फऱीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस का ढिंढोरा पीटने वाले पूर्व सीएम खट्टर द्वारा विधानसभा चुनाव की घोषणा से ठीक पहले गरीब वोटरों को लुभाने के लिए शुरू की गई हरियाणा अंत्योदय परिवार परिवहन योजना (हैप्पी) से परिवारों को भले ही लाभ न मिला हो लेकिन सरकार और उसकी चहेती कंपनी के बीच 180 करोड़ रुपयों की लूट बांट हो गई। योजना शुरू होने के छह महीने के भीतर तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव परिवहन विभाग अशोक खेमका ने योजना में हुए घोटाले का खुलासा कर बाकायदा सरकार को सूचित कर दिया था। खुद को सीएम से कम नहीं मानने वाले, लेकिन सत्ता में हाशिए पर डाले गए मंत्री अनिल विज ने नौ महीने बाद खट्टर के खिलाफ स्टैंड लेने की हिम्मत जुटाते हुए सीएम सैनी से जांच कराने की मांग की है। संघ-मोदी के हाथ की कठपुतली सीएम सैनी ने जांच के आदेश दिए हैं या नहीं यह तो पता नहीं, लेकिन यदि जांच होगी तो सत्ता में रहकर सत्ता के लिए काम करने वाले आईएसएस अधिकारी क्या रिपोर्ट देंगे समझा जा सकता है।
चुनाव के दौरान जनता के लिए रेवडिय़ां बांटने का नाटक करने वाले पीएम मोदी की तर्ज पर ही खट्टर ने एक लाख रुपये सालाना से कम आय वाले प्रदेश के 84 लाख परिवारों के लिए पिछले विधानसभा चुनाव से पहले हैप्पी कार्ड की घोषणा की थी। यह कार्ड नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड (एनसीएमसी) की तरह काम करता है। लगता है कि खट्टर की नीयत इस योजना से वोट और नोट दोनों की लूटने की थी। ईमानदार आईएएस अशोक खेमका ने खुलासा किया कि हैप्पी योजना में चहेतों का लाभ पहुंचाने के लिए बिड प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और कार्ड बनाने-मेंटिनेंस के नाम पर मनमानी कीमत तय की गई। मीडिया में प्रकाशित खबरें के अनुसार अशोक खेमका ने दिसंबर 2024 मेें रिपोर्ट जारी कर बताया कि इस योजना को बिना प्रतिस्पर्धी बोली (कॉम्पिटिटिव बिडिंग) के मंजूरी दी गई थी। खट्टर सरकार ने मुंबई की कंपनी ओरियनप्रो को प्रति कार्ड 159.30 रुपये का भुगतान करने का कॉन्ट्रैक्ट दिया, जिसमें पहले 10 लाख कार्ड मुफ्त थे और कंपनी को न्यूनतम 50 लाख कार्ड की गारंटी दी गई थी। इसके अलावा, दूसरे वर्ष से प्रत्येक कार्ड के लिए 79.06 रुपये का वार्षिक रखरखाव शुल्क भी निर्धारित किया गया, जबकि लाभार्थियों से केवल 50 रुपये का शुल्क लिया गया। खेमका की रिपोर्ट के अनुसार 50 लाख कार्ड के लिए प्रारंभिक चरण में 63 करोड़ 72 लाख रुपये (पहले 10 लाख मुफ्त कार्ड को छोड़कर) और दूसरे वर्ष से 39 करोड़ 53 लाख रुपये का वार्षिक रखरखाव खर्च होगा, यह रखरखाव शुल्क अत्यधिक है। रिपोर्ट के अनुसार कार्ड के लिए न्यूनतम सेवा की आवश्यकता होती है, इसलिए यह शुल्क नहीं दिया जाना चाहिए। जबकि हिमाचल प्रदेश में भारतीय स्टेट बैंक का एनसीएमसी कार्ड केवल 100 रुपये (जीएसटी सहित) में उपलब्ध है और इसमें कोई रखरखाव शुल्क नहीं है।
