‘जाति प्रश्न’ पर माक्र्सवादी नज़रिया

‘जाति प्रश्न’ पर माक्र्सवादी नज़रिया
May 26 08:28 2024

रंगनायकम्मा
‘नीची’ जातियों के पास उत्पादन के साधन नहीं हैं। सिफऱ् ‘ऊंची’ जातियों के पास ही वे मौजूद हैं। उनमें से भी, बहुत ही थोड़े से लोगों के पास ही, आज उत्पादन के साधन बचे हैं, ‘नीची’ जातियों के अधिकतर लोगों को, नीचे स्तर के शारीरिक श्रम वाले काम, उनमें भी कई तरह के गंदे काम; कम गंदे और ज्यादा गंदे, दोनों तरह के काम करने पड़ते हैं। ‘ऊंची’ जातियों के, जो लोग भी काम पर लगे हुए हैं, उनमें अधिकतर ऊंचे स्तर के शारीरिक श्रम वाले काम अथवा मानसिक श्रम वाले काम करते हैं।

यही वजह है कि ऐसे समाज में जाति का प्रश्न एक तरह से ही हल हो सकता है; ‘ऊंची’ जातियों के लोगों का, उत्पादन के साधनों पर से, निजी संपत्ति का अधिकार समाप्त कर दिया जाए और पुराने श्रम विभाजन को बदल डाला जाए, उत्पादन के साधनों पर से निजी स्वामित्व के अधिकार के खात्मे से, वह परिस्थिति, जिसमें ‘ऊंची’ जाति के लोग, ‘नीची’ जाति के लोगों के मालिक बन बैठते हैं, समाप्त हो जाएगी। ‘ऊंची’ जातियों के, उन लोगों को भी श्रम करना पड़ेगा, जो आज श्रम नहीं करते।

पुराना श्रम विभाजन समाप्त हो जाने के बाद, ‘ऊंची’ जाति के लोगों को शारीरिक श्रम वाले काम, और ‘नीची’ जाति के लोगों को मानसिक श्रम वाले काम करने का अवसर मिलेगा। इसलिए श्रम विभाजन को इस तरह बदला जाना चाहिए कि हर एक व्यक्ति, समाज को चलाने के लिए आवश्यक, कुछ शारीरिक श्रम वाले काम, जिनमें कम गंदे और अधिक गंदे दोनों शामिल हैं, तथा कुछ मानसिक श्रम वाले काम करे। अधिरचानात्मक बदलाव, जैसे अंतरजातीय विवाह भी इसमें अपनी भूमिका निभाएंगे, लेकिन अंतरजातीय विवाह भी तब तक चलन में नहीं आ सकते, जब तक संपत्ति-संबंधों तथा श्रम-विभाजन को आमूलचूल रूप से बदल नहीं दिया जाता।

इनमें कोई भी बात ले लीजिए; वर्ग-संघर्ष ही है। ये कहना कि ‘नीची’ जाति के भूमिहीन लोगों को जमीन चाहिए; वर्ग-संघर्ष ही है। ये कहना की ‘नीची’ जातियों को, जिन्हें हमेशा शारीरिक श्रम वाले काम करने पड़ते हैं, उन्हें भी मानसिक श्रम वाले काम करने का अवसर मिलना चाहिए; वर्ग-संघर्ष ही है। जाति-भेद का मूल आधार वर्ग-भेद ही है। इसीलिए जाति-उन्मूलन, वर्ग-संघर्ष से ही संभव है। अगर हम वर्ग-संघर्ष को अच्छी तरह नहीं समझते, तो दूसरा कोई ऐसा ज़रिया मौजूद नहीं है जिससे जातियां समाप्त हो जाएं, अगर वर्ग- संघर्ष मौजूद नहीं है, तो ‘नीची’ जातियां हमेशा उन ‘मालिकों’ की गुलाम बनी रहेंगी, जिन्होंने उत्पादन के साधनों पर क़ब्ज़ा जमाया हुआ है, और हमेशा शारीरिक श्रम वाले काम ही करती रहेंगी।

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Mazdoor Morcha
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