हाजि़री लगा कर भाग जाते हैं नेहरू कॉलेज के प्रोफेसर

हाजि़री लगा कर भाग जाते हैं नेहरू कॉलेज के प्रोफेसर
September 16 09:22 2024

फरीदाबाद (मज़दूर मोर्चा) सामाजिक पतन के इस दौर में शिक्षण कार्य भी पतन से बच नहीं पाया है। वैसे तो सरकारी नीतियों ने शिक्षण-प्रशिक्षण का सत्यानाश करने में कोई कसर छोड़ी नहीं है, रही-सही कसर पूरी करने में शिक्षक भी जुटे हुए हैं। लूट-कमाई के दौर में शिक्षक बच्चों को पढ़ाने की बजाय, कॉलेज में अपनी हाजि़री लगा कर भाग जाते हैं।

पुराने वक़्तों में स्कूल के हों या कॉलेज के, शिक्षकों को केवल अपने हाथ से एक रजिस्टर में अपनी हाजि़री खुद लगानी होती थी। वैसे एक वक्त ऐसा भी रहा है जब इस तरह की हाजि़री भी नहीं लगाई जाती थी। शिक्षकों के काम काज का आकलन उनके द्वारा पढ़ाई गई श्रेणियों से ही कर लिया जाता था। खुद शिक्षकों में पढऩे-पढ़ाने की ईमानदार लगन के साथ-साथ प्रिंसिपल अथवा हेडमास्टर का इतना खौफ होता था कि कोई भी शिक्षक अपने काम के प्रति कोताही नहीं करता था। बेशक उस समय शिक्षकों के वेतन बहुत ही कम होते थे लेकिन इसके बावजूद उनकी लगन एवं ईमानदारी में कोई कमी नहीं होती थी।

जब से शिक्षकों द्वारा रजिस्टर में हाजिरी लगाकर कॉलेज छोड़ कर भागने की सूचनाएं अधिकाधिक मिलने लगीं तो सरकार ने कॉलेजों एवं स्कूलों में बायोमीट्रिक हाजिरी लगाने का प्रावधान कर दिया है। इस व्यवस्था में शिक्षक को आते जाते वक़्त अपने अंगूठे से मशीन को छूना होता है जिससे उसके आने व जाने का समय दर्ज हो जाता है, जबकि रजिस्टर में ये लोग तरह-तरह की हेराफेरी करके अपनी हाजि़री लगवा लिया करते थे।

इस बायोमीट्रिक व्यवस्था में सुबह व दोपहर को यानी कि दो बार हाजिरी लगानी होती है। लेकिन जिन हरामखोरों ने काम करना ही नहीं और हराम की ही खानी है वे सुबह सही समय पर आकर मशीन पर अंगूठा लगाते हैं और खिसक लेते हैं। इसके बाद दोपहर को भी ऐसा ही करते हैं।

वैसे तो यह काम लगभग तमाम कॉलेजों और स्कूलों में छोटे या बड़े पैमाने पर हो रहा है। फिलहाल ‘मज़दूर मोर्चा’ ने इसका अध्ययन करने के लिये सेक्टर 16 ए स्थित राजकिय जवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय को चुना। इसके लिये ‘मज़दूर मोर्चाÓ का एक संवाददाता चार दिन तक कॉलेज गेट पर सुबह साढ़े आठ बजे से दस बजे तक बैठ कर आने जाने वालों का वीडियो बनाता रहा। इसके अनुसार कॉलेज में प्रवेश करने व निकलने वाले कुछ प्रोफेसरों का ब्यौरा तैयार किया गया। (जो निम्र बॉक्स में है)
कारों के इन नम्बरों के आधार पर इनके मालिक प्रोफेसरों के नाम हैं : शालिनी शर्मा, प्रोफेसर गणित, ललित शर्मा, प्रोफेसर गणित, अन्नू खन्ना प्रोफेसर कंप्यूटर साइंस, लीना शर्मा प्रोफेसर कॉमर्स, सुदेश यादव, प्रोफेसर कॉमर्स, प्रतिभा चौहान, प्रोफेसर हिंदी, तनुश्री दहिया, प्रोफेसर साइकोलॉजी, चारु मिड्ढा प्रोफेसर कॉमर्स, ललित यादव प्रोफेसर हिंदी, निशा प्रोफेसर हिंदी और अंकित कौशिक प्रोफेसर रसायन विज्ञान।

कारों से आने वाले इन प्रोफेसरों के अलावा अन्य वाहनों अथवा पैदल या किसी के साथ आने वाले प्रोफेसरों का पता बेशक न लग सका हो, लेकिन उनके खिसकने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। लाखों रुपये वेतन पाने के बावजूद अपने छात्रों को न पढ़ाने वाले प्रोफेसरों के विरुद्ध पहली कार्रवाई तो प्रिंसिपल को ही करनी चाहिए और जरूरत पडऩे पर शिकायत उच्चाधिकारियों तक पहुंचानी चाहिए। परन्तु जिस तरह से पतन का दौर-दौरा है न तो प्रिंसिपल और न ही कोई उच्चाधिकारी इन हरामखोर प्रोफेसरों का कुछ भी बिगाड़ सकता क्योंकि सबके अपने-अपने राजनीतिक आका मौजूद हैं। हां, केवल छात्र ही संगठित होकर इन प्रोफेसरों को काम करने के लिये मजबूर कर सकते हैं।

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Mazdoor Morcha
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