फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) स्वच्छ भारत अभियान के तहत हर साल स्वच्छता सर्वेक्षण का पाखंड किया जाता है। टीम द्वारा किए गए सर्वेक्षण और जनता के फीडबैक के आधार पर शहरों की स्वच्छता रैंकिंग तय होती है। यह पाखंड एक बार फिर किया जा रहा है, नगर निगम के हरामखोर और कामचोर अधिकारियों की इसमें कोई रुचि नहीं है, इसलिए फीडबैक की औपचारिकताएं की जा रही हैं। करीब बीस लाख आबादी वाले शहर में अभी तक केवल 20-22 लोगों ने ही फीडबैक दिया है। नगर निगम के अधिकारी और कर्मचारियों के परिवार के सदस्यों की संख्या ही एक हजार से ज्यादा होगी। समझा जा सकता है कि बीते कई साल से स्वच्छता में फिसड्डी साबित रहने वाले निगम के अधिकारी रैंकिंग सुधारने के प्रति कितनी गंभीरता से काम कर रहे हैं।
पिछली सरकारों द्वारा चलाए गए कार्यक्रम, मिशन का नाम बदल कर श्रेय लेने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन का नाम बदल कर स्वच्छ भारत मिशन कर दिया और खुले में शौच मुक्त, कचरा मुक्त शहर, गोबर मुक्त सड़कें और न जाने क्या क्या जुमले उछाले। चीन की कंपनी ईकोग्रीन और संघी अग्रवाल परिवारों पर कचरा प्रबंधन के नाम पर अरबों रुपये लुटा दिए लेकिन गंदगी और कचरे के ढेर लगते चले गए। स्वच्छ भारत के साथ ही मोदी ने स्वच्छता सर्वेक्षण का भी ड्रामा शुरू किया था, जिसमें जनता से फीडबैक लिया जाता है।
नगर निगम के हरामखोर और निकम्मे अधिकारी जानते हैं कि यदि फीडबैक सिस्टम शुरू किया गया तो उसमें शिकायतों का अंबार ही लग जाएगा, इसलिए यह व्यवस्था केवल तब ही शुरू की जाती है जब कोई टीम स्वच्छता सर्वेक्षण करने आने वाली होती है। उस समय भी फीडबैक देने वाले स्वच्छता पोर्टल या एप का प्रचार प्रसार नहीं किया जाता, क्योंकि उन्हें मालूम है कि नब्बे फीसदी जनता नकारात्मक फीडबैक ही देने वाली है। अधिकारी और कर्मचारी अपने परिवार वालों और दोस्त-रिश्तेदारों से ही फीडबैक डलवा कर बचाव करते हैं।
नगर निगम सूत्रों के अनुसार अब स्वच्छता सर्वेक्षण टीम आने वाली है, इसलिए एक बार फिर फीडबैक का नाटक किया जा रहा है। लेकिन इस बार निगम के अधिकारियों को सकारात्मक फीडबैक देने वाले मिल ही नहीं रहे हैं। दरअसल सर्वेक्षण में जो सवाल पूछे गए हैं उनका जवाब शायद ही कोई सकारात्मक देगा। हालांकि ईकोग्रीन कंपनी को दोबारा काम दे दिया गया है लेकिन अधिकतर इलाकों खासकर कॉलोनियों में डोर टू डोर कूड़ा उठाने का काम कंपनी नहीं करती। अब कचरा गाड़ी गली के कोने पर आकर खड़ी हो जाती है और लोगों को खुद कूड़़ा ले जाकर उसमें डालना पड़ता है। यह कचरा गाड़ी रोजाना नहीं आती। प्रमुख सड़कों पर तो इक्का-दुक्का सफाईकर्मी झाड़ू लगाते दिख जाते हैं लेकिन गलियों में शायद ही कभी आते हों। सफाई नहीं होने के कारण अधिकतर मोहल्लों खासकर कॉलोनियों में गली के नुक्कड़ पर बदबू वाले कचरे के ढेर नजर आ जाएंगे। ईकोग्रीन के वाहन वाले को गीला-सूखा कचरा अलग रखने से ज्यादा कबाड़ तलाशने में दिलचस्पी रहती है, भले ही घर पर सूखा-गीला कचरा अलग रखा गया हो, कंपनी के वाहन में तो सब एक ही जगह डाले जाते हैं।
नगर निगम के निकम्मे अधिकारी अपने एसी रूम से निकलने को राजी नहीं तो खत्तो का डंपिंग यार्ड के हाल जानने कैसे निकलेंगे। सार्वजनिक शौचालयों की कभी सफाई ही नहीं होती, सफाई करने से बचने के लिए अधिकतर शौचालयों पर ताले डाल रखे हैं, न इस्तेमाल होंगे न गंदे, आम जनता खुले में पेशाब करे या शौच निगम अधिकारियों को कोई लेना देना नहीं। इतनी समस्याएं होने के बाद कोई जागरूक नागरिक तो सकारात्मक फीडबैक देने से रहा। खुद को केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गूजर का ‘बेटाÓ बताने वाला नगर स्वास्थ्य अधिकारी ओमदत्त यह तो कहता है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को फीडबैक देना चाहिए लेकिन वह यह नहीं बताता कि उसने फीडबैक लेने के लिए कितना प्रचार-प्रसार किया। जब किसी को पता ही नहीं होगा तो खाक फीडबैक दिया जाएगा। निगम के अधिकारी कहते हैं कि फीडबैक इसलिए नहीं लिया जाता कि यदि निगेटिव हुआ तो रैंकिंग बहुत नीचे चली जाएगी, ऐसे सर्वेक्षण टीम को ‘राजीÓ कर खराब रैंकिंग से बचा लिया जाता है।