मनीष आजाद ऐसी, कि एक तरफ से खंजर से हमला हो, दूसरी ओर से सिर पर कुल्हाड़ी का वार, हर तरफ से हर तरफ से लात-घूंसे, लाठियां और गालियां !!!
ये मौत, गणेश शंकर विद्यार्थी, को नसीब हुई थी। दंगों में मारे गए। गांधी ने ईष्र्या जताई। कहा कि मेरी भी मौत हो, तो ऐसी ही शानदार हो।
गणेश शंकर कानपुर के पत्रकार थे। कभी महावीर प्रसाद द्विवेदी के साथ सरस्वती में सहायक सम्पादक थे। फिर कानपुर आकर प्रताप नाम का अखबार निकाला। बड़ा नाम था अखबार का, और पत्रकार, लेखक, साहित्यकार के रूप में गणेश शंकर की खासी इज्जत थी। किसी को न छोड़ते।
एक बार लिखा- ‘हमें जानबूझकर मूर्ख नहीं बनना चाहिए। और गलत रास्ते नहीं अपनाने चाहिए। हिंदू राष्ट्र- हिंदू राष्ट्र चिल्लाने वाले भारी भूल कर रहे हैं। इन लोगों ने अभी तक राष्ट्र शब्द का अर्थ ही नहीं समझा है।
तो अगली बार लिखा- ऐसे लोग जो टर्की, काबुल, मक्का या जेद्दा का सपना देखते हैं, वे भी इसी तरह की भूल कर रहे हैं। टर्की, काबुल, मक्का या जेद्दा उनकी जन्मभूमि नहीं है। उनकी कब्रें इसी देश में बनेंगी। और अगर वे लायक होंगे तो उनके मरसिये भी इसी देश में गाए जाएंगे।’ जाहिर है, उनके दुश्मन हिन्दू थे, मुस्लिम भी।
अंग्रेज तो थे ही। लिखने के लिए कभी राजद्रोह लगा, कभी कुछ। मोतीलाल दौड़े आते मुकदमा लडऩे। कभी सजा से बचा लेते, कभी नही बचा पाते।
5 बार जेल गए गणेश शंकर… क्योकि वे लेखक थे, कांग्रेस के मेम्बर भी थे, और क्रांतिकारियों के खैरख्वाह भी। एक बार वांटेड क्रांतिकारी, अपनी प्रेस के गुप्त कमरे में, कई माह छुपाए रखा। जब पुलिस की दबिश होने वाली थी, उसे भगा दिया। एसपी को पता चला, उसने तलब किया।
पूछा- ऐसा क्यो किया तुमने??? गणेश शंकर विद्यार्थी ने कोई ना नुकुर नही की। सीधे कहा – वही किया जनाब, जो आयरलैंड में आप लोग करते हैं। साहब स्पीचलेस। वे आयरिश थे। और ब्रिटेन का आयरलैंड पर भी कब्जा था। आयरिश ब्रिटिश से वहां लड़ रहे थे।
तो ऐसे धाकड़ थे विद्यार्थी.. लाहौर में ब्याह के लिए परिवार वालो की जिद से बचकर भागे, भगतसिंह का पहला ठिकाना, गणेश शंकर विद्यार्थी की प्रेस थी। वहां 1924 में बलवंत के छद्म नाम से भगतसिंह, प्रताप में कॉलम लिखते रहे। प्रेस के दीगर काम भी करते। और यहीं से गणेश शंकर विद्यार्थी ने (सावरकर नही, जैसा संघी गप्पो में बताया जाता है) आजाद, अशफाक समेत तमाम ॥स्क्र्र के क्रांतिकारियों से भगत का सम्पर्क कराया।
कौन जानता था, की उनका भाग्य भगतसिंह से जुड़ा हुआ है। 25 मार्च 1931 को मौत बदी थी भगतसिंह की। लेकिन मौत से इंतजार हुआ नही। 23 की रात ही लाहौर मे गुपचुप फांसी लगा दी गयी। दंगेबाजो को बहाना चाहिए। कानपुर में हिन्दू मुस्लिम शुरू हो गया। गणेश शंकर से रहा नही गया। वे दंगाग्रस्त इलाको में घूमते रहे। 25 मार्च को सफेद कुर्ते में उनकी लाश मिली।
चश्मदीदों ने जो बताया, वह गांधी की लेखनी में यंग इंडिया में यूँ छपा – मैं नही जानता कि क्या गणेश शंकर विद्यार्थी का बलिदान बेकार गया? उनकी शख्सियत मुझे हमेशा प्रेरणा देती रही। मुझे उनके बलिदान से बड़ी ईष्र्या होती है। दुख की बात है, की यह देश और गणेश शंकर पैदा नही करता। उनके बाद यह शून्य भरने को कोई नही है।
गणेश की अहिँसा, शुद्ध अहिंसा थी। मेरी अहिंसा भी उसी दिन शुद्ध मानूंगा, जब सिर और कुल्हाड़े के वार से शांतिपूर्वक मरूं। मैं तो ऐसी मौत का स्वप्न देखता हूँ। क्या शानदार मौत होगी.. कि एक तरफ खंजर का वार आये, दूजी ओर कुल्हाड़ी। किसी और तरफ से लाठी का घाव हो। लात घूंसे गालियां चारो ओर से पड़ें। तब मुझमें साहस होगा, तो मैं अहिंसक और शांत बना रहूंगा। तभी मुझे हक होगा कि औरो से ऐसी अहिंसा की अपेक्षा करूँ।
और मर जाऊं, एक खुशनुमा मुस्कान के साथ। तभी मेरी अहिंसा शुद्ध और पूर्ण बनेगी। मैं ऐसे ऐसे अवसर की लालसा कर रहा हूं। और चाहता हूं कि हर कांग्रेसजन ऐसे अवसर की तलाश में रहें।
41 साल की उम्र में गणेश जान दे गए। पत्रकारिता का जो मानक वो स्थापित करके गए, वो आज भी इस प्रोफ़ेशन का शिखर माना जाता है। रही गांधी की। तो उनकी इच्छा अंग्रेजी राज में कभी पूरी न हो सकी। मगर आजाद भारत में, अपनी सरकार में, अपने लोगो ने, उनके ही धर्म के एक युवा ने, उन्हें शानदार मौत दी।
उनकी अहिंसा पूरी हुई।
पर मारने वालो का जी न भरा।
वे गंदे हाथ, गंदे पैर, गंदे ख्याल, दिल में ईष्र्या और हाथ मे फूल लेकर राजघाट पहुचते है। कसम दोहराने को… कि हर दिन, हर पल, गांधी को उनकी इच्छित मौत देंगे।
आज भी वे पहुचेंगे। आप उन्हें शानदार कपड़ो से पहचान सकते हैं।