इलेक्ट्रिक बस डिपो : जनता के धन की बर्बादी का एक और प्रोजेक्ट

इलेक्ट्रिक बस डिपो : जनता के धन की बर्बादी का एक और प्रोजेक्ट
April 30 16:58 2025

फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) जनता के सामने अपने एक विकास कार्य की नुमाइश करने के लिए छटपटा रही भाजपाई सैनी सरकार बिना आधारभूत ढांचे के ही ई बस प्रोजेक्ट बनाने में जुटी है। करीब दो साल से लटके इलेक्ट्रिक बस डिपो के लिए आवश्यक दस एकड़ जमीन तो मिल गई है लेकिन जो हाल हैं उससे तो लगता है कि मंझावली पुल, बल्लबगढ़ का सोहना रेलवे ओवरब्रिज, राजा नाहर सिंह स्टेडियम आदि प्रोजेक्टों की तरह ही यह ई बस डिपो भी जनता के धन की बर्बादी और अपर्याप्त सुविधाओं वाला प्रोजेक्ट बनकर रहने वाला है।

एफएमडीए के मुख्य जिला नगर योजनाकार विभाग के सलाहकार सुधीर चौहान ने उत्साहपूर्वक दावा किया है कि सेक्टर 61 में जल्द ही ई बस डिपो बनाया जाएगा क्योंकि हूडा ने दस एकड़ जमीन हस्तांतरित कर दी है। डिपो बन कर तैयार होने पर इसमें पांच सौ बसें खड़ी की जा सकेंगी। सुधी पाठकों को बताते चलें कि डिपो में केवल ई बसें खड़ी करने से आम जनता को सुविधाएं नहीं मिलने लगेंगी। ई बसों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है चार्जिंग स्टेशन, फीडर लाइन व अन्य आधारभूत सुविधाएं।

समझने वाली बात यह है कि अभी सिर्फ दस एकड़ जमीन मिली है। डिपो तक बसों के पहुुंचने के लिए कनेक्टिंग रोड, बिजली फीडर, चार्जिंग स्टेशन आदि आधारभूत ढांचा स्थापित करने की आवश्यकता है। भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार चार्जिंग स्टेशन के लिए खर्च होने वाले सात करोड़ रुपये केंद्र सरकार को देने हैं। बीते वर्ष अप्रैल में एफएमडीए की तत्कालीन सीईओ गरिमा मित्तल ने सात करोड़ का प्रस्ताव बना कर केंद्र सरकार को भेजा था लेकिन वहां से आज तक कोई बजट नहीं मिला है। समझा जा सकता है कि बिना चार्जिंग स्टेशन के ई बसें लोहे-टिन का डिब्बा ही रह जाएंगी। यदि चार्जिंग स्टेशन सहित अन्य आधारभूत सुविधाएं बना भी ली गईं तो भी इतनी बसें सड़क पर तब तक नहीं उतर पाएंगी जब तक उनके लिए पर्याप्त मात्रा में ड्राइवर-कंडक्टर व अन्य स्टाफ की व्यवस्था नहीं होगी। रोडवेज मामलों के जानकारों के अनुसार एक बस के लिए डेढ़ ड्राइवर और डेढ़ कंडक्टर के अनुपात में तैनाती की जाती है। इस आधार पर सौ बसों के लिए 150 कंडक्टर, 150 ड्राइवरों की आवश्यकता होगी। एफएमडीए ने ड्राइवरों की भर्ती के लिए क्या किया है इस पर सलाहकार महोदय चुप हैं। ई बसें चलाने के लिए ड्राइवरों को विशेष ट्रेनिंग भी दी जाती है लेकिन यह तो तब होगा जब भर्ती की जाएगी।
डिपो में चार्जिंग स्टेशन के साथ बसों की मरम्मत और रखरखाव के लिए आधुनिक वर्कशॉप और पार्किंग एरिया के लिए भी काफी बड़ी जगह चाहिए। बुजुर्ग समाजसेवी सुरेश चंद गोयल कहते हैं कि वर्ष 2031 तक फरीदाबाद में 595 ई बसें चलने का अनुमान रखा गया है। छह सौ बसों के लिए दस प्रतिशत यानी साठ चार्जिंग पोर्ट लगाए जाएंगे, यानी इसके लिए बड़ा और मजबूत आधारभूत ढांचा चाहिए होगा।

