आशुतोष कुमार 28 दिनों तक पांव पैदल पहाड़ नापते हुए उन्होंने सरहद पार की और जान बचाई। इस फिल्म के सभी कलाकार तरह-तरह के प्रतिबंधों और मुकदमों का सामना कर रहे हैं। दो प्रमुख अभिनेत्रियां निर्देशक की मदद से खुद भी यूरोप में शरण ले चुकी हैं। इस फिल्म से जुड़े तमाम लोगों पर देशद्रोह जैसे गंभीर आरोप हैं और उनका भविष्य अनिश्चित है। फिल्म खुफिया ढंग से बनाई गई। बहुत कम सामान के साथ। मद्धम रौशनी में। गिने चुने कलाकारों और सहायकों के साथ। निर्देशक ने नकली नाम से लिए गए ब्रॉडबैंड कनेक्शन के जरिए अपने घर से ही इस फिल्म का निर्देशन किया। शूटिंग स्थल पर एक नकली स्क्रिप्ट हमेशा तैयार रहती थी कि सरकारी छापा पडऩे पर दिखाई जा सके।
लेकिन यह फिल्म बनी और दुनिया भर में छा गई। इसे ढेरों पुरस्कार मिले। एक धर्म राज्य कैसे काम करता है? वह अपने नागरिकों के व्यक्तित्व पर उनकी जिंदगी को किस तरह तबाह करता है? अगर आपकी दिलचस्पी इन सवालों में हो तो आपको यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए। जबरन हिजाब पहनने के खिलाफ लड़कियों का प्रतिरोधी आंदोलन ईरान में सन 2022 से चल रहा है। इन लड़कियों ने चौराहों पर बार-बार हिजाब की होली जलाई है, जुलूस निकाला है, नारेबाजी की है, नाचा गाया है। उन्होंने लाठियां और गोलियों की बौछार झेली है। उन्हें जेल में ठूंसा गया है। उन्होंने शहादतें दी हैं। उन का निर्मम और निर्लज्ज दमन आज तक जारी है। लेकिन आज ईरान में बिना हिजाब पहने लड़कियां हर तरफ घूमती दिखाई देती हैं। अब इसे लगभग सामान्य मान लिया गया है। सत्ता जितनी क्रूर होती है,उतना ही बहादुराना प्रतिरोध पैदा करती है। प्रतिरोध को कुचला जा सकता है, लेकिन हमेशा के लिए कभी कुचला नहीं जा सकता। अगर ईरान में चले इस आंदोलन के जज्बे और उसके विराट आकार को भी आप जानना समझना चाहती हैं तो इस फिल्म को देखिए।
आंदोलन इस फिल्म की पृष्ठभूमि है। वह इसका मुख्य विषय नहीं है। मुख्य विषय है धर्मराज्य या थियोक्रेसी का पाखंडी, अनैतिक षड्यंत्रकारी और दमनकारी रूप। ऐसा राज्य अपने बड़े से बड़े सिपहसालार तक को अपनी आत्मा का सौदा करने के लिए मजबूर करता है। इस फिल्म के केंद्र में इन्वेस्टिगेशन जज का एक किरदार है जो अपने पद और अपनी जान की रक्षा करने के लिए सरकारी इशारे पर बेगुनाह लोगों को सजा ए मौत देने तक के लिए मजबूर होता है। लेकिन अपने जिस परिवार की सुख सुविधा के लिए वह यह सब करता है, वह परिवार खुद ही राज्य की तरह एक दमनकारी षड्यंत्रकारी निकाय में बदल जाता है, जिसके खिलाफ इस परिवार के युवा सदस्य बगावत करने पर उतारू हो जाते हैं।
इस फिल्म का नाम है :- सीड ऑफ द सेक्रेड फिग। यानी पवित्र पीपल का बीज। चिडिय़ों की विष्ठा में छुपा हुआ पीपल का बीज जब किसी पेड़ की डाल पर गिरता है, इस डाल पर उसकी जड़े उगने शुरू हो जाती हैं। यह जड़ें बढ़ाते हुए धरती में धंस जाती हैं और धीरे-धीरे पीपल का पेड़ अपने आश्रयदाता पेड़ को निगल कर खुद को स्थापित कर लेता है। फिल्म सधी हुई है। इतनी रोमांचक है कि आप अपनी सीट से हिल नहीं सकतीं। इसे अमेजॉन प्राइम पर देखा जा सकता है। इसके निर्देशक हैं मोहम्मद रसूलअफ़। इस चित्र में निर्देशक अपने दो प्रमुख कलाकारों की तस्वीर हाथ में लिए कुछ और कलाकारों के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। ये सभी महान कलाकार हैं। बहादुर हैं। विद्रोही हैं। सलाम बनता है।