फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सीवरेज और दूषित जल का प्रबंधन करने में अक्षम साबित हो चुके नगर निगम के भ्रष्ट अधिकारी अब इस जल को मिर्जापुर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) में ज्यादा शोधित कर इसे निर्माण कार्य और शौचालय में प्रयोग के लायक बनाने की योजना का नाटक कर रहे हैं। दरअसल, नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल के डंडे से बचने के लिए निकम्मे अधिकारी यह राग अलाप रहे हैं, इन्हें करना धरना कुछ नहीं है, हां ज्यादा जलशोधन के नाम पर मोटे बिल बना कर लूट कमाई की तैयारी जरूर है। नगर निगम के कार्यकारी अभियंता नितिन कादियान के मुताबिक मिर्जापुर एसटीपी की क्षमता 80 मिलियन लीटर डे (एमएलडी) है, लेकिन वर्तमान में यहां 41 एमएडी पानी ही शोधित किया जा रहा है। सुधी पाठक जानते ही होंगे कि पानी की स्वच्छता मापने वाले मानकों में बीओडी (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) प्रमुख है। जिस पानी का बीओडी 1-2 पीपीएम (पार्ट पर मिलियन) होता है उसे इस्तेमाल योग्य माना जाता है। पांच पीपीएम से दस पीपीएम वाला पानी प्रदूषित और किसी इस्तेमाल योग्य नहीं होता। मिर्जापुर एसटीपी के आंकड़ों के अनुसार यहां के शोधित पानी में 10 पीपीएम से अधिक बीओडी है। नितिन कादियान इसे पांच पीपीएम करने के दावे कर रहे हैं।
नगर निगम की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार शहर से 282 एमएलडी सीवेज निकलता है, इसके विपरीत सीवेज शोधन क्षमता केवल 92 एमएलडी ही है। यानी करीब 190 एमएलडी दूषित पानी सीधे ही यमुना नदी में डाला जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार मिर्जापुर एसटीपी की क्षमता 92 एमएलडी की है लेकिन अभी तक केवल 41 एमएलडी यानी आधी क्षमता से भी कम काम किया जा रहा है। इसका कारण निगम अधिकारी नहीं बताते क्योंकि उनकी हरामखोरी, भ्रष्टाचार और निकम्मापन सामने आ जाएगा। अमृत योजना के तहत मिर्जापुर एसटीपी को अपग्रेड करने का काम सितंबर 2018 में शुरू किया गया था।
जीरो टॉलरेंस वाले खट्टर के भ्रष्ट अधिकारियों के कारण यह एसटीपी आज तक पूर्ण क्षमता से नहीं चल सका है। इसके शोधित पानी को आगरा कैनाल में छोडऩे के लिए मेन पंपिंग स्टेशन (एमपीएस) भी 2021 से बनकर बेकार पड़ा है। हरामखोर और निकम्मे अधिकारियों को आज तक उत्तर प्रदेश सरकार ने केवल इसलिए अनुमति नहीं दी सीवेज का शोधन नाममात्र का ही है। जाहिर है उत्तर प्रदेश सरकार अपनी नहर में इनका सीवर क्यों ढोने लगी। एमपीएस नहीं चलने के कारण ही यह एसटीपी पूर्ण क्षमता से काम नहीं कर पा रहा और जनता का करीब अस्सी करोड़ रुपया बेकार हो गया।
नितिन कादियान बीओडी पांच पीपीएम करने का दावा तो कर रहे हैं लेकिन उन्हें भी मालूम है कि यह मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। वजह, नगर निगम की ऑडिट रिपोर्ट में ही बताया गया है कि मिर्जापुर एसटीपी घरेलू दूषित जल का ट्रीटमेंट करने के लिए ही बना है लेकिन इसमें शहर के उद्योगों से बहाया जाने वाला रासायनिक तरल कचरा भी डाला जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक उद्योगों से निकलने वाले दूषित रासायनिक जल को शोधित करने के लिए शहर में आठ एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) और कॉमन एफ़्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट(सीईटीपी) हैं। इनकी क्षमता 339.21 एमएलडी है जबकि निकलता 382.17 एमएलडी है यानी रोजाना 42.96 मिलियन लीटर दूषित रसायनिक जल नालियों के जरिए बहा दिया जाता है जो एसटीपी पहुंचता है। जाहिर है कि मिर्जापुर एसटीपी में भी फैक्टरियों का दूषित जल पहुंचता है। ऐसे में इसको शोधित कर निर्माण या शौचालय में इस्तेमाल योग्य बनाने की कोई व्यवस्था फिलहाल इनमें नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल यह कि शोधित पानी क्या शौचालयों में बाल्टियों से पहुंचाया जाएगा क्योंकि नगर निगम ने इसके लिए अलग से तो कोई पाइप लाइन बिछाई ही नहीं है। यहां बताने वाली बात यह है कि एसटीपी के शोधित पानी पीने योग्य नहीं होता, यानी शोधित पानी पेयजल आपूर्ति वाली पाइप लाइन मेें नहीं डाला जा सकता, अतिरिक्त पाइपलाइन तो कोई है नहीं तो शौचालयों में पानी पहुंचाना सिर्फ जुमलेबाजी ही है।
पाठकों को बता दें कि अमृत योजना के तहत एसटीपी से मेन पंपिंग स्टेशनों तक जाने वाली 5402 मीटर पाइप लाइन भी आज तक नहीं डाली जा सकी है, जो बहुत जरूरी है तो फिर शौचालयों को जलापूर्ति के लिए पाइन लाइन डाले जाने का सवाल ही नहीं उठता।
मोदी-खट्टर-सैनी के काम नहीं काम का ढिंढोरा पीटने के गुर नगर निगम के निकम्मे अधिकारियों ने सीख तो पहले ही रखे थे लेकिन इन सरकारों में उन्हें मान्यता और प्रोत्साहन भी मिल रहा है। सूत्रों के मुताबिक हाल ही में एनजीटी ने दूषित पानी यमुना नदी में छोड़े जाने पर नगर निगम और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को लताड़ लगाई थी। रविवार को सीएम सैनी ने भी शहर की जल निकासी, शोधन आदि की जानकारी लेकर खराब हालात पर चिंता जताई थी। निगम के अधिकारी भी जानते हैं कि हालात सुधरने वाले नहीं हैं ऐसे में जनता को वरगलाने वाले बयान जारी कर सब कुछ अच्छा होने का अहसास दिलाने का खेल खेलते हैं। जनता सवाल नहीं करती तो सरकार भी खाओ और खाने दो की नीति का पालन करते हुए अधिकारियों पर मेहरबानी करती रहती है।