फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) काम नहीं काम का ढिंढोरी पीटने और विकास कार्यों के नाम पर कमीशनखोरी, लूट कमाई करने वाली भाजपा सरकार बीते सवा साल से ई बसों का झुनझुना बजा रही है लेकिन जमीन पर कोई काम नहीं हुआ। नायब सैनी सरकार भी भ्रष्टाचार की उसी परंपरा को आगे बढ़ाती नजर आ रही है। हाल ही में सरकार ने घोषणा की है कि जल्द ही फरीदाबाद को सौ ई बसें दी जाएंगी। आधारभूत संरचना के बिना ये बसें सड़कों पर तो दौडऩे से रहीं। ऐसे में इन बसों का भी वही हाल होगा जो लगभग डेढ़ दशक पहले जेएनएनयूआरएम के तहत फरीदाबाद नगर निगम को भेजी गईं 200 लो फ्लोर सीएनजी बसों का हुआ था। इनमें से अधिकतर रखरखाव के अभाव में खड़े खड़े सड़ गल गईं, इज्ज्त बचाने के लिए बाद में इन्हें रोडवेज को दे दिया गया था। नोटबंदी के जरिए देश की आर्थिक कमर तोडऩे जैसे अदूरदर्शी, अज्ञानतापूर्ण घोषणाएं करने वाले जुमलाजीवी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2023 में पीएम ई बस योजना की घोषणा की थी।
इसके तहत फरीदाबाद को भी सौ ई बसें देने की घोषणा की गई। सुधी पाठकों को बताते चलें कि ई बसों के संचालन के लिए सबसे पहली जरूरत चार्जिंग स्टेशन और उसके लिए आवश्यक फीडर लाइन की होती है। इन बसों के रखरखाव, मरम्मत के लिए वर्कशॉप, पार्केिंग एरिया भी चाहिए। शहर के हर इलाके को सिटी बस सेवा से जोडऩे के लिए पर्याप्त चौड़ी सड़कों का भी होना जरूरी है। अगस्त 2023 के बाद से सरकार से लेकर अधिकारियों तक ने हर लोकसभा चुनाव, विधानसभा चुनाव तक ई बसें आने और सिटी बस सेवा शुरू होने का झुनझुना खूब बजाया लेकिन कुछ हुआ नहीं। सच्चाई ये है कि अभी तक केंद्र की मोदी सरकार से ई बसों के चार्जिंग स्टेशन का बजट भी पास नहीं हुआ है।
इसी साल जनवरी में एफएमडीए की सीईओ गरिमा मित्तल ने घोषणा की थी कि चार्जिंग स्टेशन के लिए केंद्र सरकार को सात करोड़ का प्रस्ताव बना कर भेज दिया गया है, बजट मिलते ही काम शुरू हो जाएगा और अप्रैल में ई बसें दौडऩे लगेंगी। नेताओं की तरह गरिमा मित्तल की हवा हवाई घोषणा भी जुमला साबित हुई क्योंकि चार्जिंग स्टेशन के लिए जितनी जगह चाहिए थी वह आज तक नहीं मिल सकी है। सेक्टर 61 में करीब पचास एकड़ की जगह प्रस्तावित की गई लेकिन कई पेंच होने के कारण वह भी आज तक फाइनल नहीं हो सकी है। ई बसों के संचालन का रूट भी आज तक एफएमडीए नहीं बना सका है क्योंकि इन बसों के चलने लायक सड़कें ही नहीं हैं।
जब जगह ही तय नहीं है तो बिजली विभाग द्वारा चार्जिंग स्टेशन के लिए अलग फीडर और लाइन खींचने की भी कोई योजना नहीं तैयार की गई है। इन सबके अलावा ई बसें चलाने के लिए ट्रेंड चालक, स्टाफ की तैनाती की भी कोई प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। यानी ई बसें चलाने के लिए सारा कुछ हवा हवाई है बावजूद इसके स्थानीय शहरी निकाय के आला अधिकारियों ने घोषणा कर दी है कि फरीदाबाद और गुडग़ांव को जल्द ही 100-100 बसें दे दी जाएंगी। जानकारों के अनुसार एक ई बस की कीमत 1 करोड़ 80 लाख रुपये से लेकर 2 करोड़ 25 लाख रुपये तक है।