सबसे बड़ी समस्या ई बसों के चलने के लायक सड़कों का न होना। जानकारों के अनुसार अव्वल तो एफएमडीए आज तक सिटी बसों के लिए रूट ही फाइनल नहीं कर सका है, दूसरे जनता की मांग और यात्रियों के आधार पर जो रूट बनाए जा सकते हैं उनमें से अधिकतर की सड़कें ई बसें चलने लायक नहीं हैं। यानी एफएमडीए के सलाहकार महोदय जिस आधे अधूरे से बनने वाले ई बस डिपो का उत्साहपूर्वक ढिंढोरा बजा रहे हैं वह ढेर सारी कमियों को देखते हुए हाल फिलहाल तो क्या इस साल भी बनता और चलता नजर नहीं आ रहा। भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार पहले यह प्रोजेक्ट पचास एकड़ में बनाया जाना प्रस्तावित था लेकिन इतनी जमीन ही उपलब्ध नहीं थी तो दस एकड़ का प्रोजेक्ट बनाया गया। जानकारों का मानना है कि पचास एकड़ जमीन को बस डिपो के नाम पर कब्जा कर बाद में मॉल आदि बनाकर बेचने का खेल किया जाता। जिस तरह बल्लबगढ़ बस अड्डे की 17 एकड़ जमीन में अब मॉल बनाने की घोषणा की गई है उसी तरह सिटी ई बस डिपो भी थोड़े से क्षेत्र में संचालित किया जाता और बाकी जमीन की बंदरबांट की जाती।

सूत्र बताते हैं कि दरअसल स्थानीय शहरी निकाय मुख्यालय में बैठे बड़े पेट वाले अधिकारी गुडग़ांव और फरीदाबाद के लिए सौ-सौ बसें खरीदने की जल्दबाजी में हैं। बस की कीमत एक करोड़ 80 लाख से दो करोड़ 25 लाख के बीच बताई जाती है। यानी करीब पौने दो सौ करोड़ से सवा दो सौ करोड़ रुपयों का सौदा है, इसमें अच्छा खासा नजराना मिलने की लालसा तो है ही। बसें खरीद ली जाएंगी इसके बाद ये चलें या न चलें, कबाड़ हो जाएं, इनकी बला से। दो दशक पहले जेएनयूआरएम के तहत खरीदी गईं दो सौ बसें भी खड़े-खड़े ही कबाड़ हो गई थीं। जनता तो ऑटो पर पहले से सफर कर रही है आगे भी करती रहेगी। यानी अधिकारियों की खुशी के लिए प्रोजेक्ट का खेल किया जा रहा है। इसी में सबका फायदा है, छोटा ही सही बस डिपो बन जाने से सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाने लायक हो जाएगी। नेता अपने चहेतों को निर्माण आदि का ठेका दिलाएंगे और कमीशन सबके बीच बंटेगा, यानी नेता भी खुश अधिकारी भी, ठेकेदार भी और सरकार भी।

ड्राइवर-कंडक्टर कम लेकिन बढ़ाई जा रही बसें
फरीदाबाद बस डिपो के बेड़े में बीते सोमवार पांच नई बसें शामिल की गईं। इनके साथ डिपो में बसों की संख्या बढ़कर 163 हो गई हैं। बसें तो बढ़ाई जा रही हैं लेकिन इसके अनुपात मेें आवश्यक स्टाफ में कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गई है। रोडवेज मामलों के जानकारों के अनुसार 163 बसों के लिए 242 ड्राइवर और 242 ही कंडक्टर की तैनाती आवश्यक है। इसके अलावा ड्यूटी इंचार्ज, क्लर्क, हेड क्लर्क आदि की तैनाती जरूरी है। 163 बसें चलाने के लिए डिपो में महज 148 ड्राइवर हैं जबकि 194 परिचालक हैं। यानी डिपो में पंद्रह बसें तो बिना ड्राइवर के खड़ी रहती हैं और बाकी 148 बसों को एक-एक ड्राइवर से ही चलवाया जा रहा है। मानक के अनुसार 242 चालक और इतने ही परिचालक होने चाहिए ताकि बसों का अधिकतम इस्तेमाल कर कमाई भी बढ़ाई जा सके और यात्रियों को सहूलियत भी मुहैया कराई जाए। समझने वाली बात यह है कि ये सभी बसें बंद पड़े लंबे रूट यानी बारह घंटे या उससे अधिक सफर वाले रूट पर चलाई जाएंगी, यानी इन पर दो-दो ड्राइवर और कंडक्टर तैनात किए जाएंगे। इसका अर्थ यह हुआ कि चालकों के अभाव में कुछ और बसें खड़ी रह जाएंगी।

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Mazdoor Morcha
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