डॉ रामवीर
इंसान कहां है इंसान मत खुलवाओ जुबान इंसान असल में कुत्ता है टुकड़े फेंको तो दुम हिलाता है उलटा लेट कर पेट दिखाता है कह लो इसे वफादारी पर है यह मक्कारी जो किसी एक की खा कर अन्य सबको काट खाने को हो तैयार वह होगा मालिक का फ़र्माबरदार पर उसे कैसे कहें समझदार जो आदमी ले कर किसी से सुपारी हर ले निर्दोष के प्राण तुम्ही बताओ वह इंसान है या श्वान
छोड़ो नहीं समझे तो समझ लो इंसान असल में गधा है हर वक्त बोझ से लदा है इंसान और गधा बस दोनों का रहन सहन और खान-पान ही जुदा है दोनों की किस्मत में यही बदा है कि ढोते रहोगे बोझ जब तक हो जिंदा बस एक ही है फर्क भारवहन गधे की मजबूरी है पर इंसान का यह शौक है कोई भी पद हो सहर्ष तैयार है ढोने को पदभार भारवहन क्षमता में गधा भी जाता है इंसान से हार एक और फाइनर प्वाइंट कि बूढ़ा गधा अधिक भार ढोने से बचता है पर बुढियाता मानव-गर्दभ लद्दी जा लद्दी जा रटता है पांव भले कब्र में हों गले में मालाएं डलवा बड़े बड़े पदों के भारी भार को ढोते हुए मंद मंद मुस्कुराता है भारवहन में गधे से बढ़ कर है यह सगर्व जताता है
यह भी नहीं जमी तो और सुनो इंसान है उल्लू कभी नहीं पकड़ता अक्ल का पल्लू उल्लू की ही तरह इसे भी अखरता है प्रकाश यह भी खुश है रह कर अंधेरे में अपने अपने मजहब ओ तहजीब के घेरे में बंद कर अक्ल की खिड़कियां खुश है स्वनिर्मित तमोमय बसेरे में
‘हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी फरमाते हैं जनाब निदा फाजली शायद वे संकुचा गए कहने से लो मैं कह देता हूं हर आदमी में होते हैं दस बीस जानवर कुत्ता गधा उल्लू या बंदर सभी तो हैं मौजूद आदमी के अंदर संक्षेपार्थ तीन का ही वर्णन किया है लंबी कविता सुनना हर श्रोता के बस की बात नहीं इसलिए मजबूरी में विराम लिया है वैसे मुझे करना तो था सिद्ध इंसान इंसान नहीं यह है गिद्ध यह मरों को भी खा सकता है शहीद स्मारक के चंदे से भी अपनी कोठी बनवा सकता है इंसान की पशुता की कहानी बहुत पुरानी है वेदमन्त्र ‘उलूकयातं शुशुलूकयातंं जहि श्वयातमुत… गृध्रयातुुंं…’ ने भी यही बखानी है।