खेमका की रिपोर्ट ने पूर्व सीएम खट्टर की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। इसके मुताबिक परियोजना के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री से दो बार मंजूरी ली गई और कार्ड की लागत तय होने के केवल 19 दिन बाद ही बहुत जल्दबाजी में योजना शुरू कर दी गई। खेमका ने तत्कालीन प्रधान सचिव (मुख्यमंत्री) वी. उमाशंकर से यह स्पष्ट करने को कहा था कि क्या 8 और 28 फरवरी 2024 को मंजूरी देने से पहले पूर्व मुख्यमंत्री को बाजार मूल्य की सही जानकारी दी गई थी। योजना बनाने और लागू करने के लिए हुई विभागीय बैठकों के मिनट्स और अफसरों के नाम भी मांगे थे। खेमका का आरोप था कि योजना को बिना फाइनेंशियल इम्पैक्ट स्टडी के जल्दबाजी में स्वीकृति दी। खेमका की गणना के अनुसार यदि प्रतिस्पर्धात्मक बिडिंग प्रक्रिया अपनाई जाती तो प्रति कार्ड कीमत 40 से 50 प्रतिशत तक कम होती। कंपनी को बाजार मूल्य से तीस प्रतिशत अधिक दर पर भुगतान किया गया इस कारण 180 करोड़ का नुकसान हुआ।
उनकी रिपोर्ट में बताया गया था कि योजना का कुल बजट 600 करोड़ का था, लेकिन कॉन्ट्रैक्ट के कारण कहीं ज्यादा हो रहा है। उन्होंने योजना का तुरंत ऑडिट कराने और फैक्ट फाइडिंग जांच कराने की भी मांग की थी। तब उन्होंने कहा था कि वी उमाशंकर से जवाब मिलने के बाद घोटाले की सच्चाई सामने आएगी। सरकार में हाशिए पर पहुंचाए गए परिवहन मंत्री अनिल विज ने करीब दस महीने बाद फिर से मुखर होने की कोशिश की और ट्रांसपोर्ट कमिश्नर टीएल सत्यप्रकाश व सेक्रेटरी से टिप्पणियां मांगीं लेकिन उनके मातहत अधिकारियों ने उन्हें कोई रिपोर्ट नहीं दी। मीडिया रिपोट्र्स के अनुसार सीएम नायब सैनी को इस मामले की जून 2025 में ही जानकारी हो गई थी, तब निजी सचिव मुख्यमंत्री अरुण गुप्ता ने कहा था कि पहले कमिश्नर खुद जांच करें।
इसके बावजूद परिवहन मंत्री अनिल विज ने इसे बेहद गंभीर मामला बताते हुए चार अगस्त 2025 को सीएम नायब सैनी को एक पत्र लिखा, जिसमें अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह सुमिता मिश्रा की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी गठित करने और एक महीने में रिपोर्ट तलब करने का सुझाव दिया। बताया जा रहा है कि सीएम ने अभी तक जांच के आदेश जारी नहीं किए हैं। यदि सुमिता मिश्रा से जांच करा भी ली गई तो वह भी वी उमाशंकर और परिवहन कमिश्नर टीएल सत्य प्रकाश की तरह पर्दा डालने का ही काम करेंगी। हालांकि हैप्पी कार्ड योजना बंद कर दी गई है। बंद तो होनी ही थी क्योंकि इसका लक्ष्य ही विधानसभा चुनाव में गरीब परिवारों को मुफ्त यात्रा की रेवड़ी दिखा कर उसका वोट खरीदना था, लक्ष्य हासिल तो योजना खत्म, जैसा की भाजपा मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों में कर चुकी है। रही बात जांच की तो इतने स्पष्ट तथ्य होने के बावजूद और क्या सुबूत चाहिए, समझा जा सकता है कि सरकार की मंशा ही नहीं है, हां यदि मरे हुए विपक्ष ने कुछ दबाव डाला तो स्वच्छ भारत अभियान की तर्ज पर जांच में भी सब स्वच्छ दिखा दिया जाएगा।