लगता है कि शासक वर्ग अपना कमीशन बनाने की लालच में जनता की गाढ़ी कमाई का करीब चार सौ करोड़ रुपया लुटाने को बेताब है। यदि ये बसें आ गईं तो भी इनका चलाया जाना मुमकिन नहीं है। सौ बसों के संचालन के लिए दो शिफ़्ट के लिए कम से कम दो सौ चालक चाहिए जो हैं ही नहीं। बिना चार्जिंग के ये बसें नहीं चल पाएंगी, उसका कहीं अता पता नहीं है। रूट भी तय नहीं है, ऐसे में करीब चार सौ करोड़ की ये बसें खड़े होकर कबाड़ ही होती रहेंगी।
बताते चलें कि डेढ़ दशक पहले भी सिटी बस सेवा के नाम पर नगर निगम को आयातित दो सौ लो फ्लोर सीएनजी बसें मिली थीं। जिस नगर निगम से शहर की सीवर, सफाई व्यवस्था, पेयजल आपूर्ति भी संभाली नहीं जा रही थी उससे तो सिटी बस जैसी नई सेवा का बेड़ा गर्क ही होना था। बसें चलाने से लेकर उनके रखरखाव, मरम्मत के लिए स्टाफ तक भर्ती नहीं किया गया। इन आयातित बसों के लिए ट्रेंड चालक भी नहीं थे। बीस चालकों का एक दल इन्हें चलाने की ट्रेनिंग लेने के लिए बैंग्लोर भेजा गया था। बावजूद इसके नगर निगम बसें नहीं चलवा सका था और अधिकतर बसें खड़े खड़े ही खराब हो गईं।
बाद में सारी बसें रोडवेज को सौंप दी गई थीं। समझने वाली बात है कि बस संचालन-प्रबंधन के लिए समर्पित रोडवेज के बल्लभगढ़ बस डिपो में जीएम, ट्रैफिक मैनेजर, वक्र्स मैनेजर, एसपीओ, डिप्टी इंस्पेक्टर, सुपरिंटेंडेंट, आरएसओ, स्टेशन सुपरवाइजर के अलावा चालक-परिचालक व बसों की मरम्मत, सफाई, देखरेख आदि अन्य कार्य के लिए करीब सौ स्टाफ तैनात है तब कहीं सौ बसों का अबाध संचालन सुनिश्चित हो पाता है। नगर निगम के पास बस संचालन-प्रबंधन के कौशल वाला स्टाफ था ही नहीं इसलिए बसें खराब हो गईं।
यदि सिटी बस सेवा संचालन की जिम्मदारी भी रोडवेज को सौंपी जाती तो शायद बसें खराब न होतीं और सेवा भी शुरू हो जाती। एफएमडीए-जीएमडीए भी डेढ़ दशक वाले नगर निगम से भिन्न नहीं हैं। इनके पास भी सिटी बसों के संचालन के लिए समर्पित स्टाफ व आधारभूत ढांचा नहीं है। इनमें बैठे सेवानिवृत्त अधिकारियों में कुछ तो वो हैं जिनके डेढ़ दशक पहले नगर निगम की नौकरी में रहते हुए सिटी बस सेवा चालू नहीं हो सकी थी। ये सेवानिवृत्त अधिकारी लूट कमाई और कमीशनखोरी में तो माहिर हो सकते हैं लेकिन सिटी बस सेवा चलाना उनके बस की बात नहीं लगती।
यानी ई बसें भी कमीशनखोरी की भेंट चढऩे वाली नाकाम योजना साबित होने वाली है। रही बात जनता की तो उसे हाल फिलहाल ई सिटी बसों की सुविधा नहीं मिलती दिख रही है, लेकिन जैसा की अधिकारियों का दावा है कि फरवरी 2025 से पहले फरीदाबाद को 100 ई बसें दे दी जाएंगी उससे जनता की गाढ़ी कमाई का लुटना तो तय है।