाठक समझ गये होंगे टीडीआई कंपनी का खेल, इसे 94 करोड़ की 23.35 एकड़ ज़मीन तथा 25 करोड़ की 6000 वर्ग गज कमर्शियल जमीन, यानी कि कुल 119 करोड़ का माल मिल गया। जिसमें से ऊपर बताया गया लाइसेंस फीस, सीएलयू तथा स्क्रीनिंग फीस के 8 करोड़ 86 लाख खर्च करेगा। कुल मिला कर मोटा-मोटा 110 करोड़ का मुनाफा। जाहिर है कि इतना बड़ा मुनाफा कोई बिल्डर अकेला नहीं हड़प सकता। इसमें सारा सहकारिता विभाग तथा सोसायटी के चुने हुए डायरेक्टरों का शामिल होना अनिवार्य है। गौरतलब है कि टीडीआई से समझौते का उक्त प्रस्ताव रजिस्ट्रार कॉरपोरेटिव सोसायटीज (आरसीएस), सीआर राणा, आईएएस को स्वीकृति हेतु भेजा गया तो उन्होंने 31 अक्टूबर 2014 को इस पर 12 एतराज लगा कर प्रस्ताव को वापस भेज दिया। उन्हीं के आदेश पर जमीन की बाजार कीमत का आकलन कराया गया था। जाहिर है उन्हें इस प्रस्तावित सौदे में बड़ा घोटाला नजर आ गया था। इसके बावजूद गुडग़ाव में तैनात डिप्टी रजिस्ट्रार व फरीदाबाद में तैनात असिस्टेंट रजिस्ट्रार आदि ने उनके उक्त पत्र को दबा दिया। विदित है कि आरसीएस तो साल दो साल के लिये आते-जाते रहते हैं जबकी डीआर व एआर स्थाई रूप से महकमे में बने रहते हैं।

सोसायटी के कुछ चुने हुए ईमानदार डायरेक्टरों ने इस घोटाले के विरुद्ध आरसीएस तथा उनके वरिष्ठ अधिकारियों को लगातार कई बार शिकायतें की। बदले में उन्हें सुनवाई के लिये बार-बार चंडीगढ़ बुलवाया जाता है तथा सुनवाई की बजाय उन्हें अगली तारीख दे दी जाती है ताकि वे थक-हार कर बैठ जायें। दूसरी ओर घोटालेबाज अधिकारियों ने उन 16 सदस्यों के सोसायटी से नाम काट दिये हैं जिन्होंने किस्तों के नाम पर इन घोटालेबाजों को और रकम देने से इनकार कर दिया। इन 16 रिक्त स्थानों को, ये घोटालेबाज मोटी रकमें लेकर गैरकानूनी ढंग से पिछली तारीखों में भरने का काम कर रहे हैं। खबर लिखे जाने तक घोटालेबाज़ों की चाल सफलतापूर्वक आगे बढ़ रही हैऔर फ्लैटों का निर्माण कार्य चल रहा है।

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Mazdoor Morcha
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