डॉ. रामवीर कबूतर और कबूतरबाजी में फर्क होता है, इवेंट और इवेंटबाजी में भी। आवश्यकतानुसार यथासमय इवेंट होना स्वाभाविक है, पर हर इवेंट को आत्मप्रचार और मिथ्या आत्मश्रेष्ठता प्रदर्शन के अवसर में बदल देना एक तरह का भोंड़ापन कहा जा सकता है। मुकेश अम्बानी के बेटे की शादी की हर रश्म का टीवी चैनल्स पर महीनों छाए रहना विचारशील नागरिकों को उबाऊ लगा पर आज देश में गांधी जी की गलतियां सुधारने की मुहिम चल रही है लिहाजा उनके सादा जीवन उच्च विचार नारे को आडम्बरपूर्ण जीवन और निम्न विचार में बदला जा रहा है।
शादियां भव्य होती जा रही हैं और रिश्ते जर्जर। 24 नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के शपथ समारोह में सात देशों के मुख्य न्यायाधीशों को पहली बार बुलाया गया है और इसे मीडिया में ऐसे दिखाया गया जैसे देखो मोदीजी ने वह कर दिखाया जो पहले कोई नहीं कर पाया। क्या सात विदेशी मुख्य न्यायाधीशों की उपस्थिति में शपथ लेने वाला मुख्य न्यायाधीश पहले वालों से बेहतर न्याय करेगा? ध्यातव्य है कि आज न्यायाधीशों की निष्पक्षता सन्दिग्धता के जिस स्तर पर है उतनी कभी नहीं रही। न्यायपालिका से जनता के उठते विश्वास को रोकना प्राथमिकता होनी चाहिए, विदेशी मेहमानों को न्योतने जैसे ढमढमे नहीं।
अगले ही दिन 25 नवम्बर को अयोध्या में राममन्दिर के ध्वजारोहण पर जो इवेंटबाजी हुई वह तो बेमिसाल है। राममन्दिर बन गया इतना काफी नहीं है, मन्दिर को किश्तों में भुनाना है, पहले भूमिपूजन पर फिर प्राणप्रतिष्ठा और अब ध्वजारोहण। आगे और धार्मिक विधि विधान खोज लिए जाएंगे।भक्तों की बात और है, एक तटस्थ नागरिक समझ सकता है कि ये सब इवेंट्स चुनाव की भूमिका की तरह होते हैं। भाजपा अन्य दलों से इस रूप में भिन्न है कि जहां अन्य दल चुनाव से साल छह महीने पहले ही चुनाव की तैयारी में लगते हैं वहां भाजपा चुनावी मोड से निकलती ही नहीं, उसका हर काम चुनाव पर नजर रखते हुए ही होता है। बीजेपी सीइएमपी(कोंस्टैंट इलेक्शन मोड पार्टी) है। भाजपा के कार्यकाल में किसी चीज की कमी हो जाए इवेंट्स की कमी नहीं होगी। रोमन कवि जुवेनल ने ब्रेड एंड सर्कस की जो जुगत बताई थी उसे ही मोदीजी ब्रेड एंड इवेंट्स में बदल कर बरत रहे हैं। ब्रेड माने अस्सी करोड़ को पांच किलो राशन और सर्कस माने इवेंट।