फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) हूडा के रिश्वतखोर और धूर्त अधिकारी हूडा को होनी वाली आमदमी को खुद डकार कर प्राधिकरण की बेशकीमती प्रापर्टी को कैसे खुर्द बुर्द करते हैं, सेक्टर 15 के बूथ नंबर 132 के उदाहरण से समझा जा सकता है। भुगतान नहीं किए जाने पर रिज्यूम किए गए इस बूथ की बहाली के लिए आवंटी को 1 करोड़ 28 लाख रुपये जमा करने का आदेश दिया गया। आवंटी ने संपदा अधिकारी और कंप्यूटर क्लर्क से मिलीभगत कर ली और इन दोनों ने रिकॉर्ड में बकाया शून्य दिखा कर बूथ का रिजम्पशन कैंसिल कर दिया।
हूडा द्वारा साल 1989 में खुली बोली के तहत सेक्टर 15 की दुकानों का आवंटन किया गया था। बूथ नंबर 132 को उस समय 3 लाख 80 हजार 900 रुपये में मनमोहन सिंह के नाम आवंटित किया गया था। यह रकम हूडा को दस किस्तों में भुगतान किए जाने थे लेकिन मनमोहन सिंह ने किस्ते नहीं भरीं। इस पर हूडा ने फरवरी 1994 को यह बूथ रिज्यूम कर लिया। कागजों पर तो यह बूथ रिज्यूम कर लिया गया लेकिन भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से मनमोहन सिंह ही इस पर काबिज रहा। मामले को उलझाने के लिए 1998 में मनमोहन सिंह से दिवानी न्यायालय में केस दायर करवा दिया लेकिन कोर्ट ने हूडा के पक्ष में फैसला सुनाया। साल 2000 में मनमोहन सिंह ने अतिरिक्त जिला न्यायाधीश की कोर्ट में अपील की लेकिन वहां भी हार मिली, तो उसने हाईकोर्ट में याचिका डाल दी। यह याचिका भी दिखावटी थी क्योंकि बीस साल से अधिक समय बीतने के बावजूद इस पर न कोई सुनवाई हुई और न कार्यवाही।
खास बात यह है कि रिज्यूम होने के बावजूद हूडा ने बूथ अपने कब्जे में नहीं लिया और मनमोहन सिंह उसमें कारोबार करता रहा। साल 2015 में की गई मनमोहन सिंह की अपील को हूडा एडमिनिस्ट्रेटर ने भी ठुकरा दिया, इस पर उसने एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, हरियाणा टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एंड अर्बन एस्टेट्स डिपार्टमेंट, एके सिंह के कार्यालय में अपील की। एके सिंह ने 12 अप्रैल 2016 को फैसला दिया कि सेक्टर 15 के आसपास के सेक्टरों में बूथ को जो रेट चल रहे हैं उसके आधार पर दाम तय कर मनमोहन सिंह से वसूली की जाए।
इतने स्पष्ट आदेश के बावजूद हूडा अधिकारियों की मिलीभगत से मनमोहन सिंह ने एक अन्य एडिशनल चीफ अरुण कुमार गुप्ता के यहां 18 अप्रैल 2018 को अपील कर दी। मनमोहन सिंह के साथ मिले संपदा अधिकारी और अकाउंट विभाग के अधिकारियों ने बकाया शून्य दर्शाया और बूथ भी रीस्टोर बता दिया। यह झूठा तथ्य भी प्रस्तुत किया गया कि मनमोहन सिंह बूथ का 100 प्रतिशत का मालिक है, जबकि सच्चाई यह है कि वह केवल 50 प्रतिशत का ही मालिक है और बाकी पचास प्रतिशत का मालिक भीम सेन अरोड़ा है। बावजूद इसके अरुण कुमार गुप्ता ने भी एके सिंह के फैसले को सही मानते हुए मनमोहन सिंह को बूथ की कीमत का 75 फीसदी यानी 1 करोड़ 28 लाख रुपये साठ दिन के भीतर जमा कराने अथवा बूथ रिज्यूम करने का आदेश जारी कर दिया। साथ ही संपदा अधिकारी और कंप्यूटर ऑपरेटर को आदेश दिया कि वसूली गई धनराशि की जानकारी चंडीगढ़ मुख्यालय स्थित सीए को भी उपलब्ध कराएं।
मनमोहन सिंह यह धनराशि जमा करे इसके लिए हूडा अधिकारियों को उसे नोटिस जारी करना था लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया और बिना कोई कार्रवाई पांच साल निकाल दिए गए। पांच साल बीतने के बाद फरवरी 2021 को मनमोहन सिंह ने चार किस्तों में धनराशि चुकाने की हूडा में अपील की, हूडा की नियमावली में ऐसा कोई प्रावधान नहीं होने के कारण उसकी अपील खारिज कर दी गई। इतना होने के बावजूद हूडा के भ्रष्ट अधिकारियों ने उसे बूथ से बेदखल नहीं किया। उसे लाभ पहुंचाने के लिए हूडा अधिकारियों ने देय धनराशि चुकाने के लिए न तो कोई नोटिस जारी किया और न ही आदेश। चंडीगढ़ सीए को रिपोर्ट भेजने का तो सवाल ही नहीं उठता।
खास बात यह है कि बूथ पर आज भी मनमोहन सिंह का कब्जा है जबकि वह हर जगह से हार चुका है, हाईकोर्ट में भी केस बंद हो चुका है, न ही उसने 1 करोड़ 28 लाख रुपये (यह रकम ब्याज लगने के कारण बढ़ कर कहीं ज्यादा हो चुकी है) चुकाए हैं। इतना सब होने के बावजूद हूडा के अधिकारी अपने रिज्यूम बूथ पर कब्जा नहीं कर रहे हैं, समझा जा सकता है कि यह सब बिना मोटी रिश्वत के मुमकिन नहीं हो सकता, यानी चंद लाख रुपयों की खातिर हूडा की ही संपत्ति को लुटाया जा रहा है। मज़दूर मोर्चा का मानना है कि यदि सरकार एवं उसकी अफसरशाही में थोड़ी ईमानदारी बची हुई है तो तुरंत धोखाधड़ी करने के आरोप में तमाम संबंधित अधिकारियों व दुकान को कब्जाए बैठे व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक केस दर्ज करके मुकदमा चलाए और बूथ को फर्जी के बजाय वास्तविक रूप से रिज्यूम किया जाए।-