आज से ठीक 425 वर्ष पहले, 17 फऱवरी सन् 1600 को, अपने विश्वासों के लिए क़ुर्बान होने वाले महान वैज्ञानिक जियोर्दानो ब्रूनो को रोम में प्राणदंड दिया गया था। जियोर्दानो ब्रूनो 16वीं सदी के प्रसिद्ध इटेलियन दार्शनिक, खगोलशास्त्री, गणितज्ञ और कवि थे। उन्होंने खगोल वैज्ञानिक निकोलस कोपरनिकस के विचारों का समर्थन किया था। निकोलस कोपरनिकस का मानना था कि ‘ब्रह्माण्ड का केंद्र पृथ्वी नहीं, सूर्य है।’
उस समय तक चर्च द्वारा ये बातें प्रचारित की गई थीं कि ‘ब्रह्मांड के केन्द्र में पृथ्वी है, पृथ्वी के केंद्र में रोम है, रोम के केन्द्र में चर्च है और चर्च के केन्द्र में पादरी है।’ इस तरह की बातें चर्च और शासक दोनों को फायदा पहुँचाती थीं। ब्रूनो ने निकोलस कोपरनिकस के विचारों का समर्थन करते हुए कहा – ‘आकाश सिर्फ उतना नहीं है, जितना हमें दिखाई देता है। वह अनंत है और उसमें असंख्य विश्व हैं।’ इसके अलावा ब्रूनो मानते थे कि ‘हर तारे का वैसा ही अपना परिवार होता है जैसा कि हमारा सौर परिवार है। सूर्य की तरह ही हर तारा अपने परिवार का केंद्र होता है। साथ ही इस ब्रह्मांड में अनगिनत ब्रह्मांड हैं। ब्रह्मांड अनंत और अथाह है।’ ब्रूनो का मत था कि – ‘धरती ही नहीं, सूर्य भी अपने अक्ष पर घूमता है।’
ब्रूनो के ये विचार बाइबिल, चर्च और शासक को चुनौती देते थे और जनता को वैज्ञानिक चेतना पर खड़े करते थे। इसलिए चर्च द्वारा इन विचारों और ब्रूनो का विरोध लाजमी था। जियोर्दानो ब्रूनो बड़े निर्भीक और क्रांतिकारी विचार वाले थे। चर्च के पादरियों का विरोध भी उन्हें डरा ना सका। ब्रूनो जीवन भर चर्च की कठोर यातनाएँ सहते हुए एक देश से दूसरे देश में पनाह लेते रहे। उन्होंने अपने जीवनकाल के लगभग 8 वर्ष जेल में बिताए मगर उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। उन्हें हारता ना देखकर 17 फरवरी, सन् 1600 ई. को धर्म के ठेकेदारों (तत्कालीन पोप और चर्च के पादरियों) ने खुलेआम, रोम में भरे चौराहे पर ब्रूनो को खंभे से बांधकर जिंदा जलाने की सजा सुनाई। और उनके आदेश का पालन किया गया। ब्रूनो खत्म हो गया।
ब्रूनो ने हँसते हुए आग में जलना स्वीकार किया। लेकिन वे अपने तथ्यों और निष्कर्षों पर अडिग रहे। उनके चेहरे पर डर या पश्चाताप का कोई अहसास नहीं था। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि एक ना एक दिन ऐसा अवश्य आएगा जब पूरी दुनिया उनकी खोज को सत्य मानेगी। ब्रूनो के जीवनकाल में ये तथ्य लोगों को समझ में नहीं आया और उनका पुरजोर विरोध हुआ। लेकिन उनकी निर्मम हत्या के बाद भी गैलीलियो, केप्लर और उसके बाद आने वाले वैज्ञानिकों ने ब्रूनो के सिद्धांतो के अध्ययन के आधार पर अपनी खोजों को जारी रखा। धर्म के ठेकेदारों के तमाम दावों के बावजूद आखिरकार ब्रूनो की कई बातें बाद में सही साबित हुई। और इस तरह अंतत: ब्रूनो की जीत हुई। साभार : विकिपीडिया से (कुछ संशोधनों के साथ)